Friday, January 1, 2016

नेशनल हेराल्ड केस का संक्षिप्त सच

🍁Nathional Herald (NH) केस का संक्षिप्त सच🍁

NH न्यूज़ पेपर नेहरूजी द्वारा 1930 में शुरू किया गया था ।
समय के साथ पेपर का काम बढ़ता गया और इसने 5000 करोड़ की प्रॉपर्टी व् पूंजी बना ली ।
सन 2000 के आस पास यह पेपर नुकसान में चला गया और इस पर 90 करोड़ का कर्जा हो गया ।
नेशनल हेराल्ड NH के directors सोनिया , राहुल और मोतीलाल वोरा ने पेपर को " यंग इंडिया लि " को बेच दिया ।
अब ध्यान से पढ़े :-
यहाँ से असली किस्सा शुरू होता है ।
यंग इंडिया के director भी थे सोनिया राहुल ऑस्कर फर्नांडिया और मोतीलाल वोरा ।
सौदा ऐसा हुआ कि ' यंग इंडिया ' 90 करोड़ का NH का कर्जा चुकाएगी और बदले में 5000 करोड़ की प्रॉपर्टी ले लेगी ।
चूँकि दोनों कंपनियो में एक ही लोग थे अतः NH की 5000 करोड़ की संपत्ति सिर्फ 90 करोड़ में यंग इंडिया ने हथिया ली ।

किस्सा यहीं ख़त्म नहीं होता है ।
यंग इंडिया ने 90 करोड़ चुकाने के लिए कांग्रेस पार्टी से 90 करोड़ का लोन लिया , जो कि कांग्रेस पार्टी की सोनिया राहुल ने मीटिंग कर पास कर दिया और पार्टी treasurer मोतीलाल वोरा ने तुरंत यंग इंडिया के director मोतीलाल वोरा को दे दिए और इस मोतीलाल वोरा ने NH के मोतीलाल वोरा ( स्वयं ) को दे देये ।
अब और मजा देखिये :
दूसरे दिन काँग्रेस पार्टी ने मीटिंग बुलाई जिसमे सोनिया राहुल ऑस्कर फर्नांडिस मोतीलाल वोरा थे , इन लोगो ने 90 cr का  NH का लोन यह कहकर  माफ़ कर दिया कि इस पेपर ने आजादी दिलाने में मदद की थी ।
इसे कहते है बिना कुछ लिए दिए 5000 cr की संपत्ति हथिया ली । इसमें एक 11 मंजिला विशाल भवन , बहादुर शा जफ़र मार्ग दिल्ली स्थित , जिसे कि pass port office और अन्यो को किराए पर दिया गया है ।

इसको कहते हैं हींग लगे न फिटकरी, रंग भी चोखा आये।

अब पोल खुल गई तो संसद में हंगामा  यह चोरी और सीनाज़ोरी नहीं तो क्या है ।
विचार करे , यह तो सिर्फ एक कारनामा सामने आया है ।


