Saturday, January 30, 2016

अंखियों के झरोखे से

अंखियों के झरोखे से
भाभियों के होते हुए भी छटी कक्षा  से ही  एक मोटी रोटी बनाकर व खाकर स्कूल जाने में खुशी होती थी।  पढाई के साथ साथ  अनेक खेलों में भाग लिया, कैप्टन सहित अनेक पदक जीते और जिले का सर्वश्रेष्ठ खिलाडी भी रहा। कुछ प्राईवेट स्कूलों ने फरी भोजन, फीस आदि का प्रलोभन भी दिये । मगर अंतिम उद्देश्य पढाई ही रहा था। तब मार्गदर्शन देने वाला कोई नहीं था। धान-मंडी के कर्ताधर्ता  समाज के चन्द व्यक्तियों को छोडकर अनेक लोगों को नहीं मालूम था कि हंसराज धानमन्डी में काम करने के अलावा  किसी स्कूल में पढता भी है। मगर यह देखकर  अफसोस होता था कि छटी से मैट्रिक कलास में एक भी धानकवीर नजर नहीं आता था- 
समाज के गण्यमान्य लोग अक्सर दारु पीकर, नटराज की मुद्रा में युवक व अधेड  गालीगलौच व आपस में  युद्ध  कर, मुहल्ले का नाम रोशन करते थे और अनेक औरतें तांडव-नृत्य कर मुहल्ले में चार चांद लगाती थी जबकि  अधिकांश परिवार अभावग्रस्त थे। 
उस जमाने में  समाज के किसी भी परिवार में बकरी के अलावा एक भी गाय नहीं थी । फिर भी अपने-अपने  कच्चे घरों की लिपाई करने के लिये समाज के बच्चों व औरतों  को गाय- भैंस. का गोबर, गली-गली में आसानी से मिल जाता था। मगर तब से आज तक  समाज के अधिकांश  बच्चों को गाय का दूध नसीब नहीं होता है। फिर भी हमारे  समाज के अनेक बच्चों से युवक-युवतियों व समाज के बुद्धिजीवियों  ने जान-वर  गाय को माता मानकर, गाय के गोबर व मूत को खाने पीने का हक हासिल कर लिया है। 
 मैंने ऐसे परिवार भी देखें हैं, जिन्होंने जीते जी पिता का पूतला जलाया है और असली माँ बाप को तिलांजलि देकर इधर-उधर  छोड दिया है। मगर आज उन्ही की  धानक-समाज के वंशज  गाय को माता मानकर पूजन कर रहे हैं और सांड को बाप मानने से परहेज कर, सनातन-काल की सहयोगी बकरी से भेदभाव कर रहे हैं। जबकि न जाने कितनी माँ व अनेक बाप बनाकर पूजन कर रहे हैं।
मैंने बचपन में देखा है कि समाज के बुजुर्ग लोग पंडितों को दादा कहकर, ब्राह्मणदेवता के चरण-स्पर्श करने की कोशिश करते थे, जबकि ब्राह्मण दो गज दूर रहकर टालने की कोशिश करते थे। आज उसी पंडितों की औलाद आर्थिक दान के चक्कर में हमारे समाज के रीतिरिवाजों  में ग्रह बनकर गृह प्रवेश कर गये हैं और युवक-युवतियां ऊठबैठ के नाम पर स्वयं को धन्य समझ रही है। जातिवाद की भावना से दूर अनिल-मोहता, रमेश-गर्ग, इन्द्र-अरोडा, सुरेन्द्र-सिन्धी, मुस्ताक-अली व राजकुमार-गुलाटी मेरे बचपन के परममित्र रहे हैं  मगर  यह समीकरण  मेरी बाल बुद्धि की समझ में न तब आया और ना ही अब आया कि दान व वोटबैंक से वशीभूत होकर मनुवादी ब्राह्मण हमारे समाज से  बहुत दूर होकर, वे हमारे  कितने आस-पास मंडरा रहे हैं। 
  आज समाज के बहुत से लोग ब्राह्मण बनने की नौटंकी करते हैं। अक्सर  चटनी से रोटी खाकर और कभी चाव से मीट, मुर्गा खरीदकर तो, कभी कभार बलि के बकरे, मुर्गे व सूअर  की दावत  खाने वाले समाज के लोग, आज मांसाहारी भोजन त्याग कर फिर चटनी-शाकाहारी बनकर, कबीरजी की धुन में, गोखी की गोद में बैठकर  धन-धन सतगुरु करते हुए, सुदर्शन की तलाश में,  आशुतोष महाराज  की राधे-राधे के संग रंग-रसिया की डफली बजाकर,  वैष्णव समाज तो कुछ आर्य-समाज  में घुसपेठ कर गये हैं। मगर समाज आज भी हासिये पर खडा मनुवादियों का वोटबैंक बनकर "राम-मरा की" तपस्या कर, मनुवादी देवी देवताओं के मन्दिर के बाहर  घंटे बजा रहे हैं।

