Thursday, February 4, 2016

क्या सरस्वती ज्ञान की देवी है ?

 क्या सरस्वती ज्ञान की देवी है ? अगर है तो इन शंकाओँ का समाधान करेँ :

1. इसके बिना इसाई, मुसलमान, प्रकृतिपूजक, नास्तिक आदि कैसे ज्ञान प्राप्त कर पा रहे हैँ ?
2. सरस्वती कितनी भाषाएँ जानती हैँ ?
3. हड़प्पा सभ्यता की लिपि अब तक नहीँ पढ़ी गई। इस संबंध मेँ सरस्वती का क्या प्लान है ?
4. सरस्वती के होते हुए स्कूलोँ मेँ शिक्षकोँ की जरूरत क्योँ पड़ती है ?
5. अंग्रेजोँ के पहले भारत मेँ अंग्रेजी क्योँ नहीँ थी। क्या सरस्वती पहले अंग्रेजी नहीँ जानती थी ?
6. कई देश शत-प्रतिशत साक्षर हो गए, जबकि भारत सरस्वती के होते हुए भी साक्षरता मेँ पीछे है। क्योँ ?
7. मनु ने मनुस्मृति मेँ शूद्रोँ का पढ़ना दंडनीय माना है। आज तक इस मामले मेँ सरस्वती ने कोई एक्शन क्योँ नहीँ लिया ? क्या सरस्वती भी इस षडयंत्र मेँ शामिल थी ? ज्ञान तो सरस्वती देती है। क्या यह ज्ञान मनु को सरस्वती ने ही दिया था ?
8. कई भाषाएँ लुप्त हो गई और कई लुप्त हो रही हैँ। सरस्वती उन्हेँ क्योँ नहीँ बचा पा रही हैँ ? क्या इतनी सारी भाषाओँ को याद रखना उनके लिए मुश्किल हैँ ?
9. कुछ बच्चे मेहनत करने पर भी पढ़ाई मेँ कमजोर होते हैँ. क्योँ ? क्या वह भेदभाव करती हैँ ?
10. सरस्वती के होते हुए मटरगस्ती करने वाले, भ्रष्ट लोग शिक्षक कैसे बन जाते है ?
11. वसंत पंचमी पर ब्राह्मण ही सरस्वती की पूजा संपन्न करवाते हैँ तथा सरस्वती की मूर्ति स्थापना भी पंडित ही करते हैँ। सरस्वती दूसरी जातियोँ से पूजा क्योँ नहीँ करवाती हैँ ? क्या सरस्वती भेदभाव करती हैँ ? या सरस्वती ब्राह्मण जाति की हैँ ?
12. हिंदुओँ के अलावा बाकी धर्म के लोग सरस्वती को क्योँ नहीँ पूजते ? क्या यह हिंदुओँ के द्वारा कल्पित की गई हिंदुओँ की ऐसी देवी है, जो हिंदू हितोँ का ध्यान रखने के साथ हिंदू धर्म का प्रचार करती हैँ ?
१३. कहीं इसके पीछे मुसलमानों को पिछड़ा बनाये रखने की चाल तो नहीं है कि सरस्वती के कारण मुसलमान अपने बच्चों को स्कूलों में भेजने से कतराएंगे ।
१४. सरस्वती महिला है, फिर भी महिलाओं की साक्षरता दर जबरदस्त कम है, क्यों ?
15. सरस्वती के होते हुए आम बच्चों के लिए खस्ताहाल स्कूल और अमीरजादों के लिए डी.पी.एस. जैसे कॉन्वेन्ट स्कूल क्यों हैं ? इस मामले में सरस्वती जी ने आज तक कोई निर्णय क्यों नहीं लिया ?
[04/02 15:33] ‪+91 98264 75841‬: "क्रांति और प्रतिक्रांति"
---भारत का इतिहास

डा बाबा सहाब अम्बेडकर ने भारत के इतिहास का जब गहराई से अध्यन किया तो बताया कि "भारत का इतिहास आर्य ब्राह्मणों की विसमतावादी और बुद्ध की मानवतावादी विचारधारा के बीच क्रांति और प्रतिक्रांति के संघर्ष का इतिहास रहा है।"

सिंधु सभ्यता, मोहन जोदड़ो, हड़प्पा भारत की फली-फूली सभ्यताएं थी इन सभ्यताओ में रहने वाले लोग दैत्य, अदित्य, सूर,असूर, राक्षस, दानव कहलाते थे। तथा इनमे किसी प्रकार का जाति भेद नहीं था, इनकी संस्कॄति मातृसत्तात्म थी ।

  करीब चार हजार साल पहले जब खेबर दर्रे से होते हुए मध्य एशिया से 'आर्य' आये तो यहॉं के मूलनिवासी अनार्य कहलाने लगे। आर्य और अनार्यों में करीब पांचसौ वर्ष तक संघर्ष चला जिसमे अनार्यों का पतन हुआ परिणामस्वरूप आर्यों ने अपनी पितृसत्तात्मक संस्कॄति और विसमता वादी वर्ण व्यवस्था अनार्यो पर थोप दी, इस युग को इतिहास में आर्य वेदिक युग कहा गया है ।

आर्य लोगो में त्रिवर्णीय व्यवस्था (ब्राह्मण/क्षत्रिय/वेश्य) विकसित हो चुकी थी। जिसका विवरण ऋग्यवेद में मिलता है जब अनार्यो को हराकर गुलाम बनया तो इन्हे वर्ण व्यवस्था में रखने के लिए चतुर्थ वर्ण(शूद्र) की रचना की गयी जिसका विवरण पुरुषशुक्त में मिलता है। 