😞😢                                      🙏

हज़रत उमर – इंसाफ़ पसंद खलीफा

हज़रत उमर – इंसाफ़ पसंद खलीफा
रात का समय था। सारा मदीना शहर सोया पड़ा था। उसी समय हजरत उमर शहर से बाहर निकले। तीन मील जाने के बाद एक औरत दिखाई दी।
वह कुछ पका रही थी। पास ही दो तीन बच्चे रो रहे थे। हजरत उमर ने उस औरत से पूछा, "ये बच्चे क्यों रो रहे है?" औरत ने जबाब दिया, "भूखे हैं। कई दिन से खाना नहीं मिला। आज भी कुछ नहीं है। खाली हांडी में पानी डाल कर पका रही हूं।
हजरत ने पूछा, "ऐसा क्यों कर रही हो?"
औरत ने जवाब दिया, "बच्चों का मन बहलाने के लिए।"
हजरत उमर तड़प उठे। उसी समय वापस लौटे। खजाने से घी, आटा और खजूरें ली। नौकर से बोले, "इन्हें मेरी पीठ पर बांध दो।" नौकरी ने कहा, "यह आप क्या कर रहे हैं? मैं ले चलता हूं।" हजरत उमर ने जबाब दिया, "कयामत में मेरा र्बोझ तुम नहीं उठाओगे।"
सब चीजें चह खुद लाद कर ले चले। उसी औरत के पास पहुंचे। उसने ये चीजें देखी तो बहुत खुश हुई। जल्दी-जल्दी आटा गूंथा। हांडीं चढ़ाई। हजरत उमर चूल्हा फूंकने लगे। खाना तैयार हुआ। बच्चों ने पेट भर कर खाया। खाकर उछलने कूदने लगे। हजरत उमर देखते थे, खूब खुश होते थे। मां भी बहुत खुश थी। बार-बार दुआएं दे रही थी। कहती थी, "खलीफा तुमको होना चाहिए। उमर इस काबिल नहीं है।"
बेचारी गरीब मां! उसे कौन बताता कि वह किस से बातें कर रही है।
एक रात उमर फिर ऐसे ही घूम रहे थे। देखा एक बददू अपने खेमे के बाहर बैठा हुआ है। वह भी उसके पास जा बैठे। इधर-उधर की बातें होने लगी। बीच-बीच में कहीं से रोने की आवाज आ रही थी। पता लाग कि खेमे के भीतर कोई रो रहा है। पूछा, "कौन रो रहा है?"
बददू ने जबाब दिया, "मेरी बीबी।"
"क्या बात है?"
"बच्चा होनेवाला है।"
"क्या वह अकेली है।"
"हां।"
हजरत उमर घर लौटे। अपनी बीवी को साथ लिया। फिर वही आये। रोने की आवाज उसी तरह आ रही थी। बददॅ से बोले, "यह मेरी बीवी है। तुम कहो तो यह भीतर चली जाय।"
नेकी और पूछ-पूछ! बददू बहुत खुश हुआ। हजरत उमर की बीवी भीतर चली गई। कुछ देर बाद बच्चा पैदा हुआ। भीतर से ही उनकी बीवी ने पुकारा, "अमीरुल मोमनीन, अपने साथी को बधाई दो।"
बददू चौंक पड़ा "क्या कहा, अमीरुल मोमनीन! क्या यह मोमीनों के नेता, खलीफा, हजरत उमर है?"
वह हाथ जोड़ने लगा। हजरत उमर बोले, "नहीं कोई बात नहीं। कल मेरे पास आना। बच्चे के लिए वजीफा बांध दूंगा।"
एक रात घूमते-घूमते उनके कानों में गाने की आवाज आई। बड़ा दर्द-भरा गाना था। एक औरत अपनी खिड़की पर बैठी हुई गा रही थी "रात काली है और लम्बी होती जाती है। मेरा मालिक मेरे पास नहीं है….। "उस औरत को मालिक लड़ाई पर गया हुआ थ्ज्ञा। उसी की याद में वह गा रही थी। यह गाना सुनकर हजरत उमर बहुत दुखी हुए। सोचने लगे " मैं अरब की औरतों पर जुल्म कर रहा हूं।"
और वह सोच कर ही नहीं रह गये, तुरन्त हजरत हफसा के पास आये। पूछा, "औरत अपने मालिक के बिना कितने दिन रह सकती है?"
जवाब मिला, "चार महीने।"
सुबह होते ही हजरत उमर ने हर जगह आदेश भेज दिया कि कोई भी सिपाही चार महीने से ज्यादा बाहर न रहे।
एक बार वह लागों को खाना खिला रहे थे। देखा कि एक आदमी बाये हाथ से खाना खा रहा है। वह उसके पास पहुंचे। बोले,
"दाहिने हाथ से खाओ।"
उसने जबाब दिया, "दाहिना हाथ नहीं हैं वह लड़ाई में जाता रहा।"
उनका दिल भर आया। आंखों से आंसू बहने लगे।
वहीं उसके पास बैठ गये। बोले, "अफसोस! तुमको वजू कौन कराता होगा? सिर कौन धोता होगा? कपड़े कौन पहनाता होगा?"
बाद में उसके लिए एक नौकर तैनात कर दिया। जरुरी चीजें अपने पास से दीं।
हजरत उमर इस्लाम के दूसरे खलीफा थे। खलीफा राजा भी होते थे और पोप भी। वह राज भी करते थे और धर्म की रक्षा भी। वह बहुत बड़े थे। वह देश पर राज करते थे। देश के लोगों पर राज करते थे। लोगों के दिलों पर राज करते थे। जो दिलों पर राज करता है, वही बड़ा है। ये कहानियां इस बात की गवाह है।
हजरत मुहम्मद इस्लाम के पैगम्बर थे। पैगम्बर ईश्वर का सन्देश लानेवाला होता है। उन्होंने एक ईश्वर की पूजा का प्रचार किया। उन्होंने अरबों को एक कौम बनाया। उनके उपदेशों का सार था एक ईश्वर की पूजा करो। सब भाई-भाई हैं। कोई न ऊंचा है, न नीचा। बुरे कामों से बचो। नेक कामों में लगो। इसीका नाम उन्होंने इस्लाम रखा। इसका मतलब है अपने को भगवान को सौंप देना।
उस जमाने के लोग बड़े खराब थे। इन बातों का विरोध करते थे। वे बहुत से देवी-देवताओं को मानते थे। आपस में लड़ते रहते थे। बुरे-बुरे काम करते, शराब पीते, जुआ खेलते, लड़कियों को मार डालते, पशु-बलि और नरबलि चढ़ाते। कुछ लोग तो अपने बेटों की बलि भी चढ़ा देते थे छूआछूत भी थी। ये सब लोक कबीलों में बंटे हुए थे।
मक्के में उन दिनों सबसे बड़ा कुरैश का था। उनका सरदार मक्के पर राज करता था। वही काबे का रखवाला था। ये लोग नए धर्म के विरोधी थे। सब बराबर हैं ये इस बात को नहीं मानते थे। शुरु में उन लोगों ने मुहम्मदसाहब को लालच दिया, पर वह नहीं माने। इस पर वे मोहम्मद साहब और उनके साथियों को सताने लगे।
हजरत उमर भी कुरैश थे। बहुत बहादुर थे। उनका डीलडौल बड़ा ऊंचा था। हमारो आदमियों में अलग दिखाई दे जाते। वह भी मुहम्मदसाहब के खिलाफ थे, लेकिन उनके बहनोई सईद मुसलमान हो चुके थे। उनके साथ उमर की बहन फातिमा भी मुसलमान हो गई थी। कई दूसरे लोग भी मुसलमान हो गये थे। उनमें उनके घराने की एक दासी थी। उमर मुसलमानों के बैरी थे। वह उस दासी को खूब मारते थे। मारते-मारते थक जाते तो कहते, "जरा दम ले लूं तो फिर मारुंगा।"
