Friday, January 1, 2016

मनुस्मुर्ति में क्या कहा है


जय भीम दोस्तों, आज"मनुस्मृति दहन दिवस" है।
आज ही के दिन
बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर ने 25
दिसम्बर 1927
को महाराष्ट्र के महाड में इस सबसे बर्बर और
कुख्यात ग्रन्थ
"मनुस्मृति" को जलाया था। जिसके के कारण
हम सदियों से
गुलामी और जिल्लत का जीवन जीने के लिए
विवश थे। आओ हम
भी मनुस्मृति जलायें और इस दिन
को "मानवाधिकार
मुक्ति दिवस" के रूप में मनायें।
जाने "मनुस्मुर्ति" में क्या कहा हैं यह देखिये- १-
पुत्री,पत्नी,माता या कन्या,युवा,व्रु
द्धा किसी भी स्वरुप में
नारी स्वतंत्र नही होनी चाहिए. -
मनुस्मुर्तिःअध्याय-९
श्लोक-२ से ६ तक. २- पति पत्नी को छोड
सकता हैं, सुद
(गिरवी) पर रख सकता हैं, बेच सकता हैं, लेकिन
स्त्री को इस
प्रकार के अधिकार नही हैं.
किसी भी स्थिती में, विवाह के
बाद, पत्नी सदैव पत्नी ही रहती हैं. -
मनुस्मुर्तिःअध्याय-९
श्लोक-४५ ३- संपति और मिलकियत के
अधिकार और दावो के
लिए, शूद्र की स्त्रिया भी "दास" हैं,
स्त्री को संपति रखने
का अधिकार नही हैं,
स्त्री की संपति का मलिक
उसका पति,पूत्र, या पिता हैं. - मनुस्मुर्तिःअध्
याय-९
श्लोक-४१६. ४- ढोर, गंवार, शूद्र और नारी, ये
सब ताडन के
अधिकारी हैं, यानी नारी को ढोर की तरह
मार सकते
हैं....तुलसी दास पर भी इसका प्रभाव दिखने
को मिलता हैं, वह
लिखते हैं-"शुद्र, गमार, ढोल, पशु, नारी, सकल ताड़न के अधिकारी." -
मनुस्मुर्तिःअध्याय-८ श्लोक-२९९ ५- असत्य
जिस तरह अपवित्र
हैं, उसी भांति स्त्रियां भी अपवित्र हैं,
यानी पढने का, पढाने
का, वेद-मंत्र बोलने का या उपनयन
का स्त्रियो को अधिकार
नही हैं.- मनुस्मुर्तिःअध्याय-२ श्लोक-६६ और
अध्याय-९
श्लोक-१८. ६- स्त्रियां नर्कगामीनी होने के
कारण वह
यग्यकार्य या दैनिक अग्निहोत्र भी नही कर
सकती.(इसी लिए
कहा जाता है-"नारी नर्क का द्वार") -
मनुस्मुर्तिःअध्याय-११
श्लोक-३६ और ३७ . ७- यग्यकार्य करने
वाली या वेद मंत्र बोलने
वाली स्त्रियो से किसी ब्राह्मण भी ने भोजन
नही लेना चाहिए, स्त्रियो ने किए हुए
सभी यग्य कार्य अशुभ
होने से देवो को स्वीकार्य नही हैं. -
मनुस्मुर्तिःअध्याय-४
श्लोक-२०५ और २०६ . ८- - मनुस्मुर्ति के
मुताबिक तो ,
स्त्री पुरुष को मोहित करने वाली - अध्याय-२
श्लोक-२१४ . ९ -
स्त्री पुरुष को दास बनाकर पदभ्रष्ट करने
वाली हैं. अध्याय-२
श्लोक-२१४ १० - स्त्री एकांत का दुरुप्योग करने
वाली.
अध्याय-२ श्लोक-२१५. ११. - स्त्री संभोग के
लिए उमर
या कुरुपताको नही देखती. अध्याय-९
श्लोक-११४. १२-
स्त्री चंचल और हदयहीन,पति की ओर
निष्ठारहित होती हैं.
अध्याय-२ श्लोक-११५. १३.- केवल शैया, आभुषण
और
वस्त्रो को ही प्रेम करने वाली, वासनायुक्त,
बेईमान,
इर्षाखोर,दुराचारी हैं . अध्याय-९ श्लोक-१७.
१४.- सुखी संसार
के लिए स्त्रीओ को कैसे रहना चाहिए? इस
प्रश्न के उतर में मनु
कहते हैं- (१). स्त्रीओ को जीवन भर
पति की आग्या का पालन
करना चाहिए. - मनुस्मुर्तिःअध्याय-५
श्लोक-११५. (२).
पति सदाचारहीन हो,अन्य स्त्रीओ में आसक्त
हो, दुर्गुणो से
भरा हुआ हो, नंपुसंक हो, जैसा भी हो फ़िर
भी स्त्री को पतिव्रता बनकर उसे देव की तरह
पूजना चाहिए.-
मनुस्मुर्तिःअध्याय-५ श्लोक-१५४. जो इस
प्रकार के उपर के ये
प्रावधान वाले पाशविक रीति-नीति के
विधान वाले पोस्टर
क्यो नही छपवाये? (१) वर्णानुसार करने के
कार्यः - -
महातेजस्वी ब्रह्मा ने स्रुष्टी की रचना के लिए
ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र को भिन्न-
भिन्न कर्म करने
को तै किया हैं - - पढ्ना,पढाना,यग्य करना-
कराना,दान
लेना यह सब ब्राह्मण को कर्म करना हैं.
अध्यायः१:श्लोक:८७ -
प्रजा रक्षण , दान देना, यग्य करना, पढ्ना...यह
सब क्षत्रिय
को करने के कर्म हैं. - अध्यायः१:श्लोक:८९ -
पशु-पालन , दान
देना,यग्य करना, पढ्ना,सुद(ब्याज) लेना यह वैश्य
को करने
का कर्म हैं. - अध्यायः१:श्लोक:९०. - द्वेष-
