Saturday, January 2, 2016

डॉ भीमराव अम्बेडकर के जीवन की सच्ची प्रेरणादायक बातें - संकलन: निखिल सबलानिया



बाबासाहेब डॉ. बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की ईमानदारी का ऐतिहासिक प्रसंगअम्बेडकर की ईमानदारी का ऐतिहासिक प्रसंग

1943 में बाबसाहेब श्रम मंत्री थे और पी डब्ल्यू डी विभाग भी उन्हीं के पास था। डॉ अम्बेडकर के इस विभाग का प्रमुख बनने से पहले इस विभाग का सालाना बजट एक करोड़ रूपये का था जो डॉ अम्बेडकर के प्रमुख बनने के बाद पचास करोड़ रूपये सालाना का हो गया था क्योंकि दिल्ली का विकास करना था और डॉ अम्बेडकर को इसलिए मुखिया बनाया गया था क्योंकि वह एक, शिक्षित, बुद्धिमान, ईमानदार और उच्च चरित्र के आदरणीय व्यक्ति थे। 30-6-1944 को दिल्ली के एक बड़े करोड़पति ठेकेदार के पुत्र बाबासाहेब के बेटे यशवंत राव से दिल्ली में मिले और उनसे कहा कि यदि वह डॉ अम्बेडकर को सरकारी ठेके दिलवाने के लिए मनवा ले तो वह यशवंत को उन ठेकों में भागिदार बना लेंगे और 25%-50% तक कमीशन देंगे। माननीय यशवंत मान गए। उसी शाम जब डॉ अम्बेडकर को यह बात पता चली तो वह अपने पुत्र पर इतने आग बबूल हो गए कि की यशवंत को उसी रात यह कहते हुए वापिस बॉम्बे (मुंबई) भिजवा दिया कि : " मैं यहाँ पर केवल सारे अछूत (दलित) समाज के उद्धार के ध्येय को लेकर आया हूँ। अपनी संतान को पालने नहीं आया हूँ। ऐसे लोभ-लालच मुझे मेरे ध्येय से डिगा नहीं सकते।" डॉ अम्बेडकर के पुत्र को उसी रात भूखे पेट ही बॉम्बे के लिए रवाना होना पड़ा। - (यह घटना पुस्तक 'युगपुरुष बाबासाहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर' में लिखी है। 

बाबासाहेब डॉ अम्बेडकर की दलितों के उत्थान के प्रति सच्ची निष्ठा का एक ऐतिहासिक प्रसंग

एक बार इंग्लैंड की एक पत्रिका के प्रतिनिधि वहां से भारत यहां के प्रमुख नेताओं के इंटरव्यू लेने को आए। उन्हें मिस्टर गांधी से मिलने का समय रात्रि 9 बजे मिला, मिस्टर जिन्ना से मिलने का समय 9:30 (साढ़े नौ बजे) का मिला और डॉ अम्बेडकर ने कहा कि वह किसी भी समय आ सकते हैं। जब वह मिस्टर गांधी से मिलने गए तो उनसे कहा गया कि वह सो गए हैं सो अगले दिन आए। जब वहमिस्टर जिन्ना के घर पहुंचे तो उनके यहां भी यही कहा गया कि वह सो गए हैं सो गए हैं सो अगले दिन आए। इस बीच डॉ अम्बेडकर के पास पहुंचने में उन्हें देर हो गए और वह रात के 12:00 (बारह बजे) डॉ अम्बेडकर के घर पहुंचे तो यह देख कर आश्चर्यचकित रह गए कि बाबासाहेब अपनी पूर्ण वेशभूषा में अध्यन्न करते हुए उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। इंग्लैंड के लोगों ने यह दखते हुए आश्चर्य से उनसे कहा, "आश्चर्य है, देश के दो महान नेता मिस्टर गांधी और मिस्टर जिन्ना, हमको सोए हुए मिले लेकिन आप अभी तक अपनी नियमित ड्रेस में हमारी प्रतीक्षा में जाग रहे हैं !" बाबासाहेब ने उत्तर दिया " मिस्टर गांधी और मिस्टर जिन्ना आराम से सोते हैं, क्योंकि उनका समाज जागृत है - उनका समाज जागरूक है। मैं जाग रहा हूँ, क्योंकि मेरा समाज सोया हुआ है - अनभिज्ञ है, वह उनके समाज की भांति जागरूक नहीं है। " इंग्लॅड से आए पत्रकार यह सुन कर अवाक् रह गए।


(यह प्रसंग पुस्तक 'युगपुरुष बाबासाहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर' में दिया है।)


कैसे बाबासाहेब डॉ अम्बेडकर ने तैयार की दलितों में से पहले गजेटेड अफसरों की फ़ौज


ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत में अछूतों (दलितों), हिन्दुओं, सीखो, मुसलमानों और ईसाईयों को गोलमेज सम्मलेन में प्रतिधित्व के अधिकार दिए गए जिसे 1935 के संविधान में रखा गया। उसके तहत मुसलमानों, सिखों और ईसाईयों को तो आरक्षण दिया गया परन्तु दलितों को तब भी वंचित रखा गया क्योंकि सरकार में तब भी अफसर बामण-बणिया थे और अपनी बामणवादी विकृत मानसिकता के कारण वह दलितों को उनको मिले अधिकारों से वंचित रखना चाहते थे। मुस्लमान, सिख, और ईसाई दलितों की तुलना में हर प्रकार से बहुत ताकतवर समूह थे सो उनके आरक्षण का कड़ाई से पालन किया जाता था और यहां तक कि उनका आरक्षण न भरा जाने पर उनके स्थानों को हिन्दुओं से भी नहीं भरा जाता था और यदि ऐसा होता तो यह समूह आंदोलन करते थे। पर बाबासाहेब डॉ अम्बेडकर को इस बात की चिंता थी कि दलितों को प्रतिनिधित्व से वंचित रखा जा रहा था। सरकार ने केवल एक आदेश जारी किया पर उस पर काम तो बामण-बणिया सरकारी अधिकारीयों ने ही करना था और वह उसका पालन नहीं कर रहे थे। फिर 1943 में डॉ अम्बेडकर श्रम मंत्री बने। बनते ही उन्होंने अपनी पार्टी 'शेड्यूल कास्ट फेडरेशन' के भारत भर के दफ्तरों में यह सन्देश भिजवाया कि जो भी ग्रेजुएट (स्नातक) दलित युवक मिले उनको दिल्ली भेजा जाए। सारे भारत में खोज शुरू हो गई और बंगाल, आसाम, उड़ीसा, बिहार (झारखण्ड), तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र (गुजरात), मध्य प्रदेश (छत्तीसगढ़), राजस्थान, पंजाब (हरियाणा और हिमाचल प्रदेश), उत्तर प्रदेश (उत्तराखंड) और दिल्ली में जो भी शेड्यूल कास्ट के ग्रेजुएट मिले उन्हें बाबासाहेब ने अपने पास बुलवाया और उन्हें गजेटेड पोस्टों पर नियुक्त करवाया। उन्ही में से एक डी. संजीवया बाद में आँध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री, भारतीय कांग्रेस के अध्यक्ष और केंद्र में मंत्री बने। सैकड़ों वर्ष बाद अछूतों को देश का शासन करने के लिए शासक वर्ग का अंग बाबासाहेब ने इस प्रकार बनाया। यह था बाबासाहेब डॉ अम्बेडकर का आश्चर्यजनक संघर्ष और चमत्कार। 


