Saturday, January 30, 2016

आरक्षित वर्ग के विरुद्ध लगातार आरक्षण विरोधी लेख लिखना बन्द करो

एक दलित की कलम से:-
मा. गुलाब कोठारी जी,
प्रधान संपादक,
राजस्थान पत्रिका,
जयपुर।

विषय:- आरक्षित वर्ग के विरुद्ध लगातार आरक्षण विरोधी लेख लिखना बन्द करो।

मान्यवर,

            उपर्युक्त विषयांतर्गत सविनय निवेदन है कि राजस्थान पत्रिका आरक्षित वर्ग के विरुद्ध लगातार संपादकीय लेख और समाचार छाप रहा है। आप का अखबार एक मनुवादी सोच को प्रदर्शित कर रहा है और जातिगत भेद-भाव की नीति पर कार्य कर रहा है। इसके अलावा आपका अखबार वक्त-वक्त पर आरक्षण से जुड़ी गलत जानकारियां भी पेश कर रहा है। जिससे लोगों में आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर विरोधाभास की स्थिति पैदा हो जाती है। अगर आप अखबार के एक हिस्से पर आरक्षण की कमियां लिखते हो तो आपका नैतिक कर्तव्य बनता है कि अखबार के दूसरे हिस्से पर आपको आरक्षण के फायदों को भी दर्शाने चाहिए।
                     
हम सबसे पहले आपको आरक्षण के मूल भाव से रूबरू करवाना चाहते है क्योंकि आपके लेखों में आरक्षण के मूल भाव की कमी हमेशा झलकती है।

आरक्षण का मूलभाव:- जो लोग आरक्षण को गरीबी से जोड़कर
देखते हैं, वो लोग दरअसल आरक्षण का मतलब ही नहीं समझते हैं। आरक्षण का अर्थ है "अधिकारों का रक्षण" होता है।

1. अब आप सोच रहें होंगे कि अधिकारों का रक्षण कैसे ? 
जवाब:- जिन लोगो को सदियों तक जातिगत भेदभाव के कारण उनके मानवीय अधिकारों से वंचित रखा गया तो देश आजाद होते समय जब संविधान तैयार हो रहा था तो ये ख्याल रखा गया कि भविष्य में उनके अधिकारों का ऐसी जातिवादी मानसिकता के कारण हनन न हो। अधिकारों के उस हनन को रोकने और अधिकारों की रक्षा के लिए संविधान में आरक्षण का प्रावधान किया गया है।

2. अब आप सोच रहे होंगे कि किन मानवीय अधिकारों का हनन किया गया ?
जवाब:- इस देश के शोषित वंचित और पिछड़ों को उनके मूलभूत अधिकारों जैसे शिक्षा का अधिकार, संपत्ति का अधिकार, समानता का अधिकार, रोजगार का अधिकार से वंचित रखा गया था। जब किसी समाज को शिक्षा का अधिकार ही नहीं होगा तो वो समाज
आगे कैसे बढेगा ? उस समाज का मानसिक विकास कैसे होगा ? उस समाज में जाग्रति कैसे आएगी ? जब समाज में जाग्रति ही नहीं आएगी तो उसका विकास कैसे हो सकता है ? इस अधिकार की रक्षा के लिए शिक्षा में आरक्षण दिया गया है। शिक्षा में आरक्षण होने के बावजूद आज भी जातिवादी मानसिकता के चलते आरक्षित वर्ग के लोगो को आज भी जानबूझकर फेल कर दिया जाता है। कुछ वर्ग विशेष के लोगों को तो आज भी आरक्षित वर्ग के शिक्षा हासिल करने से बहुत बड़ा सिरदर्द होता है। अनारक्षित वर्ग के लोग तो आज भी नहीं चाहते है कि आरक्षित वर्ग शिक्षा हासिल करके अनारक्षित वर्ग के बराबर में बैठे। भूतकाल में अनारक्षित वर्ग ने आरक्षित वर्ग को संपत्ति के अधिकार से भी वंचित रखा था। आरक्षित वर्ग को संपत्ति अर्जित करने का कोई अधिकार ही नहीं था। अगर आरक्षित वर्ग कोई संपत्ति अर्जित भी कर लेते थे तो उसको ब्राह्मण और राजा कभी भी छीन सकता था। जब आरक्षित वर्ग के पास संपत्ति ही नहीं होगी तो आरक्षित वर्ग की मूलभूत आवश्यकताएं कैसे पूरी होगी ? आरक्षित वर्ग के पास पेट भरने के लिए, तन ढकने के लिए वस्त्र और सिर छुपाने के लिए घर कहाँ से आयेंगे ? ऐसी स्थिति से बचाने के लिए
संविधान में विशेष प्रावधान किये गए लेकिन आज भी अनारक्षित लोग चाहते हैं कि आरक्षित वर्ग उसी मनु काल के दौर में पहुँच जाएँ।