भावना रहित,
आंनदित होकर उपर्युक्त तीनो-
वर्गो की नि:स्वार्थ
सेवा करना, यह शूद्र का कर्म हैं. -
अध्यायः१:श्लोक:९१. (२)
प्रत्येक वर्ण की व्यक्तिओके नाम कैसे हो?:- -
ब्राह्मण का नाम
मंगलसूचक - उदा. शर्मा या शंकर - क्षत्रिय
का नाम शक्ति सूचक
- उदा. सिंह - वैश्य का नाम धनवाचक
पुष्टियुक्त - उदा. शाह -
शूद्र का नाम निंदित या दास शब्द युक्त - उदा.
मणिदास,देवीदास - अध्यायः२:श्लोक:३१-३२.
(३) आचमन के
लिए लेनेवाला जल:- - ब्राह्मण को ह्रदय तक
पहुचे उतना. -
क्षत्रिय को कंठ तक पहुचे उतना. - वैश्य को मुहं
में फ़ैले उतना. -
शूद्र को होठ भीग जाये उतना, आचमन
लेना चाहिए. -
अध्यायः२:श्लोक:६२. (४) व्यक्ति सामने मिले
तो क्या पूछे?:- -
ब्राह्मण को कुशल विषयक पूछे. - क्षत्रिय
को स्वाश्थ्य विषयक
पूछे. - वैश्य को क्षेम विषयक पूछे. - शूद्र
को आरोग्य विषयक पूछे.
- अध्यायः२:श्लोक:१२७. (५) वर्ण
की श्रेष्ठा का अंकन :- -
ब्राह्मण को विद्या से. - क्षत्रिय को बल से. -
वैश्य को धन से. -
शूद्र को जन्म से ही श्रेष्ठ मानना.(यानी वह
जन्म से ही शूद्र हैं)
- अध्यायः२:श्लोक:१५५. (६) विवाह के लिए
कन्या का चयन:- -
ब्राह्मण सभी चार वर्ण की कन्याये पंसद कर
सकता हैं. -
क्षत्रिय - ब्राह्मण कन्या को छोडकर
सभी तीनो वर्ण
की कन्याये पंसद कर सकता हैं. - वैश्य - वैश्य
की और शूद्र की ऎसे
दो वर्ण की कन्याये पंसद कर सकता हैं. - शूद्र
को शूद्र वर्ण
की ही कन्याये विवाह के लिए पंसद कर
सकता हैं.-
(अध्यायः३:श्लोक:१३) यानी शूद्र को ही वर्ण
से बाहर अन्य
वर्ण की कन्या से विवाह नही कर सकता. (७)
अतिथि विषयक:-
- ब्राह्मण के घर केवल ब्राह्मण
ही अतिथि गीना जाता हैं,(और
वर्ण की व्यक्ति नही) - क्षत्रिय के घर ब्राह्मण
और क्षत्रिय
ही ऎसे दो ही अतिथि गीने जाते थे. - वैश्य के
घर
ब्राह्मण,क्षत्रिय और वैश्य तीनो द्विज
अतिथि हो सकते हैं,
लेकिन ... - शूद्र के घर केवल शूद्र
ही अतिथि कहेलवाता हैं -
(अध्यायः३:श्लोक:११०) और कोइ वर्ण का आ
नही सकता... (८)
पके हुए अन्न का स्वरुप:- - ब्राह्मण के घर
का अन्न अम्रुतमय. -
क्षत्रिय के घर का अन्न पय(दुग्ध) रुप. - वैश्य के
घर का अन्न जो है
यानी अन्नरुप में. - शूद्र के घर का अन्न रक्तस्वरुप
हैं यानी वह
खाने योग्य ही नही हैं. (अध्यायः४:श्लोक:१४)
(९) शब को कौन
से द्वार से ले जाए? :- - ब्राह्मण के शव को नगर
के पूर्व द्वार से ले
जाए. - क्षत्रिय के शव को नगर के उतर द्वार से
ले जाए. - वैश्य के
शव को पश्र्चिम द्वार से ले जाए. - शूद्र के शव
को दक्षिण
द्वार से ले जाए. (अध्यायः५:श्लोक:९२) (१०)
किस के सौगंध लेने
चाहिए?:- - ब्राह्मण को सत्य के. - क्षत्रिय
वाहन के. - वैश्य
को गाय, व्यापार या सुवर्ण के. - शूद्र को अपने
पापो के
सोगन्ध दिलवाने चाहिए. (अध्यायः८:श्लोक
:११३) (११)
महिलाओ के साथ गैरकानूनी संभोग करने हेतू:- -
ब्राह्मण अगर
अवैधिक(गैरकानूनी) संभोग करे तो सिर पे मुंडन
करे. - क्षत्रिय
अगर अवैधिक(गैरकानूनी) संभोग करे तो १०००
भी दंड करे. - वैश्य
अगर अवैधिक(गैरकानूनी) संभोग करे
तो उसकी सभी संपति को छीन ली जाये और
१ साल के लिए
कैद और बाद में देश निष्कासित. - शूद्र अगर
अवैधिक(गैरकानूनी)
संभोग करे तो उसकी सभी संपति को छीन
ली जाये ,
उसका लिंग काट लिआ जाये. - शूद्र अगर
द्विज-जाती के साथ
अवैधिक(गैरकानूनी) संभोग करे तो उसका एक
अंग काटके
उसकी हत्या कर दे. (अध्यायः८:श्लोक
:३७४,३७५,३७९) (१२)
हत्या के अपराध में कोन सी कार्यवाही हो?:-
- ब्राह्मण
की हत्या यानी ब्रह्महत्या महापाप.(ब्रह्मह
त्या करने
वालो को उसके पाप से
कभी मुक्ति नही मिलती) - क्षत्रिय
की हत्या करने से ब्रह्महत्या का चौथे हिस्से
का पाप लगता हैं.
- वैश्य की हत्या करने से ब्रह्महत्या का आठ्वे
हिस्से का पाप
लगता हैं. - शूद्र की हत्या करने से
ब्रह्महत्या का सोलह्वे हिस्से
का पाप लगता हैं.(यानी शूद्र
की जिन्द्गी बहोत सस्ती हैं) -
(अध्यायः११:श्लोक:१२६)