डॉ अम्बेडकर के पुस्तक प्रेम की प्रशंसा

मिस्टर जॉन मुंथर ने अपनी पुस्तक 'इनसाइड एशिया' (1938) में लिखा है कि "बाबासाहेब का निजी पुस्तकालय, व्यक्तिगत पुस्तकालयों में संसार में सबसे बड़ा था।" उन्होंने यह भी लिखा है कि "लोग रहने के लिए मकान बनाते हैं, लेकिन डॉ अम्बेडकर ने पुस्तकों के लिए अपना 'राजगृह' बनवाया है। " सन 1938 में उनके पुस्तकालय में लगभग 8000 किताबें थी। वह संख्या उत्तरोत्तर बढ़तीही गई, घटने का तो प्रश्न ही नहीं था। (1956 में बाबा साहेब के परिनिर्वाण के समय उनके निजी संग्रह में पचास हज़ार पुस्तकें थी। )

मेरे लोगों का पेट भरते ही दूसरी कौम वालों की नौकरी की चिंता लग जाती है - डॉ अम्बेडकर

मुझे (लेखक को) बाबासाहेब ने उद्योग विभाग में इन्स्पेक्टर सिविल सप्लाईज -पंजाब में रु 400 - 800 के ग्रेड में, केंद्र सरकार की ऊंची नौकरी पर नवम्बर, 1943 में नियुक्त करवाया था। मेरा प्रधान कार्यालय लाहौर में था। मैं लाहौर विश्वविद्यालय का पोस्ट ग्रेजुएट था। बहुत समय तक लाहौर का सार्वजनिक विद्यार्थी रहा था। वहाँ पर मेरे एक साथी थे। वे हिंदू थे। उन्होंने एम. ए. (इंग्लिश) किया था। मैं संस्कृत का एम. ए. , एम्. एल. ओ. था। लेकिन हम दोनों गहरे मित्र थे। बाबासाहेब के स्नेह और उनकी कृपा से मेरी अच्छी अधिकार संपन्न नौकरी लग गई थी। किन्तु अभी मेरी नौकरी लगी ही थी। मैं प्रायः पंजाब से यानी लाहौर से बाबासाहेब की चरण वंदना करने दिल्ली हर साप्ताह आता जाता था।

          उन्हीं के बंगले पर ठहरता था। 20 दिसंबर, 1943 के दिन प्रात: कालीन नाश्ता करते समय बाबासाहेब के प्रसन्न मन को जान कर मैंने यों ही बाबासाहेब से प्रार्थना की कि मेरे एक दोस्त को भी कहीं नौकरी पर लगवा दें। मैंने अपने हिंदू दोस्त की सारी योग्यताओं को बताया। उसके बायोडाटा का कागज़ उनके सामने रख दिया । 
          उस कागज़ को पढने के बाद बाबासाहेब ने मेरी और गंभीरता से देखा और कहा, "मेरे लोगों का पेट भरते ही दूसरी कौम वालों की नौकरी की चिंता लग जाती है।" उस समय दूसरे लोग-कुछ अधिकारी और आगंतुक भी टेबल पर साथ ही बैठे थे। लगभग सभी अपने ही लोग थे। बाबासाहेब मेरी और देखते हुए बोले, "हमारे लोग आजतक परोपकार करने में अपने आप को गौरवशाली समझते हैं। देखो इस लड़के को, अभी-अभी नौकरी पर लगा है, इसे हमारे समाज के गरीब लोगों की शिक्षा की चिंता नहीं है। इसे अपने हिंदू मित्र की चिंता है? अपने लोगों की सहायता करने के लिए मैं केंद्रीय सरकार या प्रांतीय सरकारों में एक अकेला हूँ। जबकि हिंदू या मुसलमान अपने धर्म के शिक्षित लड़कों की सहायता करने के लिए हजारों आफिसर और मंत्री विद्यमान हैं। ऐसे परोपकार करनेवाले हमारे समाज में ही मिलेंगे!" इस सम्बन्ध में उन्होंने एक एतिहासिक कथा भी सुनाई:-
          "चौदहवीं सदी में गोधरा (गुजरात) में महाराजा कृष्ण प्रसाद का राज्य था। उसके राज्य में अकाल पडा। बामण ज्योतिषियों ने राजा को बताया कि यदि नगर के विशाल तालाब में किसी मनुष्य की बलि दी जाए तो उससे जलदेवी, जो स्वयं प्यासी तड़प रही है, मनुष्य के खून को पीकर तृप्त होगी और वर्षा कर देगी। महाराज ने अपने सारे राज्य में ढिंढोरा पिटवाया कि जो कोई भाई जल की देवी के लिए अपना बलिदान करेगा उसे महापुण्य का फल प्राप्त होगा और वह स्वर्ग में जा कर महादिव्य सुख पाएगा। उसके बलिदान से जलदेवी प्रसन्न होकर सारी प्रजा के लिए जल की वर्षा करेगी। बलिदान की तिथि निश्चित कर दी गई और तालाब पर राजा का यज्ञ आरम्भ हो गया। लेकिन निश्चित तिथि तक किसी भी हिंदू धर्म वाले ने, अपनी बलि देने के लिए अपने आप को स्वर्ग जाने की इच्छा से राज ज्योतिषी के सुपुर्द नहीं किया। राजाज्ञा का कोई प्रभाव उसकी हिंदू प्रजा पर नहीं पडा। वर्षा न होने के कारण चारों और त्राहि - त्राहि मच रही थी। बामणों को छोड़ कर सभी प्यासे और भूखे मर रहे थे। बामनों में राजा अन्न बाँट रहा था। तालाब पर तमाशा देखने के लिए लोग हजारों की संख्यां में एकत्र हुए थे। बहुत से बकरे-बकरियों और गायों को काट-काट कर वर्षा की देवी पर चढ़ाया जा चुका था। अब केवल नर-बलि ही करना बाकी रह गया था। फिर से ढिंढोरा पिटा गया लेकिन उसके बाद भी कोई हिंदू आगे नहीं आया। तब एक भूखा अधनंगा, दीनहीन आदमी भीड़ में से निकला और उसने अपनेआप को बलि होने के लिए राजा के सुपुर्द किया। वह व्यक्ति अछूत था। वह जंगल में वास करता था। उसी तालाब में बामणि हत्यारों ने उसका गला काट दिया। उसके बलिदान से वर्षा हुई या नहीं, इस सम्बन्ध में इतिहास लिखने वाले चुप हैं लेकिन नर-बलि से वर्षा होती तो संसार में कहीं पर भी अकाल नहीं पड़ता। इसिलए यह केवल बामणि धोखेबाजी थी। ठीक यही अवस्था हमारे लोगों की है। अत्याचार करनेवाले, शोषण करनेवाले और दिन दहाड़े हमारी झोपड़ियों में आग लगानेवालों की रक्षा करने के लिए हमारे लोग सदा ही तैयार रहते हैं।" मेरी ओर इशारा करते हुए बाबासाहेब ने कहा - "इस लड़के की कुर्बानी इससे कम नहीं है। यह अपने बंधू-बांधवों और समाज के बेरोजगार नौजवानों की सहायता करे। इसी में समाज की भलाई है।"