3. अनारक्षित वर्ग के लोगो ने आरक्षित वर्ग के लोगों को रोजगार के अवसर नहीं दिए। जब किसी पूरे समाज के पास रोजगार ही नहीं होगा तो उसका आर्थिक विकास कैसे होगा और बिना अर्थ शक्ति के कोई भी समाज किसी भी तरह की तरक्की कैसे कर सकता है ? रोजगार के अवसर देने के लिए संविधान में विशेष प्रावधान किये गए है। आरक्षण का वास्तविक अर्थ है प्रतिनिधित्व होता है। सदियों तक आरक्षित वर्ग को शासन-प्रशासन के कार्यो से वंचित रखा गया जबकि जो देश के नागरिक हैं उनका सभी शासनिक और प्रशासनिक अंगों में उनकी संख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व होना चाहिए। बिना सामान प्रतिनिधित्व के किसी
भी समाज के लिए न्याय की कल्पना करना बेमानी है। जो भी लोग शासन प्रशासन में बैठेंगे, वो उसी समाज का भला चाहेंगे जिस समाज का वो प्रतिनिधित्व करते हैं, जिस समाज से वो ताल्लुक रखते हैं, बाकि सभी समाज की आवश्यकताओं को वो नजरंदाज कर देंगे। आरक्षित वर्ग के साथ यही होता रहा है। जब
हमारे लोग शासन प्रशासन में ही नहीं थे तो हमको अछूत बनाकर रखा गया था। आरक्षित वर्ग को जानवरों से भी बदतर जीवन
जीने के लिए मजबूर किया गया था। ये सब इसलिए किया गया क्योंकि शासन प्रशासन में आरक्षित वर्ग का कोई प्रतिनिधि मौजूद नहीं था। अगर शासन प्रशासन में आरक्षित वर्ग का कोई प्रतिनिधि होता तो हमारे बारे में कुछ तो सोचता। कुछ तो आरक्षित वर्ग की स्थिति बेहतर होती। ऐसी स्थिति जातिगत मानसिकता के चलते
पैदा ना हो, शासन प्रशासन में सभी का प्रतिनिधित्व हो इसिलए आरक्षण का प्रावधान किया गया है। आज लोग आरक्षण का विरोध इसलिए करते हैं क्योंकि उनको लगता है कि उनके लिए
रोजगार के अवसर कम हो रहे हैं जबकि वो अपनी आबादी से कई
गुना अधिक पद कब्जाए हुए हैं। आरक्षण सामाजिक न्याय का साधन है ना कि नौकरी का।

उपर्युक्त तीन बिन्दुओं को पढ़ने के बाद हमें लगता है कि आपको आरक्षण की मूलभावना समझ में आ गयी होगी। अब हम उन बिन्दुओं की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहते है जिनके बारें में आपका अख़बार समय-समय पर गलत तथ्य पेश करता है।

आपके अख़बार के तर्क कुछ इस प्रकार होते है:-

1. आरक्षण का आधार गरीबी होना चाहिए

2. आरक्षण से अयोग्य व्यक्ति आगे आते है।

3. आरक्षण से जातिवाद को बढ़ावा मिलता है।

4. आरक्षण ने ही जातिवाद को जिन्दा रखा है।

5. आरक्षण केवल दस वर्षों के लिए था।

6. आरक्षण के माध्यम से सवर्ण समाज की वर्तमान पीढ़ी को दंड दिया जा रहा है।

आपके अखबार में प्रकाशित तर्कों के जवाब प्रो. विवेक कुमार ने इस प्रकार दिए है।

पहले तर्क का जवाब:-

आरक्षण कोई गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है, गरीबों की आर्थिक वंचना दूर करने हेतु सरकार अनेक कार्य क्रम चला रही है और अगर चाहे तो सरकार इन निर्धनों के लिए और भी कई कार्यक्रम चला सकती है। परन्तु आरक्षण हजारों साल से सत्ता एवं संसाधनों से वंचित किये गए समाज के स्वप्रतिनिधित्व की प्रक्रिया है। प्रतिनिधित्व प्रदान करने हेतु संविधान की धरा 16 (4) तथा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 330, 332 एवं 335 के तहत कुछ जाति विशेष को दिया गया है।