भारत में धर्म और विज्ञान का कभी टकराव नहीं हुआ

चर्च ने 1481 और 1808 के बीच लगभग 32,000 लोगों को जिंदा जला दिया. इनमें से ज्यादातर वे थे, जो चर्च के फैलाए अंधविश्वास के खिलाफ थे, विज्ञान की बात कर रहे थे, चर्च के दबदबे को विचार के स्तर पर चुनौती दे रहे थे. (प्रोफेसर जॉन विलियम ड्रेपर, हिस्ट्री ऑफ द कन्फ्लिक्ट बिटविन रिलीजन एंड साइंस, पेज नंबर- 278.) पश्चिम में विज्ञान, धर्म और आस्था से टकराकर और इसकी कीमत चुकाकर आगे बढ़ा.

चर्च ने आखिरकार अपनी हार मानी. जिस चौराहे पर ब्रूनो को चर्च ने जलाकर मार डाला था, वहीं चर्च की पहल पर आज ब्रूनो की मूर्ति लगी है.

भारत में ज्ञान और धर्म एक ही बिरादरी के कंट्रोल में रहा और तथाकथित वैज्ञानिकों ने माथे पर तिलक और सिर पर चुटिया धारण कर ली. जनेऊ तो उनके पास था ही. यहां सारा संचित ज्ञान इस काम में कुछ हो गया कि बहुसंख्य लोगों को कैसे कंट्रोल किया जाए.