डॉ भीमराव आंबेडकर का पुस्तक प्रेम - सच्ची बातें



पढ़ना-लिखना डॉ भीमराव आंबेडकर के जीवन की सबसे बड़ी ख़ुशी थी। इसका एक उद्देश्य था, उनके जीवन में यह उनका लक्षय था कि अपने आपको हर संभव शस्त्रास्त्र से लैस करे, ज्ञान का भण्डार अर्जित करे और मानसिक शक्ति विकसित करके और भी ऊँची उपलब्धियों और उस नई ज़िन्दगी के लिए स्वयं को तैयार करें, जो उनके लिए एक महान कैरियर के द्वार और संभावनाएं खोलनेवाली थी। 

डॉ आंबेडकर बड़े पढ़ाकू थे। उनकी पुस्तकों का संग्रह देश में सबसे विपुल और विविध था। पुस्तकों और ज्ञानार्जन की उनकी पिपासा कभी शांत नहीं होती थी और गंगा की तरह अजस्त्र थी। वह कहते थे, "मेरी पुस्तकें मेरी साथी रही हैं, वह मुझे पत्नी और बच्चों से भी अधिक प्यारी हैं।" पुस्तकें डॉ आंबेडकर के जीवनभर उनकी महान और सच्ची  मित्र रहीं। पुस्तकों की संगती में उन्हें अपार आनंद और सुख का अनुभव होता था। पुस्तकें उन्हें गम्भीरतापूर्वक औरों से ऊपर और अलग रखती थीं। वह उनके उनके लिए आत्म-विकास, शिक्षा, मनोरंजन और आनंद का सबसे बड़ा साधन थीं। उन्हें मनुष्य की संगती की अपेक्षा पुस्तकों की संगती में अधिक आनंद मिलता था। वह अपना एक क्षण भी नष्ट नहीं करते थे और पूरी शांति व तन्मयता से पढ़ने-लिखने में बहुत आनंद लेते थे। कभी-कभी वह मौन धारण कर लेते थे और कई तरह की पुस्तकें एक साथ पढ़ते थे और अचानक एक पुस्तक रख कर दूसरी उठा लेते थे। वह घंटी की टन-टन, गाड़ियों की गड़गड़ाहट, हथौड़े की ठक-ठक, कर, टैक्सी और बसों की चिल्ला-पौं से दूर रहना चाहते थे। सुबह-सुबह जब उनका कुत्ता जब उनकी थपथपाहट के  लिए उनके पास आता था, तभी उन्हें पता चलता था कि सुबह हो चुकी है। 

जब वह गहन अध्यन्न में जुटे होते थे, तब तक कोई भी व्यक्ति बाधा डालने का साहस नहीं कर सकता था। व्यापारियों के लिए समय ही पैसा होता है, किन्तु, डॉ आंबेडकर के साथ तो समय ने एक परम्परा का रूप ले लिया था जो उनके नाम के इर्द-गिर्द घूमता था। 

उन्हें दोस्त बनाना भी नहीं आता था। इसका एक कारण यह था कि उन्हें मनुष्यों से अधिक पुस्तकों का साथ अच्छा लगता था और वह अधिकाँश समय पढ़ने लिखने और सोचने में लगे रहते थे। ज्ञान की उनकी पिपासा एक साम्राज्य की पिपासा थी और उनके जीवन की सबसे बड़ी चाहत पुस्तकें थी। दुर्लभ पुस्तकों के संग्रह को वह बेहद लालायित रहते थे. कभी-कभी वह अपने मित्रों से इस आधार पर दुर्लभ पुस्तकें ले-लेते थे कि उनकी कॉपी करवा कर लौटा देंगे, और उन दिनों यह बड़ा मुश्किल काम होता था।  

कभी अगर वह घर पर नहीं होते थे तो उन्हें ढूंढना किसी के लिए भी मुश्किल नहीं होता था। घर के अलावा वह बस पुस्तकालयों और पुस्तकों की दुकान में ही मिलते थे। उनकी राय थी कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आमदनी का दस प्रतिशत पुस्तकों पर खर्च करना चाहिए। 