वह दूसरे लोगों को भी सताते थे, लेकिन नये धर्म का नशा बड़ा तेज था। जिस पर चए़ जाता था, उतरता नहीं था। उमर बड़े परेशान हुए। एक भी आदमी धर्म नहीं छोड़ता। आखिर उन्ळोंने मुहम्मदसाहब को मार डालने का फैसला किया। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। बस, कमर में तलवार बांधी और घर से निकल पड़े।
राह में एक साथी मिल गये। इनके तेवर चढ़े देखे तो पूछा "किधर जा रहे हैं?"
जवाब दिया, "मुहम्मद का फैसला करने।"
साथी ने कहा, "पहले घर की खबर लो। तुम्हारी बहन और बहनोई दोनों इस्लाम को मान चुके है।"
उमर तुरन्त लौट पड़े। उसी तरह बहन के घर पहुंचे। बहन कुरआज पढ़ रही थी। आहट पाकर चुप हो गई। कुरआन छिपा दी; लेकिन आजवाज उमर के कानों में पड़ चुकी थी। पूछा, "क्या पढ़ रही थी?"
बहन ने जवाब दिया, "कुछ नहीं।"
बोले, "मैं सुन चुका हूं। तुम दोनों मुसलमान हो गये हो।"
यह कहकर वह बहनोई की तरफ झपटे। वह उनको मारना चाहते थे। बहन बचाने दौड़ी। उमर ने उसका चेहरा भी लहूलुहान कर दिया। पर वह डरी नहीं, झिझकी तक नहीं। बोली, "उमर, जो जी में आवे, करो।"
उमर का हाथ रुक गया। उसने अपनी बहन को देखा। उसके चेहरे पर एक भी शिकन नहीं थी। नहीं थी। डर नहीं था। आंखों में वही प्यार था। वह कह रही थी, "तू हमें इसलिए मारता है कि हम एक खुदा का मानते है। हां, मैं कहती हँ खुदा एक है, दूसरा कोई नहीं है। मुहम्मद उसका रसूल है। ले, अब मार डाल।"
उमर का दिल धड़कने लगा। इतने निडर, इतने साहसी हैं ये लोग! मौत से भी नहीं घबराते। इस्लाम में इतनी ताकत है। उन्होंने फिर बहन की तरफ देखा। उसके बदन से अब भी खून बह रहा था। उमर का दिल भर आया। ऑखों में प्यार झलकने लगा। बोले, "तुम जो पढ़ रही थीं, मुझे भी सुनाओं।"
फातमा कुरआन ले आई। उमर उसे पढ़ने लगे, गौर से पढ़ने लगे एक बारपढ़ा, दो बार पढ़ा, बार-बार पढ़ा। पढ़ चुके तो पुकार उठे, "अल्लाह एक है। मुहम्मद उसका रसूल है।"
इसके बाद बहन और बहनोई से माफी मांगी। फिर हजरत मुहम्मद के पास पहुंचे। दरवाजा खटखटाया।
किसी को भी इस नई कहानी का पता न था। कमर में तलवार बंध रही थी। वहॉँ जो लोग थे, वे कुछ घबराये। लेकिन एक साहब बोले, "आने दो। नीयत साफ है तो ठीक है, नहीं तो उसी तलवार से सिर काट दूंगा।
उमर भीतर आये। मुहम्मदसाहब आग बढ़े उनका दामन पकड़ कर बोले, "क्यों उमर, कैसे आये हो?"
उमर कांपने लगे। बोले "ईमान लाने के लिए।" यह सुनना था कि सब लोग एकदम पुकार उठे, "अल्हाहो अकबर!"
यह पुकान बड़ी तेज थी, इतनी तेज कि मक्का की तमाम पहाड़ियॉँ गूंज उठी। क्यों न गूंजती, उमर मुहम्मद के साथ मिल गये थे। उमर कुरैश के एक बहुत बड़े सरदार थे। उमर इस्लाम के भी बड़े आदमी हुए।
वह सबको बराबर समझते थे। गरीब और अमीर छोटे और बड़े सबका एक दरजा था। कहा करते थे, "अल्लाह नेकी और अच्छे कामों को देखता है। जन्म को नहीं देखता। उसकी नजर में सब बराबर है।" वह इन बातों को कहते हीं नहीं थे, मानते भी थे। वह अफसरों को भी टोकते रहते थे।
हजरत उमर के लिए राज करने का मतलब था सेवा करना। वह अपने को मालिक नहीं समझते थे। एक बार एक बड़े आदमी मिलने आये। साथ में और लोग भी थे। आकर देखा वह आस्तीन चढाये इधर-उधर दौड़ते फिरते है। उन्हें देखा तो बोले, "आओ, तुम भी मेरा साथ दो।" आनेवाले ने पूछा, "खैर तो है! क्या हो गया?"
बोले, "खजाने से एक ऊंट भाग गया है। एक ऊंट में कितने गरीबों का हक शामिल है।"
एक आदमी बोल उठा, "अमीरुल मोमनीन, आप क्यों परेशान हो रहे हैं? किसी गुलाम को कहिये, वह ढूंढ लावेगा।"
उन्होंने फौरन कहा, "मुझसे बढ़कर कौन गुलाम हो सकता है!"
वह बड़ी सादगी से रहते थे। जमीन पर सोते थे। खाना बड़ा सादा खाते थे। महीनों गेहूं का आटा घर में नहीं पकता था। छानते तो कभी भी नहीं थे। कपड़े भी सादे होते। अक्सर उनमें पैबन्द लगा रहता। बदन पर फटा हुआ कुरता, सिर पर फटा हुआ अमाया, पैरों में फटी हुई जूतियां। एकबार देर तक घर से नहीं निकले। बाहर लाग राह देख रहे थे। आये तो कारण मालूम हुआ। पहनने को कपड़े न थे, सो बदन के कपड़ों को धोया था। सूख गये तो पहन कर बाहर आये।
कभी कन्धे पर मशक लिये जा रहे है। बेवा औरतों के घर पानी भरना है। कभी मस्जिद के कोने में जमीन पर लेटे हैं। काम करते-करते थक गये हैं। बार-बार बादशाही काम से सफर करते, पर साथ में न खेमा, न शामियाना। न फौज, न फाटा। किसी पेड़ पर कपड़ा डाल दिया जाता। उसी की छॉह में इस्लाम का वह महान खलीफा आराम करता।
एक बार वह सीरिया गये। साथ में बस एक नौकर था। राह में आप उसके ऊंट पर सवार हो गये। शायद गलती से ऐसा हुआ था। जान-बूझ कर भी हो सकता है। जो हो, ऊंट बदल गया। उनका ऊंट कुछ सजा हुआ था। जब शहर में पहुंचे तो लोग स्वागत करने आये। बड़ा मजा आया। लोग नौकर की तरफ जाते। उसी को खलीफा समझते। वह हजरत उमर की तरफ इशारा करता। लोग हैरान-परेशान, आखिर खलीफा कौन से है? बेचारे शान शौकत ढूंढते थे, पर हजरत उमर के पास कहॉँ मिलती!
यह बात नहीं कि वह कंजूस थे। असल में उनको लोगों के सामने मिसाल रखनी थी। खुद ऐश करते तो लोगों से क्या कहते! वह जानते थे कि अफसर बिगड़ते जा रहे है। इसलिए अपने पर कुछ अधिक सख्ती करते थे।