भारत में धर्म और विज्ञान का कभी टकराव नहीं हुआ. इसलिए भारत में न तो औद्योगिक क्रांति मुमकिन थी और न ही वैज्ञानिक क्रांति या अनुसंधान. ये उपग्रह छोड़ने से पहले उसकी सफलता के लिए, तिरुपति में पूजा करने वाली जमात है.

नेशनल हेराल्ड केस का संक्षिप्त सच

🍁Nathional Herald (NH) केस का संक्षिप्त सच🍁

NH न्यूज़ पेपर नेहरूजी द्वारा 1930 में शुरू किया गया था ।
समय के साथ पेपर का काम बढ़ता गया और इसने 5000 करोड़ की प्रॉपर्टी व् पूंजी बना ली ।
सन 2000 के आस पास यह पेपर नुकसान में चला गया और इस पर 90 करोड़ का कर्जा हो गया ।
नेशनल हेराल्ड NH के directors सोनिया , राहुल और मोतीलाल वोरा ने पेपर को " यंग इंडिया लि " को बेच दिया ।
अब ध्यान से पढ़े :-
यहाँ से असली किस्सा शुरू होता है ।
यंग इंडिया के director भी थे सोनिया राहुल ऑस्कर फर्नांडिया और मोतीलाल वोरा ।
सौदा ऐसा हुआ कि ' यंग इंडिया ' 90 करोड़ का NH का कर्जा चुकाएगी और बदले में 5000 करोड़ की प्रॉपर्टी ले लेगी ।
चूँकि दोनों कंपनियो में एक ही लोग थे अतः NH की 5000 करोड़ की संपत्ति सिर्फ 90 करोड़ में यंग इंडिया ने हथिया ली ।

किस्सा यहीं ख़त्म नहीं होता है ।
यंग इंडिया ने 90 करोड़ चुकाने के लिए कांग्रेस पार्टी से 90 करोड़ का लोन लिया , जो कि कांग्रेस पार्टी की सोनिया राहुल ने मीटिंग कर पास कर दिया और पार्टी treasurer मोतीलाल वोरा ने तुरंत यंग इंडिया के director मोतीलाल वोरा को दे दिए और इस मोतीलाल वोरा ने NH के मोतीलाल वोरा ( स्वयं ) को दे देये ।
अब और मजा देखिये :
दूसरे दिन काँग्रेस पार्टी ने मीटिंग बुलाई जिसमे सोनिया राहुल ऑस्कर फर्नांडिस मोतीलाल वोरा थे , इन लोगो ने 90 cr का  NH का लोन यह कहकर  माफ़ कर दिया कि इस पेपर ने आजादी दिलाने में मदद की थी ।
इसे कहते है बिना कुछ लिए दिए 5000 cr की संपत्ति हथिया ली । इसमें एक 11 मंजिला विशाल भवन , बहादुर शा जफ़र मार्ग दिल्ली स्थित , जिसे कि pass port office और अन्यो को किराए पर दिया गया है ।

इसको कहते हैं हींग लगे न फिटकरी, रंग भी चोखा आये।

अब पोल खुल गई तो संसद में हंगामा  यह चोरी और सीनाज़ोरी नहीं तो क्या है ।
विचार करे , यह तो सिर्फ एक कारनामा सामने आया है ।