संकलन: निखिल सबलानिया www.cfmedia.in



डॉ. भीमराव अम्बेडकर का काम पूरा करेगा आर्थिक रूप से मजबूत समाज

डॉ भीमराव अम्बेडकर का वह काम है : बराबरी वाले समाज की स्थापना करना। पढ़िए पूरा लेख और जानिए कि कैसे इस काम को पूरा करेगा आर्थिक रूप से मजबूत समाज।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने अपने जीवन में आर्थिक विषमताओं से जूझते हुए भारत के पिछड़े और शोषित लोगों के उत्थान के कार्य पूरे किए। अपने जीवनकाल में उन्हें बहुत बार ऐसी कठिन आर्थिक परिस्थितियों से जूझना पड़ा जिनकी वजह से उन्हें कई बार अपने कई सामाजिक और राजनैतिक कार्यों को रोकना पड़ा। बेशक बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर उन विषम आर्थिक परिस्थितियों से भी जूझते रहे, परन्तु फिर भी उन्होंने अपने कामों का कारवां कभी नहीं रोका। वह विषम आर्थिक परिस्थिति में भी अपने कारवां को बढ़ाते रहे और पिछड़े और शोषित समाज के अधिकारों, सम्मान और सुरक्षा के लिए निरंतर प्रयत्नरत रहे और अपने प्रयत्नों में सफल भी रहे। परन्तु फिर भी अपने जीवन में कई बार उन्होंने इस बात का अफ़सोस किया कि उनके और उनकी संस्थानों के पास उतना धन नहीं था जितना कि उन लोगों के पास था जो शोषण करते थे और अपने राजनैतिक और धार्मिक संस्थानों को चला रहे थे। धन की कमी को बाबा साहेब अक्सर कहा करते थे और अपने जीवन के अंतिम दिनों में भी उनकी यह चिंता थी। 

अपने जीवन के अंतिम कुछ दिनों में भी बाबा साहेब को इसी बात की चिंता थी कि उनकी संस्थानों के पास धन की कमी है। बिमारी की हालत में भी वह चंद हज़ार रुपयों को अपनी पार्टी के बैंक खाते में जमा करवाना चाहते थे जिससे कि उनके बाद भी पार्टी का काम चलता रहे। लोगों से मिले धन को उन्होंने कभी अपना नहीं समझा और न ही वह कभी गलत तरीके से कमाए धन पर अपनी नज़र रखते थे। वह एक सच्चे ईमानदार व्यक्ति थे और अपने गरीब लोगों के धन को बहुमूल्य मानते थे। परन्तु उस समय उनके अनुयाईयों के पास धन अधिक मात्रा में नहीं था और उनके बाद न ही तो उनके अनुयायी धन के सही स्रोत्र ही पैदा कर पाए और न ही धन को संचय कर पाए जिसकी वजह से उनके जाने के बाद आज भी उनके कार्य रुके पड़े हैं और धन की वह व्यवस्था नहीं बन पाई है जिससे कि उनके कार्यों को आगे बढ़ा कर पूरा किया जा सके। 

डॉ. अम्बेडकर के कार्यों को पूरा करने के लिए एक ऐसे सामाजिक ढाँचे को खड़ा करने की जरुरत है जो बराबरी और न्याय में विशवास रखता हो। एक ऐसा सामाजिक ढांचा जहाँ लोग चरित्रवान हों, जहाँ ईमानदारी, सच्चाई और मानवता व्याप्त हो। एक ऐसा सामाजिक ढांचा जो जातीपति न मानता हो और आर्थिक रूप से कमजोरों को उठाने के निरंतर प्रयास करनेवाला हो। एक ऐसा समाज जहाँ मानवीय भावना इतनी मजबूत हो कि उस ढाँचे के लोग एक दूसरे को मारने-काटने या लूटने की जगह, एक दूसरे की भलाई की बाते सोचें। 

डॉ. भीमराव अम्बेडकर के उस कार्य, उस सामाजिक ढाँचे को खड़ा करने के कार्यों को आगे बढ़ाना अपनेआप में एक विशाल कार्य है। उस विशाल कार्य में आते हैं अनगिनत कार्य। सामाजिक शिक्षा, राजनैतिक शिक्षा, बौद्ध धम्म की शिक्षा, मानवता की शिक्षा और शिक्षा के साथ-साथ राजनैतिक, सामाजिक और धम्म के संस्थाओं को खड़ा करना, जो पहले से ही खड़े हैं उन्हें विकसित करना और भविष्य के लिए उनको सुरक्षित करना। यह सारे काम करने के लिए भावना, दृढ़ संकल्प, मेहनत और शिक्षा के साथ जो बहुत महत्वपूर्ण पर्याय की आवश्यकता है वह है धन। और धन को उपलब्ध करा सकते हैं ऐसी धनी लोग जो डॉ. अम्बेडकर के कार्यों को पूरा करने के लिए दृढ़ संकल्प हों। और वह धनी लोग उसी सामाजिक ढाँचे से ही आ सकते हैं जिस ढाँचे के लिए डॉ. अम्बेडकर काम कर रहे थे। परन्तु उस ढाँचे में आज भी उतने धनी और संपन्न लोग नहीं हैं जो कि इतना धन उपलब्ध करा सकें जिससे कि डॉ. अम्बेडकर के कार्यों को पूरा किया जा सके। डॉ. अम्बेडकर शिक्षा, नौकरियों और सामाजिक न्याय की व्यवस्था तो संविधान के माध्यम से उपलब्ध करा गए थे पर शायद वह कुछ और वर्ष रहते तो धन की व्यवस्था भी कर देते। 

पर आज हमें उनके कार्यों को पूरा करना है और उनका वह कार्य जो शायद वह अपने और कुछ वर्षों में करते, कि धन की व्यवस्था करते, उस कार्य को आज हमें पूरा करना है। हमें धन, धनी, धनी बनने वाले और धनी बनाने वाले लोगों की जरुरत है। धन की शिक्षा, व्यवसाय की शिक्षा और उस शिक्षा पर चलते हुए धन संचय और धन के स्रोत्र पैदा करना एक ऐसा बड़ा कार्य है जिस पर उन अनगिनत लोगों का भविष्य टिका है जो आज एक दमनकारी सामाजिक ढाँचे में फंसे हुए हैं। आज से सौ वर्षों पहले जो लोग उस दमनकारी ढांचे में फंसे थे आज उनकी एक पीढ़ी ऐसी बन चुकी है जो डॉ. अम्बेडकर की दिलाई सुविधा से शिक्षित और नौकरीपेशा बन चुकी है। परन्तु अभी भी इस पीढ़ी में धन की वह शक्ति नहीं है जिससे कि यह डॉ. अम्बेडकर के कार्यों को पूरा कर पाएं। और साथ ही नौकरीपेशा होने की वजह से इन्हें वह शिक्षा और अनुभव प्राप्त नहीं हो पाता जो व्यवसाय (बिज़नेस) और निवेश ( इन्वेस्टमेंट ) करने वालों को होता है।  इसलिए आज इस पीढ़ी के लिए जरुरत है कि वह अपनी और शिक्षाओं के साथ धन की शिक्षा भी लें। वह यह शिक्षा भी लें कि धन कैसे बनाया जाता है और कैसे बढ़ाया जाता है। धन को बनाना और बढ़ाना कोई तिगड़म ( ट्रिक ) नहीं है बल्कि एक शिक्षा है जो कि अनुभव के साथ बढ़ती और विकसित होती है।  जीवन में हर सफल काम को करने के लिए उस काम की शिक्षा की आवश्यकता होती है और इसीलिए धन को बनाने और बढ़ाने के लिए भी इसकी शिक्षा की आवश्यकता है। 