जाट हिन्दू नहीं होते , जाटो और हिन्दुओ में धरती आसमान के समान अंतर होता हे

वन्दे जाटमातरम🙏🏼🙏🏼

जाट हिन्दू नहीं होते , जाटो और हिन्दुओ में धरती आसमान के समान अंतर होता हे ।

1-जाट दादा खेडा ,अपने ग्राम देवता को पूजते हे ।
और हिन्दू किसी भी पत्थर को पूजना शुरू कर देते हे ।

2-जाट का आदर बराबरी और भाईचारा हे ।जबकि हिन्दू इनका विरोधी हे ।जाट अपने साथ बसने वाली 36 बिरादरी को भाई मानता हे ।पर हिन्दू नहीं क्युकी इन्होने मनु व्यवस्था का प्रचार किया हे ।

3-जाट रिपब्लिकन सिस्टम में विश्वास करता हे ।खाप इसका उदारण हे ।जबकि हिन्दू खाप व्यवस्था का विरोधी रहा हे ।

4-जाटो में धार्मिक अन्धता व् धार्मिक कट्टरता के लिए कोई स्थान नहीं हे  इसका उदाहरण यह हे की जाट हर धर्म में हे ।इसीलिए हर धर्म की इज्जत जाट खून में समाहित हे ।
जबकि हिन्दू कट्टरवाद से ग्रस्त होते हे ।
5-जाट प्राचीन काल से विधवा विवाह कराते आये हे ।जबकि हिन्दू विधवा विवाह के खिलाफ रहे हे ।

6-जाटो में सती प्रथा का कोई स्थान नहीं हे ।जबकि हिन्दुओ में सती प्रथा प्रचलित रही हे ।

7- जाटो के क्षेत्र में विधवा आश्रम व् वृद्धाश्रम कही नहीं मिलेंगे ।जबकि हिन्दुओ के क्षेत्र में आपको विधवा आश्रम व् वृद्धाश्रम बहुलता में देखने को मिलेंगे ।