😞😢                                      🙏

हज़रत उमर – इंसाफ़ पसंद खलीफा

हज़रत उमर – इंसाफ़ पसंद खलीफा
रात का समय था। सारा मदीना शहर सोया पड़ा था। उसी समय हजरत उमर शहर से बाहर निकले। तीन मील जाने के बाद एक औरत दिखाई दी।
वह कुछ पका रही थी। पास ही दो तीन बच्चे रो रहे थे। हजरत उमर ने उस औरत से पूछा, "ये बच्चे क्यों रो रहे है?" औरत ने जबाब दिया, "भूखे हैं। कई दिन से खाना नहीं मिला। आज भी कुछ नहीं है। खाली हांडी में पानी डाल कर पका रही हूं।
हजरत ने पूछा, "ऐसा क्यों कर रही हो?"
औरत ने जवाब दिया, "बच्चों का मन बहलाने के लिए।"
हजरत उमर तड़प उठे। उसी समय वापस लौटे। खजाने से घी, आटा और खजूरें ली। नौकर से बोले, "इन्हें मेरी पीठ पर बांध दो।" नौकरी ने कहा, "यह आप क्या कर रहे हैं? मैं ले चलता हूं।" हजरत उमर ने जबाब दिया, "कयामत में मेरा र्बोझ तुम नहीं उठाओगे।"
सब चीजें चह खुद लाद कर ले चले। उसी औरत के पास पहुंचे। उसने ये चीजें देखी तो बहुत खुश हुई। जल्दी-जल्दी आटा गूंथा। हांडीं चढ़ाई। हजरत उमर चूल्हा फूंकने लगे। खाना तैयार हुआ। बच्चों ने पेट भर कर खाया। खाकर उछलने कूदने लगे। हजरत उमर देखते थे, खूब खुश होते थे। मां भी बहुत खुश थी। बार-बार दुआएं दे रही थी। कहती थी, "खलीफा तुमको होना चाहिए। उमर इस काबिल नहीं है।"
बेचारी गरीब मां! उसे कौन बताता कि वह किस से बातें कर रही है।
एक रात उमर फिर ऐसे ही घूम रहे थे। देखा एक बददू अपने खेमे के बाहर बैठा हुआ है। वह भी उसके पास जा बैठे। इधर-उधर की बातें होने लगी। बीच-बीच में कहीं से रोने की आवाज आ रही थी। पता लाग कि खेमे के भीतर कोई रो रहा है। पूछा, "कौन रो रहा है?"
बददू ने जबाब दिया, "मेरी बीबी।"
"क्या बात है?"
"बच्चा होनेवाला है।"
"क्या वह अकेली है।"
"हां।"
हजरत उमर घर लौटे। अपनी बीवी को साथ लिया। फिर वही आये। रोने की आवाज उसी तरह आ रही थी। बददॅ से बोले, "यह मेरी बीवी है। तुम कहो तो यह भीतर चली जाय।"
नेकी और पूछ-पूछ! बददू बहुत खुश हुआ। हजरत उमर की बीवी भीतर चली गई। कुछ देर बाद बच्चा पैदा हुआ। भीतर से ही उनकी बीवी ने पुकारा, "अमीरुल मोमनीन, अपने साथी को बधाई दो।"
बददू चौंक पड़ा "क्या कहा, अमीरुल मोमनीन! क्या यह मोमीनों के नेता, खलीफा, हजरत उमर है?"
वह हाथ जोड़ने लगा। हजरत उमर बोले, "नहीं कोई बात नहीं। कल मेरे पास आना। बच्चे के लिए वजीफा बांध दूंगा।"
एक रात घूमते-घूमते उनके कानों में गाने की आवाज आई। बड़ा दर्द-भरा गाना था। एक औरत अपनी खिड़की पर बैठी हुई गा रही थी "रात काली है और लम्बी होती जाती है। मेरा मालिक मेरे पास नहीं है….। "उस औरत को मालिक लड़ाई पर गया हुआ थ्ज्ञा। उसी की याद में वह गा रही थी। यह गाना सुनकर हजरत उमर बहुत दुखी हुए। सोचने लगे " मैं अरब की औरतों पर जुल्म कर रहा हूं।"
और वह सोच कर ही नहीं रह गये, तुरन्त हजरत हफसा के पास आये। पूछा, "औरत अपने मालिक के बिना कितने दिन रह सकती है?"
जवाब मिला, "चार महीने।"
सुबह होते ही हजरत उमर ने हर जगह आदेश भेज दिया कि कोई भी सिपाही चार महीने से ज्यादा बाहर न रहे।
एक बार वह लागों को खाना खिला रहे थे। देखा कि एक आदमी बाये हाथ से खाना खा रहा है। वह उसके पास पहुंचे। बोले,
"दाहिने हाथ से खाओ।"
उसने जबाब दिया, "दाहिना हाथ नहीं हैं वह लड़ाई में जाता रहा।"
उनका दिल भर आया। आंखों से आंसू बहने लगे।
वहीं उसके पास बैठ गये। बोले, "अफसोस! तुमको वजू कौन कराता होगा? सिर कौन धोता होगा? कपड़े कौन पहनाता होगा?"
बाद में उसके लिए एक नौकर तैनात कर दिया। जरुरी चीजें अपने पास से दीं।