यह अफ़सोस का विषय है कि धन को बनाने और बढ़ाने की शिक्षा न स्कूलों में और न ही कालेजों में ही मिल पाती है। यह शिक्षा कुछ अनुभवी लोग ही जानते हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी से व्यवसाय करते आ रहे हैं। और सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक विषमता झेलने वाले लोगों में तो यह शिक्षा न के बराबर ही है। एक तो व्यवसाय और निवेश से चंद लोग ही जुड़े हैं, दूसरे, धन की शिक्षा भी नहीं है, इन सबके मिश्रण से एक ऐसा अज्ञान सामाजिक ढांचा खड़ा होता है जहाँ "निर्भरता और असहायता" लोगों की जनसंख्या के साथ और अधिक बढ़ती जाती है। वह लोग जो धन के लिए नौकरियां पाने के लिए धनी लोगों पर निर्भर होते हैं और यह निर्भरता पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ती ही जाती है और फिर वही लोग असहाय होते हैं क्योंकि वह धन की शिक्षा और उसके अभाव में धन बनाने और बढ़ाने के स्रोत्र नहीं पैदा कर पाते। तो कल तक जो लोग डॉ. अम्बेडकर की दिलाई सुविधाओं के अभाव में अपने उत्थान के कार्यों को करने में असमर्थ थे, वहीं उनकी नई पीढ़ी जो आज थोड़े सम्मानजनक और अधिकारपूर्ण जिंदगियों को जी रही हैं, वह भी धन के अभाव में अपने पूर्वजों की तरह निर्भर और असहाय ही हैं और वह कार्य जो उनके पूर्वजों ने शुरू किए थे उन्हें आगे बढ़ाने में असक्षम हैं। 

तो धन की शिक्षा के लिए जरुरी है कि उसकी शिक्षा ली जाए। उस शिक्षा को लेने के लिए जरुरी है कि उस शिक्षा से जुड़े शिक्षाविदों से ज्ञान प्राप्त किया जाए और साथ ही वह कार्य किए जाएं जिससे कि धन को बनाना और बढ़ाना सीख सकें।  व्यवसाय और निवेश दो ऐसे तरीके हैं जिनसे कि धन बनाने और बढ़ाने के स्रोत्रों को पैदा किया जाता है। यदि इनकी शिक्षा ली जाए तो वह कार्य किए जा सकते हैं जिससे कि वह सामाजिक ढांचा खड़ा किया जा सके जिसके लिए डॉ. भीमराव अम्बेडकर समस्त जीवनभर प्रयत्ननशील रहे। परन्तु धन के अभाव में वह अपने कार्यों को और विस्तृत रूप नहीं दे पाए जो विस्तृत रूप शोषण करने वाले लोग दे पाते थे क्योंकि शोषण करने वालों के पास न केवल धन बहुत अधिक मात्रा में ही था बल्कि उनकी नज़रें केवल और केवल धन और धन के स्रोत्रों पर ही टिकी रहती थीं। आज भी उसी शोषण करने वालों की पीढ़ियों के द्वारा ही समस्त सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक, न्यायिक, व्यावसायिक, शैक्षिक, सुरक्षा और संचार की संस्थाएं चल रही हैं। इन सब व्यवस्थाओं पर अपना वर्चस्व कायम कर गैरबराबरी वाले ढाँचे को ज्यों-का-त्यों रखा जाता है और यदि उस ढाँचे को गिराने की कोशिश की जाती है तो उस चुनौती को भी चपलता और चालाकी से समाप्त कर दिया जाता है। इसलिए जरुरत है उस पर्याय को पाने की जिससे कि डॉ. अम्बेडकर के बराबरी वाले कार्यों को मजबूत और विस्तृत किया जाए। और उसके लिए जरुरी है कि धन, धनी और धन के स्रोत्र बनाने वाली शिक्षा का अध्यन्न और प्रचार किया जाए। 

यदि आप भी धन की शिक्षा लेना चाहते हैं तो आप हमारी सात पुस्तकों का सैट जरूर पढ़ें। मेरा यह लेख पढ़, सुन या देख कर यह न समझें कि यह कोई व्यवसाय का प्रचार है, यह प्रचार है शिक्षा का, उस शिक्षा का, जिसकी सबसे ज्यादा जरुरत, गरीब, शोषित व कमजोर लोगों को होती है। जीवन में सबसे बहुमूल्य है समय, इसलिए यदि आप यह पुस्तकें खरीद भी लें परन्तु यदि आप इन्हें पढ़ने और इनकी सीख पर अमल करने में अपना समय नहीं लगाते तो आपकी सबसे बड़ी हानि होती है क्योंकि आप धन लगा कर भी समय नहीं दे पाए और यह शिक्षा पाने का अवसर जीवन में गँवा दिया। इसलिए जरुरी है कि आप अपने समय का सदुपयोग करें और इस शिक्षा को ग्रहण करने में अपना समय लगाएं। हो सकता हो कि आप में वह गुण उत्पन्न हो जाएं जिनसे कि आप धन को बनाना और बढ़ाना सीख सके और फिर डॉ. भीमराव अम्बेडकर के कार्यों को और विकसित और विस्तारित कर पाएं। - निखिल सबलानिया 


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Friday, January 1, 2016

चमार मूलत बौद्ध है-ओशो



चमार मूलत बौद्ध है-ओशो
यह जान कर तुम हैरान
होओगे कि चमार मूलत:
बौद्ध हैं! जब भारत से
बौद्ध धर्म उखाड़ डाला
गया और बौद्ध भिक्षुओं
को जिंदा जलाया गया
और बौद्ध दार्शनिकों को
खदेड़ कर देश के बाहर कर
दिया गया, तो एक
लिहाज से तो यह अच्छा
हुआ। क्योंकि इसी कारण
पूरा एशिया बौद्ध हुआ।
कभी—कभी दुर्भाग्य में
भी सौभाग्य छिपा होता
है।


जैन नहीं फैल सके क्योंकि
जैनों ने समझौते कर लिए।
बच गए, लेकिन क्या
बचना! आज कुल तीस—
पैंतीस लाख की संख्या
है।