दूसरे तर्क का जवाब:-

योग्यता कुछ और नहीं परीक्षा के प्राप्त अंक के प्रतिशत को कहते हैं। जहाँ प्राप्तांक के साथ साक्षात्कार होता है, वहां प्राप्तांकों के
साथ आपकी भाषा एवं व्यवहार को भी योग्यता का माप दंड मान लिया जाता है। अर्थात अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के छात्र ने किसी परीक्षा में 60 % अंक प्राप्त किये और सामान्य जाति के किसी छात्र ने 62 % अंक प्राप्त किये तो अनुसूचित जाति का छात्र अयोग्य है और सामान्य जाति का छात्र योग्य है। आप सभी जानते है कि परीक्षा में प्राप्त अंकों का प्रतिशत एवं भाषा, ज्ञान एवं व्यवहार के आधार पर योग्यता की अवधारणा नियमित की गयी है जो की अत्यंत त्रुटिपूर्ण और अतार्किक है। यह स्थापित सत्य है कि किसी भी परीक्षा में अनेक आधारों पर अंक प्राप्त किये जा सकते हैं। परीक्षा के अंक विभिन्न कारणों से भिन्न हो सकते है। जैसे कि किसी छात्र के पास सरकारी स्कूल था और उसके शिक्षक वहां नहीं आते थे और आते भी थे तो सिर्फ एक। सिर्फ एक शिक्षक पूरे विद्यालय के लिए जैसा की प्राथमिक विद्यालयों का हाल है, उसके घर में कोई पढ़ा लिखा नहीं था, उसके पास किताब नहीं थी, उस छात्र के पास न ही इतने पैसे थे कि वह ट्यूशन लगा सके। स्कूल से आने के बाद घर का काम भी करना पड़ता। उसके दोस्तों में भी कोई पढ़ा लिखा नहीं था। अगर वह मास्टर से प्रश्न पूछता तो उत्तर की बजाय उसे डांट मिलती आदि। ऐसी शैक्षणिक परिवेश में अगर उसके परीक्षा के नंबरों की तुलना कान्वेंट में पढने वाले छात्रों से की जायेगी तो क्या यह तार्किक होगा। इस सवर्ण समाज के बच्चे के पास शिक्षा की पीढ़ियों की विरासत है। पूरी की पूरी सांस्कृतिक पूँजी, अच्छा स्कूल, अच्छे मास्टर, अच्छी किताबें, पढ़े-लिखे माँ-बाप, भाई-बहन, रिश्ते-नातेदार, पड़ोसी, दोस्त एवं मुहल्ला। स्कूल जाने के लिए कार या बस, स्कूल के बाद ट्यूशन या माँ-बाप का पढाने में सहयोग। क्या ऐसे दो विपरीत परिवेश वाले छात्रों के मध्य परीक्षा में प्राप्तांक योग्यता का निर्धारण कर सकते हैं? क्या ऐसे दो विपरीत परिवेश वाले छात्रों में भाषा एवं व्यवहार की तुलना की जा सकती है? यह तो लाज़मी है कि स्वर्ण समाज के कान्वेंट में पढने वाले बच्चे की परीक्षा में प्राप्तांक एवं भाषा के आधार पर योग्यता का निर्धारण अतार्किक एवं अवैज्ञानिक नहीं तो और क्या है?