8-जाट पाखंडवाद का विरोधी रहा हे ।जबकि हिन्दू धर्म पाखंडवाद पर ही आधारित हे ।

9- जाट कभी अपने खून के रिश्ते में और नजदीक के रिश्ते में शादी नहीं करते ।जबकि साउथ में ब्राहमण और हिन्दू अपनी सगी भांजी से शादी करते हे ।बहन की बेटी से शादी करना इनके लिए पुण्य का काम होता हे ।
जाट ऐसा सोच भी नहीं सकते ।

10-जाट अपने गोत्र में कभी विवाह नहीं करते ।लेकिन हिन्दुओ में ऐसा कोई नियम नहीं हे ।वो अपने गोत्र में विवाह को ही महानता समझते हे ।

11-जाट अपनी सासू को माँ मानता हे ।जबकि बंगाली हिन्दू ब्राहमण अपनी पत्नी के देहांत पर सास के साथ शारीरिक सम्बन्ध बना सकता हे ।
12-जाट कभी एक ही गाँव में शादी नहीं करते ।जबकि हिन्दुओ में ऐसा कभी नहीं होता ।

13-जाट कभी भी अद्रश्य शक्तियों से नहीं डरते ।और व्यावान जंगलो में जाकर भी कृषि करते हे ।जबकि हिन्दुओ में भूत प्रेत का प्रकोप अत्यधिक होता हे ।

14- जाट अपनी जमीन को माँ के समान मानता हे ।इसीलिए जाट ने आज तक धर्म बदले देश छोड़े पर जमीन नहीं छोड़ी ।जबकि हिन्दू जरा सी परेशानी में जमीन बेचने में नहीं हिचकते ।

15-जाट आज भी ग्रामीण हे ।और गाँव को नहीं छोड़ता जबकि हिन्दू शहरीकरण में विश्वास करते हे ।

16-जाट हमेशा पशु प्रेमी रहा हे ।सर्वे के अनुसार पशुपालन में जाट पूरे एशिया में प्रथम स्थान पर हे ।जबकि हिन्दू धर्म के नाम पर बलि देते हे पशुओ की ।
बंगाल में काली के मंदिर में धडल्ले से बली दी जाती हे ।

17-जाट हमेशा से ही प्रकृति का प्रेमी रहा हे ।कृषि और वृक्षारोपण इसका उदाहरण हे । जबकि हिन्दू मंदिर और पाखंड के नाम पर नदियों और शहरो में गंदगी के नाम की मिसाल हे ।
बहुत कुछ हे जो हमे इन हिन्दुओ से अलग करता हे ।जाट एक नस्ल हे जिसकी मिसाल अंग्रेज,यहूदी,मुस्लिम सभी देते हे।

जाट हिन्दू नहीं हो सकता सुप्रीम कोर्ट ने तो 11 दिसंबर 1995 को एक केश की सुनवाई में कहा था की हिन्दू कोई धर्म नहीं हे ।
फिर जाट तो क्या कोई भी हिन्दू नहीं हो सकता 
हिन्दू ब्राहमण का एक शस्त्र हे जिसके प्रचार और प्रसार से वो सत्ता पर बैठा हे ।यह बस ब्राहमणवाद ही हे और कुछ नहीं ।दयानंद सरस्वती उर्फ़ मूलशंकर तिवारी गुजराती ब्राहमण का आर्य समाज भी जाट कौम के लिए श्रापित हे ।

पगड़ी संभाल जट्टा
दुश्मन पहचान जट्टा 
जय जाट इन्कलाब 
जय जाट एकता
From :shivraj chodhary

महान हस्तियों के सच :- कुछ प्रसिध्द मनुवादी लोग - जिन्हें हम विज्ञापन, उनकी नाटकीयता व अज्ञान के कारण नायक मानते हैं ।

महान हस्तियों के सच  :-
कुछ प्रसिध्द मनुवादी लोग  -  जिन्हें हम विज्ञापन, उनकी नाटकीयता व अज्ञान के कारण नायक मानते हैं ।
उन लोगों के नाम के साथ उनका कार्य...!

1 ) मोहनदास करमचंद गांधी  :-  गुजराती बनिया, कलयुग का मनु, मीठी छुरी, पाखंड़ी, छली, ऊपर से उदार, अन्दर घोर जातिवादी  -  साम्प्रदायिक, बाबासाहब व मूलनिवासीयों का पक्का विरोधी...!

2 ) जवाहर लाल नेहरू  :- कश्मीरी ब्राह्मण, गांधी का चहेता चेला, सत्ता लोलुपता के कारण कारण विभाजन करवाया, रसिक, ऊपर से उदार, अन्दर से दृढ़ मनुवादी, ब्राह्मणी वर्चस्व की नींव रखी...!

3 ) बाल गंगाधर तिलक  :- चितपावन ब्राह्मण, मूलनिवासीयों का पक्का व खुला विरोधी, घोर जातिवादी व साम्प्रदायिक, मनुवादी वर्चस्व व पेशवा ब्राह्मणशाही का सपना देखता था....!

4 ) रवीन्द्रनाथ टैगोर  :- बंगाली ब्राह्मण, रंगा सियार, छिपा मनुवादी, अंग्रेजों का चाटुकार कवि, जार्ज पंचम का स्तुतिगान  'जन गण मन'  लिखा, मनुवादी शैतानों ने इसे राष्ट्रगान बना दिया....!