 Chamar Troops
पांच हजार साल के
इतिहास में तीस—पैंतीस
लाख की संख्या कोई
संख्या होती है! बच तो
गए, किसी तरह अपने को
बचा लिया, मगर बचाने में
सब गंवा दिया।



बौद्धों ने समझौता नहीं
किया, उखड़ गए। टूट गए,
मगर झुके नहीं। और उसका
फायदा हुआ। फायदा यह
हुआ कि सारा एशिया
बौद्ध हो गया। क्योंकि
जहां भी बौद्ध—
दार्शनिक और मनीषी
गए, वहीं उनकी प्रकाश
—किरणें फैलीं, वहीं
उनका रस बहा, वहीं लोग
तृप्त हुए। चीन,
कोरिया…… दूर—दूर तक
बौद्ध धर्म फैलता चला
गया। इसका श्रेय हिंदू
पंडितों को है।

जो भाग सकते थे भाग गए।
भागने के लिए सुविधा
चाहिए, धन चाहिए। जो
नहीं भाग सकते
थे— इतने दीन थे, इतने
दरिद्र थे— वे हिंदू
जमात में सम्मिलित हो
गए। लेकिन हिंदू जमात में
अगर सम्मिलित होओ तो
सिर्फ शूद्रों में ही
सम्मिलित हो सकते हो।
ब्राह्मण तो जन्म से
ब्राह्मण होता है, और
क्षत्रिय भी जन्म से
क्षत्रिय होता है, और
वैश्य भी। सिर्फ अगर
किसी को हिंदू धर्म में
सम्मिलित होना है तो
एक ही जगह रह जाती
है
— शूद्र, अछूत। वह असल में
हिंदू धर्म के बाहर ही है,
मंदिर के बाहर ही है। हो
जाओ शूद्र अगर बचना है
तो।
तो जो बौद्ध बच गए और
नहीं भाग सके और
मजबूरी
में सम्मिलित होना पड़ा
हिंदू धर्म में, वे ही बौद्ध
चमार हैं, वे ही बौद्ध
चमार हो गए। और क्यों
चमार हो गए? एक कारण।
कभी किसी ने सोचा
भी न
होगा बुद्ध के समय में कि
यह कारण इतना बड़ा
परिणाम लाएगा।
जिंदगी बड़ी रहस्यपूर्ण
है।-
ओशो (रैदाशवाणी.मन हि पुजा मन हि
धूप)



आरक्षण बहुत सही गणित है



साथियो,
आरक्षण 
बहुत सही गणित है 
जरा ध्यान दे हमारे गणित पर । 
वैसे तो मेरी गणित बहुत कमजोर रही है पर फिर भी मैं अपनी बात आप लोगों तक गणित के माध्यम से ही पहुंचाना चाहता हूं।।
माना कि 100 व्यक्ति हैं।।
और इन 100 व्यक्तियों कोे खाने के लिए 100 रोटियां हैं।।
वर्तमान में पिछड़ी जाति OBC के 60 व्यक्तियों को खाने के लिए 27 रोटियों की व्यवस्था है।।
इसी तरह अनुसूचित जाति SC व जनजाति ST के 25 व्यक्तियों के एक समूह के लिए 22.5 रोटियों की व्यवस्था है।।
अब सामान्य वर्ग के तकरीबन 15 आदमियों के लिए 50 रोटियां शेष बचती हैं।
पर समस्या ये है कि सामान्य वर्ग GENERAL के 15 आदमियों में से 3% ब्राम्हण जाति के आदमी बेहद शक्तिशाली हैं जो शेष बची 50 रोटियों में से लगभग 45 रोटियां खा जा रहे हैं।
अब समस्या ये है कि सामान्य वर्ग के 12 आदमियों के लिए मुश्किल से सिर्फ 5 रोटियां ही मिल पा रहीं है।


इसी कारण सामान्य जाति के जाट, मराठा, लिंगायत, पटेल या पाटीदार अपने लिए ओबीसी OBC की 27 रोटियों में हिस्सेदारी मांग रहे हैं।
अब समस्या ये है कि ओबीसी OBC के 60 लोग वैसे ही सिर्फ 27 रोटियों पर गुजारा करके अपनी जिंदगी चला रहे हैं ऐसे में वो जाट, मराठा और लिंगायत में अपने हिस्से की 27 रोटियां बांटने को हरगिज तैयार नही हैं।।
इस समस्या का एक ही समाधान है कि कोर्ट द्वारा निर्धारित की गई 50% आरक्षण की सीमा रेखा को लांघा जाऐ और जाट, मराठा, और लिंगायत के साथ साथ सभी जातियों को उनकी संख्या के अनुपात में शिक्षा & नौकरियों में आरक्षण दिया जाऐ।।
अब 60 लोगों के हिस्से की 27 रोटियों पर झपट्टा मारने से बात नही बनेगी ।। जरूरत इस बात की है कि सारी पिछड़ी जाति OBC के लोग और जाट, गूजर , अहीर , यादव , गडरिया , सुनार, लोहार , कुम्हार , कश्यप , निसाद , कुशवाहा , सैनी माली , मराठा, लिंगायत, पटेल आदि एक मंच पर आऐं और उन 3% ब्राम्हण लोगों से अपना हिस्सा छीने जो सिर्फ 3% होकर 45 रोटियां तोड़े जा रहे हैं।।
अगर ये ब्राह्मण जाति के 3 लोग सिर्फ 3 रोटी खाकर जीना सीख ले तो समाज मे कोई भी भूखा नहीं रहेगा।।


अच्छा लगे तो हर ग्रुप में, SC/ST व पिछड़ा वर्ग OBC के प्रत्येक कॉन्टेक्ट पर कई बार रिपीट करो । सभी में जागरूकता पैदा करने का अभियान चलाओ । 
जय मुलनिवासी .....जय भारत।।

इंडियन करेंसी नोट पर बौद्धकालीन अशोक स्तंभ ही होना चाहिए



Dilip C Mandal · 
इंडियन करेंसी नोट पर बौद्धकालीन अशोक स्तंभ ही होना चाहिए. और कुछ नहीं. आजादी के बाद राष्ट्रीय सहमति से ऐसा ही था.
कांग्रेस ने खुराफात करके इसमें गांधी की तस्वीर लगाकर गड़बड़ी की शुरुआत की.
अब बीजेपी इसमें घुसेगी तो बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के बहाने, लेकिन बाद में अपने सारे सड़े-गले नेताओं, प्रतीकों को ले आएगी. हेडगेवार से लेकर गोलवलकर और अशोक सिंघल तक, पता नहीं कैसे कैसे नमूने होंगे...इन्हें रास्ता मिल गया तो पूरी गंदगी मचा देंगे.
बीजेपी की नीयत साफ है तो यह नोटिफिकेशन लाए कि सिर्फ बाबा साहेब. लेकिन वह, घालमेल किए बिना रह नहीं सकती.
फिर कोई अगली सरकार अपने हिसाब से कुछ को खारिज करेगी, और अपनी पसंद के नए चेहरे करेंसी पर ले आएगी. अंतहीन विवादों का सिलसिला चल पड़ेगा.
प्रश्न यह है कि क्या इस देश को और नए नए विवादों की जरूरत है?
इसलिए, करेंसी नोट पर अशोक स्तंभ के अलावा कुछ नहीं!