तीसरे और चौथे तर्क का जवाब:-

भारतीय समाज एक श्रेणीबद्ध समाज है, जो छः हज़ार जातियों में बंटा है और यह छः हज़ार जातियां लगभग ढाई हज़ार वर्षों से मौजूद है। इस श्रेणीबद्ध सामाजिक व्यवस्था के कारण अनेक समूहों जैसे दलित, आदिवासी एवं पिछड़े समाज को सत्ता एवं संसाधनों से दूर रखा गया और इसको धार्मिक व्यवस्था घोषित कर स्थायित्व प्रदान किया गया। इस हजारों वर्ष पुरानी श्रेणीबद्ध सामाजिक व्यवस्था को तोड़ने के लिए एवं सभी समाजों को बराबर–बराबर का प्रतिनिधित्व प्रदान करने हेतु संविधान में कुछ जाति विशेष को आरक्षण दिया गया है। इस प्रतिनिधित्व से यह सुनिश्चित करने की चेष्टा की गयी है कि वह अपने हक की लड़ाई एवं अपने समाज की भलाई एवं बनने वाली नीतियों को सुनिश्चित कर सके। अतः यह बात साफ़ हो जाति है कि जातियां एवं जातिवाद भारतीय समाज में पहले से ही विद्यमान था। प्रतिनिधित्व ( आरक्षण) इस व्यवस्था को तोड़ने के लिए लाया गया न की इसने जाति और जातिवाद को जन्म दिया है। तो जाति पहले से ही विद्यमान थी और आरक्षण बाद में आया है। अगर आरक्षण जातिवाद को बढ़ावा देता है तो, सवर्णों द्वारा स्थापित समान-जातीय विवाह, समान-जातीय दोस्ती एवं रिश्तेदारी क्या करता है? वैसे भी बीस करोड़ की आबादी में एक समय में केवल तीस लाख लोगों को नौकरियों में आरक्षण मिलने की व्यवस्था है, बाकी 19 करोड़ 70 लाख लोगों से सवर्ण समाज आतंरिक सम्बन्ध क्यों नहीं स्थापित कर पाता है? अतः यह बात फिर से प्रमाणित होती है की आरक्षण जाति और जातिवाद को जन्म नहीं देता बल्कि जाति और जातिवाद लोगों की मानसिकता में पहले से ही विद्यमान है।

पांचवे तर्क का जवाब:-

प्रायः सवर्ण बुद्धिजीवी एवं मीडियाकर्मी फैलाते रहते हैं कि आरक्षण केवल दस वर्षों के लिए है, जब उनसे पूछा जाता है कि आखिर कौन सा आरक्षण दस वर्ष के लिए है तो मुँह से आवाज़ नहीं आती है। इस सन्दर्भ में केवल इतना जानना चाहिए कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए राजनैतिक आरक्षण जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 में निहित है, उसकी आयु और उसकी समय-सीमा दस वर्ष निर्धारित की गयी थी। नौकरियों में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण की कोई समय सीमा सुनिश्चित नहीं की गयी थी।

छठे तर्क का जवाब:-

आज की स्वर्ण पीढ़ी अक्सर यह प्रश्न पूछती है कि हमारे पुरखों के अन्याय, अत्याचार, क्रूरता, छल कपटता, धूर्तता आदि की सजा आप वर्तमान पीढ़ी को क्यों दे रहे है? इस सन्दर्भ में दलित युवाओं का मानना है कि आज की सवर्ण समाज की युवा पीढ़ी अपनी ऐतिहासिक, धार्मिक, शैक्षणिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक पूँजी का किसी न किसी के रूप में लाभ उठा रही है। वे अपने पूर्वजों के स्थापित किये गए वर्चस्व एवं ऐश्वर्य का अपनी जाति के उपनाम, अपने कुलीन उच्च वर्णीय सामाजिक तंत्र, अपने सामाजिक मूल्यों, एवं मापदंडो, अपने तीज त्योहारों, नायकों, एवं नायिकाओं, अपनी परम्पराओ एवं भाषा और पूरी की पूरी ऐतिहासिकता का उपभोग कर रहे हैं। क्या सवर्ण समाज की युवा पीढ़ी अपने सामंती सरोकारों और सवर्ण वर्चस्व को त्यागने हेतु कोई पहल कर रही है? कोई आन्दोलन या अनशन कर रही है? कितने धनवान युवाओ ने अपनी पैत्रिक संपत्ति को दलितों के उत्थान के लिए लगा दिया या फिर दलितों के साथ ही सरकारी स्कूल में ही रह कर पढाई करने की पहल की है? जब तक ये युवा स्थापित मूल्यों की संरचना को तोड़कर नवीन संरचना कायम करने की पहल नहीं करते तब तक दलित समाज उनको भी उतना ही दोषी मानता रहेगा जितना की उनके पूर्वजों को।

अंत में हम आप से एक बात कहना चाहते है। हम सब जानते है कि राजस्थान पत्रिका राजस्थान का सबसे ज्यादा बिकने वाला अखबार है। आप भी जानते हो कि लाखों की संख्या में आरक्षति वर्ग के लोग भी आपके अख़बार के पाठक है। अगर आपने जल्दी ही आरक्षित वर्ग से माफ़ी नहीं मांगी तो आपके अखबार को पढ़ने वाले लोगों की संख्या में भारी कमी आ सकती है। अतः आपसे निवेदन है कि आगे से आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर थोड़ा सोच-समझकर लिखे तो बेहतर होगा।

1 comment:

  1. इस पत्र के एक एक शब्द सही एवं प्रामाणिक है।

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