5 )  लजपत राय  :-  पंजाबी बनिया, उदारता का नाटक, अछूतों का विरोधी, मनुवाद समर्थक, मनुस्मृति का प्रशंसक, हिन्दू महासभाईयों का गहरा मित्र, बगुला भगत, जनेव बांटकर मूर्ख बनाया...!

6 ) वल्लभ भाई पटेल  :-  दृढ़ पिछड़े नेता, गांधी  -  नेहरू के चंगुल में, खुद को पिछड़ा न मानते, प्रधानमंत्री पद से वंचित हुए, पिछड़ों के आरक्षण, बाबासाहब तथा महार  - बुध्दिष्ट व मुस्लिम के घोर विरोधी....!

7 ) विनोबा भावे  :-  चितपावन ब्राह्मण, गांधी का पक्का शिष्य, गांधी के बाद गांधीवादी छल को आगे बढ़ाया, इसने भूदान का नाटक करके सरकार द्वारा वास्तविक भू-सुधार को रोका....!

8 ) राम मोहन राय  :-  बंगाली ब्राह्मण, अंग्रेजों का सहयोगी, ब्रह्म समाज बनाकर समाज को मूर्ख बनाया, उसे सती-प्रथा व विधवा विवाह तो दिखा पर जाति-प्रथा व छुआछूत नहीं दिखा....!

09 ) बंकिमचन्द्र चटर्जी  :-  बंगाली ब्राह्मण, साहित्यकार-कवि, घोर जातिवादी व साम्प्रदायिक, अंग्रेजभक्त, देश-भक्ति एवं मुस्लिम विरोध फैलाकर शूद्रों ध्यान भटकाने का प्रयास किया....!

10 )  अरविन्द घोष  :-  बंगाली ब्राह्मण, उच्च आधुनिक शिक्षा प्राप्त मनुवादी, मनुवाद पर आध्यात्मिकता-दर्शन-तर्क-साहित्य का मुलम्मा चढ़ाया व इसने  'ब्राह्मण'  महामानव बताया है....!

11 )  एनी बीसेन्ट  :-  आईरिश शैतान उपासक फ्रीमसेन, मनुवाद-जातिवाद में गहरी आस्था, थीयोसॉफिकल सोसायटी एवं कांग्रेस में सक्रिय, अंग्रेजों-मनुवादियों में गहरा भाईचारा बनवाया....!

12 )  मदनमोहन मालवीय  :-  उत्तर भारतीय ब्राह्मण, चतुर किन्तु बहुत ही संकीर्ण, छुआछूत व जातिवाद में आस्था, अंग्रेजों का चहेता चाटुकार, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का संस्थापक....!

13 ) दयानन्द सरस्वती  :-  सरयूपारी ब्राह्मण, जातिवाद-छुआछूत व वेदों का समर्थक,  'आर्य समाज'  बनाकर व 'सत्यार्थ प्रकाश'  लिखकर मनुवादी को जिंदा किया, जनेव बांटकर खूब मूर्ख बनाया....!

14 )  गोलवलकर  :-  चितपावन ब्राह्मण, फुले-शाहु -अम्बेडकरी आन्दोलन का विरोधी, मुस्लिम शत्रू, मुस्लिम भय उत्पन्न कर मूलनिवासीयों में मनुवादी वर्चस्व को बनाए रखने का प्रयास किया....!

15 )  वी. ड़ी. सावरकर  :-  चितपावन ब्राह्मण, कट्टर व खुला मनुवादी, मनुवाद को जीवित करने के लिए हिन्दू महासभा बनाई, गांधी हत्या में आरोपित किन्तु सबूत अभाव से बच गया....!

16 ) के. बी. हेडगेवार  :-  चितपावन ब्राह्मण, बहुत चतुर - चालाक, महाराष्ट्र के फुले-शाहु-अम्बेडकरी आन्दोलन को समाप्त करने के लिए मुस्लिम भय दिखाकर विषवृक्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बनाया.....!

इन सारे ब्राह्मण पुरूषों ने केवल ब्राह्मणों के हित के लिए काम  (कार्य ) किया, बहुजनों के लिए नहीं...?

अम्बेडकर अनुयायियों को उमराव सालोदिया के इस आकस्मिक और एकाकी निर्णय ने निराश कर दिया है