भारत की सवर्ण जातियों की खोजे जिनसे इन्होने विश्व में देश का नाम रोशन किया हुआ है

भारत की सवर्ण जातियों ( ब्राह्मण, बनिया, और ठाकुर) की शिकायत है कि आरक्षण की वजह से देश का विकास रुक गया है |
आरक्षण से पहले इन लोगो ने बहुत आविष्कार और खोजे की थी जो कि इस संसार में अन्य कहीं मिलना नामुमकिन है |

 आइए जानते है इनकी ऐसी ही कुछ खोजो और अविष्कारों के बारे में 
जिनसे इन्होने विश्व में देश का नाम रोशन किया हुआ है ---

१. इनकी सबसे महत्त्वपूर्ण खोज वर्ण व्यवस्था और जातियों की खोज थी | इन्होने मनुष्यों को 6743 से अधिक जातियों में बाँट दिया | इतनी अधिक जातियों की खोज करना क्या कोई आसान काम है ?
सोचिये बेचारों को इतनी अधिक जातियों को खोजने में कितना अधिक परिश्रम करना पड़ा होगा |

२. इनकी दूसरी महत्वपूर्ण खोज ३३ करोड़ देवी-देवताओं की खोज है | ये खोज इन्होने उस समय की, जब देश की कुल आबादी भी ३३ करोड़ नहीं थी|

सोचिये !!

इतने सारे देवी देवताओ की खोज में बेचारों को कितना पसीना बहाना पड़ा होगा ?
अजी रात दिन एक कर दिए होंगे बेचारों ने |

३. आज चाहे वैज्ञानिक अभी तक दूसरे ग्रहों पर जीवन की तलाश नहीं कर पाए लेकिन ये लोग बहुत पहले ही ऐसे दो लोकों की तलाश कर चुके हैं जहाँ पर जीवनमौजूद है और वो ग्रह
 हैं --

स्वर्ग लोक जहाँ पर अलौकिक शक्तियों के स्वामी देवता निवास करते हैं और नरक लोक |

३. विश्व के देशों ने चाहे कभी भी परमाणु बम,हाइड्रोजन बम जैसे विनाशकारी बमों का निर्माण किया हो लेकिन ये उससे बहुत पहले ही ऐसे ऐसे अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण कर चुके थे जो पूरी सृष्टि का विनाश करने में सक्षम थे | इन्होने उसको नाम दिया ब्रह्मास्त्र |

इन्होने आज तक किसी आक्रमणकारी शत्रुओं के खिलाफ उसका प्रयोग क्यों नहीं किया ये अलग शोध का विषय है| 
बाहर से कुछ सौ हजारों की संख्या में आक्रमणकारी आते रहे और इनको ३३ करोड़ शस्त्रधारी देवताओं के साथ धूल चटाते रहे ये अलग बात है |

४. वैज्ञानिक बेशक आज तक मनुष्य की उम्र बढ़ाने और उसको अजर, अमर बनाने की औषधि नहीं खोज पाए हो लेकिन ये अब से कई युगों पहले मनुष्य को अमरता का रसास्वादन करवा चुके है ये अलग बात है इनके द्वारा अमर किये गए अश्वत्थामा जैसे मानव कभी भी देखने को नहीं मिलते हैं |

५. बेशक विश्व में कभी भी आकाशवाणी का प्रसारण भारत मे बाद में हुआ लेकिन ये उससे बहुत पहले ऐसी व्यवस्था का निर्माण कर चुके थे जिससे किसी युद्ध का आँखों देखा हाल बिना किसी भी कैमरा जैसे यंत्र की मदद के दिव्यदृष्टि के द्वारा किया जा सकता था लेकिन उसके बाद में उसका प्रयोग इन्होने क्यों नहीं किया ये अलग एक विचारणीय प्रश्न है. 

६. विश्व का कोई भी देश आज तक सूर्य पर नहीं पहुँच सका है लेकिन ये अबसे पहले सूर्य पर होकर आ चुके हैं।

७. सूर्य को फल की तरह खाया भी जा सकता है ये भी अकेली इनकी ही खोज थी |

८. बेशक राईट बंधुओ को हवाई जहाज के अविष्कार के निर्माण के श्रेय दिया जाता हो लेकिन ये उससे बहुत पहले ही पुष्पक विमान का निर्माण कर चुके थे | उसके बाद इनकी वायुयान निर्माण कला को क्या हुआ ये आज तक रहस्य है |

९. संजीवनी बूटी जैसी चमत्कारिक औषधि भी इन्हीं की खोज थी जिससे किसी भी मृत मनुष्य को जीवित किया जा सकता था लेकिन आज वो औषधि कहाँ हैं ये इनको भी आज तक नहीं पता है |

१०.आज बेशक देश में सूखा पड़ता हो और और लोग पानी को तरसते हो लेकिन ये अब से युगों पहले आकाश में तीर मारकर बारिश करवा सकते थे आज ये उसका प्रयोग क्यों नहीं करते ये भी एक रहस्य है।

११. एक गर्दन पर दस-दस तक सिर और एक कंधे पर हजारों हाथ उग सकते हैं ये भी इनकी ही बुद्धिमता की खोज है |

१२. समुन्द्र यात्रा से मनुष्य गल जाता है ये भी इनकी ही महत्वपूर्ण खोज है |

१३. पशु पक्षियों में भी मानवीय संवेदना होती है और वो भी मानव की भाषा बोल और समझ सकते हैं ये भी इनकी ही खोज है |

१४. मानव क्लोन बनाने की कला में तो ये सिद्धहस्त थे| अगर किसी मनुष्य के रक्त की बूंदे धरती पर पड़ जाती थी तो जितनी बूंदे धरती पर पड़ती थी उसके उतने ही क्लोन पैदा हो जाते थे |