इस बात को ध्यान में रखते हुए कि मूलनिवासी अनार्य हमेशा आर्यो के गुलाम बने रहे, अनार्यों को आर्यों ने शिक्षा/सत्ता/सम्पत्ति/सम्मान आदि मूल अधिकारों से वंचित किया तथा शूद्र(सछूत) और अतिशूद्र(अछूत) के तौर पर बांट कर इनमे उंच-नीच की भावना पैदाकर आपस में लड़ाते रहे । धीरे-धीरे आर्य ब्राह्मणो ने इन्हे जाति- उपजाति में बांटकर ऐसे अंधविस्वास के जाल में उलझाया कि मूलनिवासी अनार्य शूद्र(obc/sc/st) आर्य ब्राह्मणों के सड़यंत्रो को समझ ही नही पाये।

आर्यों की अमानवीय विसमतावादी व्यवस्था को गौतम बुद्ध ने अपनी वैज्ञानिक सोच और तर्कों से ध्वस्त कर दिया तथा समाज में ऐसी चेतना फैलाई कि ब्राह्मण और ब्राह्मणी संस्कारो का लोगो ने बहिस्कार कर दिया।

बुद्ध को ब्राह्मणों ने शुरुआत से ही नास्तिक माना है। ब्राह्मणों के शास्त्रों में लिखा भी गया है कि जो अपने जीवन में तर्क का इस्तेमाल करता है वह नास्तिक है और जो धर्म और ईश्वर में विश्वास रखे वह आस्तिक । रामायण में बौद्धों की नास्तिक कहकर निंदा की गयी है ।

 बुद्ध का धम्म कोई धर्म नहीं बल्कि नैतिक सिद्धांत है । संक्षेप में कहे तो 'बुद्ध' का मतलब बुद्धि, 'धम्म' का मतलब 'इंसानियत' और संघ का मतलब 'इस उद्देश्य के लिए संघर्ष कर रहा सक्रीय संगठन' है।

परन्तु बेहद दुःख की बात है कि बौद्ध सम्राट अशोक के पौत्र वृहदरथ की पुष्यमित्र शुंग द्वारा हत्या कर बौद्धों के शासन को खत्म किया और बौद्धों पर तरह-तरह के ज़ुल्म ढहाए गए, वर्ण व्यवस्था जो बुद्ध की क्रांति की वजह से खत्म हो गयी थी । उसे मनुस्मृति लिखवाकर पुनः ब्राह्मणी शासन द्वारा तलवार के बल पर थोपी गयी, जिन बौद्धों ने इनके अत्याचारों की वजह से ब्राह्मण धर्म(वर्ण व्यस्था) को स्वीकार कर लिया उन्हें आज हम सछूतशूद्र(obc), जिन बौद्धों ने ब्राह्मण धर्म को स्वीकार नही किया उन्हें अछूतशूद्र (sc) और जो बौद्ध अत्याचारों की वजह से जंगलो में रहने लगे उन्हें आज हम अवर्ण(st) के रूप में पहचानते हैं ।

ब्राह्मण धर्म में वर्ण, वर्ण में जाति, जाति में उंच- नीच और ब्राह्मण के आगे सारे नीच, यही वजह है कि जब मुसलमानों का शासन आया तो बड़े पैमाने sc/st/obc के लोग मुसलमान बन गये, जब अंग्रेजो का राज आया तो क्रिस्चन बन गए ।

 आज भी sc/st/obc के लोगों को प्रांतवाद,जातिवाद,भाषावाद,धर्मवाद के नाम पर 'फूट डालो राज करो नीति' को अपनाकर भय,भक्ति, भाग्य, भगवान, स्वर्ग-नर्क, पाप-पूण्य, हवन, यज्ञ,चमत्कार,पाखण्ड अन्धविश्वास,कपोल काल्पनिक पोंगा पंथी कहानिया आदि अतार्किक, अवैज्ञानिक मकड़जाल को इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंटमीडिया के माध्यम से थोपकर तथा मुसलमानों का डर दिखा कर मानसिक रूप से गुलाम बनाया जा रहा है। ऐसे में यदि कोई जागरूक बुद्धिजीवी तर्क करता है तो उसे धर्म विरोधी बताकर बहिस्कृत कर दिया जाता है ।
 
आज बाबा सहाब अम्बेडकर के संवैधानिक अधिकारों की वजह से अनार्य शूद्रों(obc/sc/st) ने हर क्षेत्र में कुछ तरक्की की है परन्तु आर्य ब्राह्मणों ने कांग्रेस/बीजेपी/AAP के राजनैतिक सडयंत्र में फंसाकर एक तरफ तो हिंदुत्व के नाम पर मुसलमानो से लड़ाने का प्रयास किया जा रहा है दूसरी तरफ प्राईवेटाइजेशन,ऐसीजेड और भूमि अधिग्रहण के नाप पर आर्थिक रूप से तथा अंधविस्वास फैलाकर मानसिक रूप से गुलाम बनाने का षड्यंत्र किया जा रहा है ।
 
क्या आज अनार्य शूद्रों के पास आने वाली अंतहीन गुलामी से बचने की समझ और प्लान है ?


👇एक मात्र उपाय

शूद्र(obc), अतिशूद्र(sc/st)
जाति तोड़ो समाज जोड़ो

बहुजन समाज बनाओ
अल्पसंख्यक को मिलाओ
अपनी ताकत दिखाओ
मनुवाद से मुक्ति पाओ

धन, धरती और साधन बांटो
बाद में आरक्षण बांटो !

जिसकी जितनी संख्या भारी
उतनी उसकी हिस्सेदारी !

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