उमराव सालोदिया का उमराव खान हो जाना
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राजस्थान के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी उमराव सालोदिया ने मुख्य सचिव नहीं बनाये जाने से नाराज हो कर स्वेच्छिक सेवा निवृति लेने तथा हिन्दुधर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने की घोषणा कर सनसनी पैदा कर दी है ।
राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार से अब न उगलते बन रहा है और न ही निगलते। यह सही बात है कि वरीयता क्रम में वे मुख्य सचिव बनने के लिए बिलकुल पात्र थे और यह भी सम्भव था कि वे राज्य के पहले दलित मुख्य सचिव बन जाते मगर भाजपा सरकार ने वर्तमान मुख्य सचिव सी एस राजन को तीन माह का सेवा विस्तार दे कर सालोदिया को वंचित कर दिया ।
सेवा एवम् धर्म छोड़ने की घोषणा करते हुए सालोदिया ने यह भी कहा कि उन्हें सेवाकाल के दौरान सामान्य वर्ग के एक व्यक्ति ने बहुत परेशान किया ,जिसकी प्राथमिकी दर्ज कराये जाने के बावजूद उस व्यक्ति के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गयी।सालोदिया ने यह भी कहा कि वे समानता की चाह में इस्लाम कबूल कर रहे है । हालाँकि उन्होंने यह भी बताया कि उनकी इस्लाम में रूचि लंबे समय से है और उन्होंने इस्लाम को भली भांति पढ़ समझ कर ही धर्मान्तरण का फैसला किया है।
उमराव सालोदिया अब उमराव खान बन चुके है।उनके धर्म परिवर्तन करने पर मिश्रीत प्रतिक्रियाएं आई है ।राज्य के गृह मंत्री गुलाब चन्द कटारिया ने इसे व्यक्तिगत निर्णय बताते हुए कहा कि अगर उनके साथ अन्याय हुआ है और उन्हें लगता है कि उन्हें वंचित किया गया है तो उसका विरोध उचित फोरम पर किया जा सकता था। चिकित्सा एवम् स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र सिंह राठौड़ ने इसे सेवा नियमों का स्पष्ट उल्लंघन करार देते हुए कहा कि वे पद पर रहते हुए इस तरह प्रेस वार्ता कैसे कर सकते है ।उन्हें दूसरे मान्य तरीके अपनाने चाहिए ।
यह तो निर्विवाद तथ्य है कि उन्हें मुख्य सचिव बनाया जाना चाहिये।यह उनका हक़ है जिसे सरकार ने जानबूझ कर छीना है मगर उनके इस तरीके और इस्लाम कबूल करने को लेकर दलित बहुजन आंदोलन ने भी कई सवाल खड़े करके उन्हें इस लड़ाई में अकेला छोड़ दिया है।
दरअसल विगत कुछ दिनों से दलित समुदाय के युवा सोशल मीडिया के ज़रिये उमराव सालोदिया को मुख्य सचिव बनाने की पुरजोर मांग कर रहे थे।इन उत्साही अम्बेडकर अनुयायियों को उमराव सालोदिया के इस आकस्मिक और एकाकी निर्णय ने निराश कर दिया है।अब तक उनके पक्ष में खड़े लोग ही अब पूंछ रहे है कि उमराव सालोदिया उमराव गौतम क्यों नहीं हुए ? जिस अम्बेडकर की वजह से वे इतने बड़े पद तक पंहुचे उनका मार्ग क्यों नहीं लिया खान साहब ने ?
दलित बहुजन आंदोलन को इस्लाम से ना तो परहेज़ है और ना ही कोई दिक्कत ,परेशानी उमराव सालोदिया के तरीके और निर्णय से है। बिना संघर्ष किये ही उनके नौकरी छोड़ने के निर्णय को पलायन माना जा रहा है तथा बुद्ध धर्म नहीं अपनाने की कड़ी आलोचना हो रही है।
दलित युवा सोशल मीडिया पर बहस छेड़े हुए है कि अब वे दलितों की समानता के मिशन के लिए काम करेंगे अथवा दीन की तब्लीग के लिए जमाती बन जाएंगे। यह भी प्रश्न उठाया जा रहा है कि अगर उनके साथ नौकरशाही में रहते हुए लंबे अरसे से अन्याय व भेदभाव हो रहा था तो वे इतने समय तक खामोश क्या सिर्फ मुख्य सचिव बनने की झूठी आशा में थे ? यहाँ तक पूंछा जा रहा है कि क्या अगर उन्हें चीफ सेकेट्री बना दिया जाता तो उनकी नज़र में हिन्दू धर्म समानता का धर्म हो जाता ? अब लोग यह भी जानना चाह रहे है कि क्या उन्होंने बौद्ध धर्म को पढ़ा है ?
जो उमराव सालोदिया को जानते है उनके मुताबिक वे कभी भी आंबेडकर की मुहिम में शामिल नहीं रहे है और ना ही उन्हें मुक्तिकामी कबीर, फुले, अम्बेडकर की विचारशरणी से कोई मतलब रहा है।यह भी कहा जा रहा है कि उन्हें समाज हित में एक सामूहिक फैसला ले कर नज़ीर स्थापित करनी चाहिए थी ।उन्हें अपने साथ हुए भेदभाव और वंचना के प्रश्न को समाज जागृति का हथियार बनाना चाहिए था मगर वे इससे चूक गए और इसे केवल निजी हित का सवाल बना डाला है।संभवतः उमराव सालोदिया से यह चूक इसलिए हुयी है क्योंकि उनका जुड़ाव समुदाय से लगभग नहीं के बराबर रहा है । वे पूरे सेवाकाल में इन्हीं लोगों के होने में लगे रहे जैसे अधिकांश बड़े दलित अधिकारी करते है।
यह बात कुछ हद तक सही भी है कि जो अधिकारी और राजनेता समाज से कट कर जीते है फिर उन्हें अपनी लड़ाई अक्सर अकेले ही लड़नी होती है और फिर वे ऐसे ही अदूरदर्शी निर्णय ले कर अपनी तथा अपने वर्ग की किरकिरी करा बैठते है।
बेहतर होता कि उमराव सालोदिया इस लड़ाई को थोडा पहले शुरू करते और अंत तक लड़ते ,मगर उन्होंने योद्धा बनने के बजाय भगौड़ा बनना स्वीकार किया है ,जिसका दलित बहुजन आंदोलन ने स्वागत करने से साफ इंकार कर दिया है।अब दलित किसी धर्म में मुक्ति नहीं देखते,क्योंकि उन्हें मुक्ति संघर्ष में दिखाई देती है पलायन में नहीं ।
- भंवर मेघवंशी
( लेखक स्वतन्त्र पत्रकार है ,उनसे Bhanwar meghwanshi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है