बचपन से ही भ्रमण का चाव रहा है। पढाई व नौकरी दौरान मैने तय कर लिया था कि जहाँ कहीं भी स्थानान्तरण हो जावे, वहाँ भ्रमण समझ कर जाना चाहिए । विभिन्न  जगह-जगहों के दर्शन व विभिन्न समाजों को समझने की कोशिश की। मगर कोटा, अलीगढ, कानपुर, लखनऊ, बडौदा अहमदाबाद, ,मुम्बई, दिल्ली, बीकानेर, जोधपुर आदि की हवेली, छोटे-बड़े मन्दिरों,  बडी-बडी व बहु-मंजिला इमारतों,   में  समाज के लोगों को ढूंढने की कोशिश की, मगर लगता था कि कहीं खो गया है मेरा समाज।
 बनियों व ब्राह्मणों के मुहल्ले से दूर वाल्मिकी-समाज व मुस्लिम-समाज व हमारे समाज के लोग एक-दूसरे के मुहल्ले में निवास करते देखकर, तब खुशी होती थी कि देश में अनेकता में ऐकता की मिसाल है।
 भ्रमण के दौरान  मेरे समाज के अनेक युवक क्षत्रिय वंशधारी के आवरण में लिपटे हुए भी पाये गये  हैं। मैं उन्हें हंसराज-धाणका, धानक परिचय देकर उनकी .मानसिक गुलामीपन की हीनता त्यागने की सलाह देता था। मगर हमारे समाज के अधिकांश शूरवीर झाडू को तलवार व पीपे को ढाल बनाए हुये हैं।
मैने यह भी देखा है कि  विभिन्न सम्प्रदायों के धर्मगुरुओं को गुरुधारण कर  अनुयायी (पिछलग्गू) बनने में, हमारा समाज के अधिकांश लोग  गर्व करते हैं ।  स्कूल व शिक्षक को बीच राह में  तिलांजलि  देकर, दूसरे सम्प्रदाय के धर्माधिकारी को गुरुधारण व गुरुमंत्र लेने में कोई भेदभाव नहीं करता है। हमारे समाज के अधिकांश लोग कितने कृत्घन हैं कि देश के सर्वश्रेष्ठ ,महान कर्ताधर्ता, धर्मगुरु, उद्धारक,   उपदेशक, प्रवचनकर्ता, सामाजिक व आर्थिक विकास के पोषक, संविधान निर्माता भीमराव अम्बेडकर को गुरुधारण व गुरुमंत्र लेने की बजाय, यह कहने में कोई संकोच नहीं करते हैं कि हमारे समाज का कोई धर्मगुरु नहीं है। 
 कभी कभी रिश्तेदारी व अन्य जगहों पर भ्रमण करना  होता है तो यह देखकर खुशी होती है कि समाज के बच्चे व युवक-युवतियों के जीवन स्तर में काफी सुधार आया है। समाज के शूरवीर युवकों की बजाय लडकियां शिक्षण के क्षेत्र में कहीं आगे हैं। मगर सामाजिक ,शैक्षणिक,  मानसिकता व आर्थिक विकास में कोई उल्लेखनीय  परिवर्तन नहीं हुआ है। क्योंकि नशे के कारण अनेक युवा पति अकाल के मुंह में पलायन कर गये हैं। 
आज तीसरी पीढी के कुछ बच्चे शिक्षण व दुकनदारी को महत्व देने लगे हैं और कुछ विदेशों में भी भाग्य आजमा रहे हैं। मगर  एक जगह पडे रहकर भी सामूहिक  भावना का अभी भी इन्तजार है। यह भी सत्य है कि एक ही जगह पर पडे पडे लोहे व लकडियों  में भी जंग व दीमक लगकर नष्ट हो जाते हैं। इसी कारण एक उपदेशक ने बताया है कि अच्छे भले लोगों को उजड जाना चाहिए और बेहतर  कर्म की तलाश में एक जगह से दूसरी जगहों पर भ्रमण व पलायन करना चाहिए । ताकि नई संस्कृति व नये विचारों से रुबरु होकर, हम अपने बच्चों व समाज को एक नयी दिशा दी जा सके।
हमारे समाज के बुद्धजीवियों को चाहिए कि समाज की ऐकता, सामाजिक, शैक्षणिक, मानसिक  व आर्थिक   विकास के लिये अपने-अपने प्रवचनों के पम्पलेट छपवाकर व जागरूक चार पांच किताबें  समाज के सामाजिक कार्यों में बच्चों व युवक-युवतियों के बीच वितरित करने चाहिए । अगर समाज के बच्चे हमारे पास नहीं आ सकते हैं, तो हमें अपने संदेशों के माध्यम से उनके बीच जाना चाहिए ।
मेरा यह मानना है कि समाज के सफल, बुद्धिजीवी  व्यक्तियों के प्रवचन , समाज के बच्चे व युवक-युवतियां बहुत ध्यान से सुनते हैं और पालन करते हैं।

बाबा-राजहंस 
जय-भीम

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