हजरत उमर इस्लाम के दूसरे खलीफा थे। खलीफा राजा भी होते थे और पोप भी। वह राज भी करते थे और धर्म की रक्षा भी। वह बहुत बड़े थे। वह देश पर राज करते थे। देश के लोगों पर राज करते थे। लोगों के दिलों पर राज करते थे। जो दिलों पर राज करता है, वही बड़ा है। ये कहानियां इस बात की गवाह है।
हजरत मुहम्मद इस्लाम के पैगम्बर थे। पैगम्बर ईश्वर का सन्देश लानेवाला होता है। उन्होंने एक ईश्वर की पूजा का प्रचार किया। उन्होंने अरबों को एक कौम बनाया। उनके उपदेशों का सार था एक ईश्वर की पूजा करो। सब भाई-भाई हैं। कोई न ऊंचा है, न नीचा। बुरे कामों से बचो। नेक कामों में लगो। इसीका नाम उन्होंने इस्लाम रखा। इसका मतलब है अपने को भगवान को सौंप देना।
उस जमाने के लोग बड़े खराब थे। इन बातों का विरोध करते थे। वे बहुत से देवी-देवताओं को मानते थे। आपस में लड़ते रहते थे। बुरे-बुरे काम करते, शराब पीते, जुआ खेलते, लड़कियों को मार डालते, पशु-बलि और नरबलि चढ़ाते। कुछ लोग तो अपने बेटों की बलि भी चढ़ा देते थे छूआछूत भी थी। ये सब लोक कबीलों में बंटे हुए थे।
मक्के में उन दिनों सबसे बड़ा कुरैश का था। उनका सरदार मक्के पर राज करता था। वही काबे का रखवाला था। ये लोग नए धर्म के विरोधी थे। सब बराबर हैं ये इस बात को नहीं मानते थे। शुरु में उन लोगों ने मुहम्मदसाहब को लालच दिया, पर वह नहीं माने। इस पर वे मोहम्मद साहब और उनके साथियों को सताने लगे।
हजरत उमर भी कुरैश थे। बहुत बहादुर थे। उनका डीलडौल बड़ा ऊंचा था। हमारो आदमियों में अलग दिखाई दे जाते। वह भी मुहम्मदसाहब के खिलाफ थे, लेकिन उनके बहनोई सईद मुसलमान हो चुके थे। उनके साथ उमर की बहन फातिमा भी मुसलमान हो गई थी। कई दूसरे लोग भी मुसलमान हो गये थे। उनमें उनके घराने की एक दासी थी। उमर मुसलमानों के बैरी थे। वह उस दासी को खूब मारते थे। मारते-मारते थक जाते तो कहते, "जरा दम ले लूं तो फिर मारुंगा।"
वह दूसरे लोगों को भी सताते थे, लेकिन नये धर्म का नशा बड़ा तेज था। जिस पर चए़ जाता था, उतरता नहीं था। उमर बड़े परेशान हुए। एक भी आदमी धर्म नहीं छोड़ता। आखिर उन्ळोंने मुहम्मदसाहब को मार डालने का फैसला किया। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। बस, कमर में तलवार बांधी और घर से निकल पड़े।
राह में एक साथी मिल गये। इनके तेवर चढ़े देखे तो पूछा "किधर जा रहे हैं?"
जवाब दिया, "मुहम्मद का फैसला करने।"
साथी ने कहा, "पहले घर की खबर लो। तुम्हारी बहन और बहनोई दोनों इस्लाम को मान चुके है।"
उमर तुरन्त लौट पड़े। उसी तरह बहन के घर पहुंचे। बहन कुरआज पढ़ रही थी। आहट पाकर चुप हो गई। कुरआन छिपा दी; लेकिन आजवाज उमर के कानों में पड़ चुकी थी। पूछा, "क्या पढ़ रही थी?"
बहन ने जवाब दिया, "कुछ नहीं।"
बोले, "मैं सुन चुका हूं। तुम दोनों मुसलमान हो गये हो।"
यह कहकर वह बहनोई की तरफ झपटे। वह उनको मारना चाहते थे। बहन बचाने दौड़ी। उमर ने उसका चेहरा भी लहूलुहान कर दिया। पर वह डरी नहीं, झिझकी तक नहीं। बोली, "उमर, जो जी में आवे, करो।"
उमर का हाथ रुक गया। उसने अपनी बहन को देखा। उसके चेहरे पर एक भी शिकन नहीं थी। नहीं थी। डर नहीं था। आंखों में वही प्यार था। वह कह रही थी, "तू हमें इसलिए मारता है कि हम एक खुदा का मानते है। हां, मैं कहती हँ खुदा एक है, दूसरा कोई नहीं है। मुहम्मद उसका रसूल है। ले, अब मार डाल।"