संविधान की जगह मनुस्मृति का प्रचार

बाबा साहेब को किस हद तक इस्तेमाल कर लेने की साजिश चल रही है। उसकी एक बानगी कल केंद्रीय मंत्री थावर चंद गहलोत के बयान में दिखी। उन्होंने कहा कि हालांकि बाबा साहेब ने राम मंदिर के बारे में कुछ नहीं कहा है। लेकिन चूंकि डॉ. अंबेडकर सभी धर्मों का सम्मान करने में विश्वास करते थे। इसलिए उनका भी मानना था कि अयोध्या में राम मंदिर बनना चाहिए। अब इस अपराध सरीखी बयानबाजी के बारे में क्या कहा जाए? अंबेडकर जिस धर्म की अमानवीय जाति-व्यवस्था, उसके कर्मकांड और बेहिसाब उत्पीड़न से परेशान होकर उसे छोड़े। अब वापस खींचकर उनको उसी की सेवा में लगाने की तैयारी चल रही है।

यानी अंबेडकरवाद को सिर के बल खड़ा किया जा रहा है। इस संघी अंडेबकर और असली बाबा साहेब के बीच 180 डिग्री का फासला होगा। इस पूरी प्रक्रिया में अंबेडकर को ही अंबेडकर के खिलाफ खड़ा कर दिया जाएगा। और एक वक्त ऐसा आएगा जब बाबा साहेब अपने संविधान की जगह मनुस्मृति का प्रचार कर रहे होंगे! लेकिन संघ को नहीं पता कि बाबा साहेब को पचा पाना इतना आसान नहीं है। गैरबराबरी पर आधारित ब्राह्मणवादी जाति-व्यवस्था का पेट फाड़कर वह बाहर निकल आएंगे।             Aimbscs Organiger BALAGHAT.

शंकराचार्य को भीम सैनिक का जवाब


मोदी के भारत को बुद्ध का देश कहने पर शंकराचार्य पूछ रहा था कि "बुद्ध का क्या उपकार है भारत पर ?" 
पहुँचा दो उसके कानों तक एक भीम सैनिक का दिया जवाब-

लुटेरे बनकर जब तुम आर्य भारत भू पर आये थे,
लूटपाट औ' धोखाधड़ी के मेघ सिंधु घाटी पर छाये थे |

करके परास्त हमको तुमने,ब्रह्मा,विष्णु बना लिये,
राम,कृष्ण सरीखे तैंतीस कोटि देव भी गिना दिये |

शूद्र बताकर जब तुमने वर्णों की गुलामी थोपी थी,
भोली-भाली धरती पर कील भेदभाव की रोपी थी |

तिल-तिल मरती मानवता को, तब जिसने बचाया था,
सत्य,अहिंसा,प्रेम,दया का पाठ बुद्ध ने ही पढाया था ||

वेद-पुराणों-महाकाव्यों का जब कुनबा जोड़ा था,
धर्म के नाम पर शूद्रों की आँखों को फोड़ा था |

त्रेता में तुम बंदरों को बिन पंखों के उडा़ते थे,
पत्थर की क्या बात करें, पहाड़ तक उठवाते थे |

तुम्हारे कृष्ण को गोपियां छेड़ने में शर्म नही आती थी,
शकुंतला जैसी बिन पति के गर्भवती हो जाती थी |

घर में घुटती नारी को जिसने मुक्ति पथ दिखाया था,
सत्य,अहिंसा,प्रेम,दया का पाठ बुद्ध ने ही पढाया था ||

अब सुनकर नाम उनका, क्यों पेट में कीड़े चलते हैं,
तेरे जैसे ढोंगी नित धर्म के नाम पर लोगों को छलते हैं |

सच सुनकर पचा सके, ऐसी तेरी औकात नही,
भारत बने देश उनका, राम-कृष्ण में वो बात नही |

भारत कैसे भूलेगा,नालंदा-तक्षशिला सब जानता,
बुद्ध के धम्म से जग सारा,था विश्व गुरु इसे मानता |

देव तुम्हारे थे नित लड़ते, उसने महल ठुकराया था |
सत्य,अहिंसा,प्रेम,दया का पाठ बुद्ध ने ही पढाया था ||

-एक कट्टर भीम योद्धा