१५. मानव रक्त भी कोल्ड ड्रिंक और चाय की तरह पिया जा सकता है ये भी इनकी ही महत्त्वपूर्ण खोज थी |

१६. बच्चे बिना औरत मर्द के पैदा भी किये जा सकते है ये भी इनकी ही खोज थी |
ये मानव शिशु छींक कर, 
सेब को खाकर,
खीर पीकर,
शरीर के पसीने द्वारा,
पशु पक्षियो के गर्भ द्वारा भी पैदा करवा सकते थे |

१७. वानर-रीछ जैसे जीव भी बिना पंखो के उड़ सकते हैं ये भी इनकी ही खोज थी |

१८. एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के स्पर्श से, उसकी छाया से भी भ्रष्ट हो सकता है ये भी इनकी ही खोज थी |

१९. पशु भी मानव
(ST/SC/OBC)
से ज्यादा शुद्ध और पवित्र होता है ये भी इनकी ही खोज थी|

२०. मानव जो
(SC/ST/OBC) हैं उनके स्पर्श से भ्रष्ट हुआ मनुष्य पशुओं का मूत्र पीकर, या मूत्र छिड़ककर पवित्र हो सकता है ये भी इन्ही की खोज थी |

२१. स्त्री और शूद्र दोयम दर्जे के नागरिक है इनकी अपनी कोई इच्छा नहीं होती | इनके कोई अधिकार नहीं होते | इनको अपनी इच्छा के अनुसार प्रयोग किया जा सकता है ये भी इन्ही की खोज थी |

२२. पूजा-अर्चना और हवन के द्वारा भी बारिश करवाई और रोकी जा सकती है ये भी इन्ही की खोज थी |

२३. अगर किसी स्त्री को एक ही पुरुष में उपयुक्त पति नहीं मिलता है तो वो पांच या उससे अधिक भी आदमियों को अपने पतियों के रूप में स्वीकार कर सकती है ये भी इन्ही की खोज थी|

२४. माता एक औरत को पांच भाइयो के बीच में किसी वस्तु की तरह बाँट सकती है ये भी इन्ही की खोज थी |

२५. अगर किसी औरत का गर्भपात हो जाता है तो उसका भ्रूण नष्ट होने से बचाया जा सकता है और उस भ्रूण को सौ टुकडो में बांटकर सौ या उससे अधिक संताने पैदा की जा सकती हैं ये भी इनकी ही खोजथी |

२६. मानव और जानवर के सिर आपस में बदले जा सकते हैं ये भी इनकी ही खोज थी |

२७. मानव और हाथी का रक्त ग्रुप एक होता है ये भी इनकी ही खोज थी |

२८. चूहे पर बैठकर भी मनुष्य सवारी कर सकता है ये भी इनकी ही खोज थी|

२९. वैज्ञानिक बेशक आज तक किसी मनुष्य का भविष्य बताने में सक्षम न हो लेकिन ये किसी का भी भूत,भविष्य और वर्तमान बताने में सक्षम है |

३०. पृथ्वी, सूर्य,चन्द्र, मंगल, बुद्ध, बृहस्पति, शुक्र, शनि,सोम जैसे गृह भी जीवित प्राणी ही नहीं देवता भी हैं जो किसी का शुभ और अशुभ कर सकते हैं | ये भी इन्ही की खोज थी |

कितनी महान खोजे है इनकी जिनसे विश्व में भारत का नाम रोशन हुआ है लेकिन आरक्षण वालों ने आकर इनकी योग्यता को रोक का रख दिया है| 
बेचारे अब ऐसे अविष्कार और खोजें नहीं कर सकते है |
....
जय भीम             जय भारत

समस्त एस०सी०/एस०टी० सांसद, 117वॉ संविधान संशोधन (प्रोन्नति में आरक्षण बिल) लोकसभा में पास कराओ या इस्तीफा दो

सेवा में
          सर्व श्री, 

समस्त एस०सी०/एस०टी० सांसद, भारत सरकार

विषय:-117वॉ संविधान संशोधन (प्रोन्नति में आरक्षण बिल) लोकसभा में पास कराओ या इस्तीफा दो

महोदय/महोदया
             आपको भली भांति अवगत है कि 117 वां संविधान संसोधन बिल राज्य सभा से पारित हो चुका है और लोक सभा में लम्बित है।जब कि यह बिल 1995 से लम्बित था आप जिस पार्टी से जनता का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं उस सरकार ने अपनी दलितविरोधी मानसिकता का उदाहरण दे दिया है।
   आप यूपी से लोक सभा की उन सीटों से सांसद है जो भारत के संविधान में उल्लेखित प्रतिनिधत्व अधिकार पर संरक्षित है इसलिए आज आप सांसद है और संसद मे दलित समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं किन्तु आप अपने दलित समाज के अधिकारो के लिए संसद मे आवाज क्यों नहीं उठाते हो।
         आप की सरकार पूर्ण बहुमत की सरकार है आप सभी दलित सांसद सरकार पर दबाव क्यों नहीं बनाते हो। ऐसी क्या मज़बूरी है की आप सामूहिक रूप से प्रधानमंत्री को इस्तीफा क्यों नही सौंप देते है क्यों आप सक्रिय भूमिका नहीं अपनाते हो??
       आप भी बाबा साहेब को धोखा दे रहे हो। आप समाज के प्रति ज़िम्मेदार नहीं हो। आप ने आरक्षण के बल पर सांसदी तो ले ली लेकिन आप उन लाखों लोगों की ओर नहीं देख रहे हैं जो आप की निष्क्रियता के कारण तमाम कानूनी/ सरकारी बाध्यताओं को झेलने को मजबूर है कुछ तो शर्म करो।
       यदि आप सक्रिय भूमिका नहीं अदा कर सकते तो आप या तो बिल पास कराओ या समाज के लोगो के बीच मत जाओ। आप का समाज के लोग इस्तीफा मांग रहे हैं आप चुन सकते हैं 

सांसदी या समाज। 

वर्ना वो दिन दूर नही जब समाज के लोग बहिष्कार करंगे।
   अतः आप से आग्रह है कि 117वॉ संविधान संशोधन बिल पास कराओ या इस्तीफा दो। 


भवदीय
देवेन्द्र  कुमार
अध्यक्ष,एससी/एसटी एसोसिएशन  
एस.बी.आई.,पटना मंडल 

" इस मैसेज को इतना शेयर करें कि सभी दलित सांसदों तक पहुँच जाये।
 आपकी रगों में सच्चे दलित का खून है तो कम से कम 10 लोगों को शेयर करें ।"