उमर का दिल धड़कने लगा। इतने निडर, इतने साहसी हैं ये लोग! मौत से भी नहीं घबराते। इस्लाम में इतनी ताकत है। उन्होंने फिर बहन की तरफ देखा। उसके बदन से अब भी खून बह रहा था। उमर का दिल भर आया। ऑखों में प्यार झलकने लगा। बोले, "तुम जो पढ़ रही थीं, मुझे भी सुनाओं।"
फातमा कुरआन ले आई। उमर उसे पढ़ने लगे, गौर से पढ़ने लगे एक बारपढ़ा, दो बार पढ़ा, बार-बार पढ़ा। पढ़ चुके तो पुकार उठे, "अल्लाह एक है। मुहम्मद उसका रसूल है।"
इसके बाद बहन और बहनोई से माफी मांगी। फिर हजरत मुहम्मद के पास पहुंचे। दरवाजा खटखटाया।
किसी को भी इस नई कहानी का पता न था। कमर में तलवार बंध रही थी। वहॉँ जो लोग थे, वे कुछ घबराये। लेकिन एक साहब बोले, "आने दो। नीयत साफ है तो ठीक है, नहीं तो उसी तलवार से सिर काट दूंगा।
उमर भीतर आये। मुहम्मदसाहब आग बढ़े उनका दामन पकड़ कर बोले, "क्यों उमर, कैसे आये हो?"
उमर कांपने लगे। बोले "ईमान लाने के लिए।" यह सुनना था कि सब लोग एकदम पुकार उठे, "अल्हाहो अकबर!"
यह पुकान बड़ी तेज थी, इतनी तेज कि मक्का की तमाम पहाड़ियॉँ गूंज उठी। क्यों न गूंजती, उमर मुहम्मद के साथ मिल गये थे। उमर कुरैश के एक बहुत बड़े सरदार थे। उमर इस्लाम के भी बड़े आदमी हुए।
वह सबको बराबर समझते थे। गरीब और अमीर छोटे और बड़े सबका एक दरजा था। कहा करते थे, "अल्लाह नेकी और अच्छे कामों को देखता है। जन्म को नहीं देखता। उसकी नजर में सब बराबर है।" वह इन बातों को कहते हीं नहीं थे, मानते भी थे। वह अफसरों को भी टोकते रहते थे।
हजरत उमर के लिए राज करने का मतलब था सेवा करना। वह अपने को मालिक नहीं समझते थे। एक बार एक बड़े आदमी मिलने आये। साथ में और लोग भी थे। आकर देखा वह आस्तीन चढाये इधर-उधर दौड़ते फिरते है। उन्हें देखा तो बोले, "आओ, तुम भी मेरा साथ दो।" आनेवाले ने पूछा, "खैर तो है! क्या हो गया?"
बोले, "खजाने से एक ऊंट भाग गया है। एक ऊंट में कितने गरीबों का हक शामिल है।"
एक आदमी बोल उठा, "अमीरुल मोमनीन, आप क्यों परेशान हो रहे हैं? किसी गुलाम को कहिये, वह ढूंढ लावेगा।"
उन्होंने फौरन कहा, "मुझसे बढ़कर कौन गुलाम हो सकता है!"
वह बड़ी सादगी से रहते थे। जमीन पर सोते थे। खाना बड़ा सादा खाते थे। महीनों गेहूं का आटा घर में नहीं पकता था। छानते तो कभी भी नहीं थे। कपड़े भी सादे होते। अक्सर उनमें पैबन्द लगा रहता। बदन पर फटा हुआ कुरता, सिर पर फटा हुआ अमाया, पैरों में फटी हुई जूतियां। एकबार देर तक घर से नहीं निकले। बाहर लाग राह देख रहे थे। आये तो कारण मालूम हुआ। पहनने को कपड़े न थे, सो बदन के कपड़ों को धोया था। सूख गये तो पहन कर बाहर आये।
कभी कन्धे पर मशक लिये जा रहे है। बेवा औरतों के घर पानी भरना है। कभी मस्जिद के कोने में जमीन पर लेटे हैं। काम करते-करते थक गये हैं। बार-बार बादशाही काम से सफर करते, पर साथ में न खेमा, न शामियाना। न फौज, न फाटा। किसी पेड़ पर कपड़ा डाल दिया जाता। उसी की छॉह में इस्लाम का वह महान खलीफा आराम करता।
एक बार वह सीरिया गये। साथ में बस एक नौकर था। राह में आप उसके ऊंट पर सवार हो गये। शायद गलती से ऐसा हुआ था। जान-बूझ कर भी हो सकता है। जो हो, ऊंट बदल गया। उनका ऊंट कुछ सजा हुआ था। जब शहर में पहुंचे तो लोग स्वागत करने आये। बड़ा मजा आया। लोग नौकर की तरफ जाते। उसी को खलीफा समझते। वह हजरत उमर की तरफ इशारा करता। लोग हैरान-परेशान, आखिर खलीफा कौन से है? बेचारे शान शौकत ढूंढते थे, पर हजरत उमर के पास कहॉँ मिलती!
यह बात नहीं कि वह कंजूस थे। असल में उनको लोगों के सामने मिसाल रखनी थी। खुद ऐश करते तो लोगों से क्या कहते! वह जानते थे कि अफसर बिगड़ते जा रहे है। इसलिए अपने पर कुछ अधिक सख्ती करते थे।

जाट हिन्दू नहीं होते , जाटो और हिन्दुओ में धरती आसमान के समान अंतर होता हे

वन्दे जाटमातरम🙏🏼🙏🏼

जाट हिन्दू नहीं होते , जाटो और हिन्दुओ में धरती आसमान के समान अंतर होता हे ।

1-जाट दादा खेडा ,अपने ग्राम देवता को पूजते हे ।
और हिन्दू किसी भी पत्थर को पूजना शुरू कर देते हे ।

2-जाट का आदर बराबरी और भाईचारा हे ।जबकि हिन्दू इनका विरोधी हे ।जाट अपने साथ बसने वाली 36 बिरादरी को भाई मानता हे ।पर हिन्दू नहीं क्युकी इन्होने मनु व्यवस्था का प्रचार किया हे ।

3-जाट रिपब्लिकन सिस्टम में विश्वास करता हे ।खाप इसका उदारण हे ।जबकि हिन्दू खाप व्यवस्था का विरोधी रहा हे ।

4-जाटो में धार्मिक अन्धता व् धार्मिक कट्टरता के लिए कोई स्थान नहीं हे  इसका उदाहरण यह हे की जाट हर धर्म में हे ।इसीलिए हर धर्म की इज्जत जाट खून में समाहित हे ।
जबकि हिन्दू कट्टरवाद से ग्रस्त होते हे ।
5-जाट प्राचीन काल से विधवा विवाह कराते आये हे ।जबकि हिन्दू विधवा विवाह के खिलाफ रहे हे ।

6-जाटो में सती प्रथा का कोई स्थान नहीं हे ।जबकि हिन्दुओ में सती प्रथा प्रचलित रही हे ।

7- जाटो के क्षेत्र में विधवा आश्रम व् वृद्धाश्रम कही नहीं मिलेंगे ।जबकि हिन्दुओ के क्षेत्र में आपको विधवा आश्रम व् वृद्धाश्रम बहुलता में देखने को मिलेंगे ।

8-जाट पाखंडवाद का विरोधी रहा हे ।जबकि हिन्दू धर्म पाखंडवाद पर ही आधारित हे ।

9- जाट कभी अपने खून के रिश्ते में और नजदीक के रिश्ते में शादी नहीं करते ।जबकि साउथ में ब्राहमण और हिन्दू अपनी सगी भांजी से शादी करते हे ।बहन की बेटी से शादी करना इनके लिए पुण्य का काम होता हे ।
जाट ऐसा सोच भी नहीं सकते ।

10-जाट अपने गोत्र में कभी विवाह नहीं करते ।लेकिन हिन्दुओ में ऐसा कोई नियम नहीं हे ।वो अपने गोत्र में विवाह को ही महानता समझते हे ।

11-जाट अपनी सासू को माँ मानता हे ।जबकि बंगाली हिन्दू ब्राहमण अपनी पत्नी के देहांत पर सास के साथ शारीरिक सम्बन्ध बना सकता हे ।
12-जाट कभी एक ही गाँव में शादी नहीं करते ।जबकि हिन्दुओ में ऐसा कभी नहीं होता ।

13-जाट कभी भी अद्रश्य शक्तियों से नहीं डरते ।और व्यावान जंगलो में जाकर भी कृषि करते हे ।जबकि हिन्दुओ में भूत प्रेत का प्रकोप अत्यधिक होता हे ।

14- जाट अपनी जमीन को माँ के समान मानता हे ।इसीलिए जाट ने आज तक धर्म बदले देश छोड़े पर जमीन नहीं छोड़ी ।जबकि हिन्दू जरा सी परेशानी में जमीन बेचने में नहीं हिचकते ।

15-जाट आज भी ग्रामीण हे ।और गाँव को नहीं छोड़ता जबकि हिन्दू शहरीकरण में विश्वास करते हे ।

16-जाट हमेशा पशु प्रेमी रहा हे ।सर्वे के अनुसार पशुपालन में जाट पूरे एशिया में प्रथम स्थान पर हे ।जबकि हिन्दू धर्म के नाम पर बलि देते हे पशुओ की ।
बंगाल में काली के मंदिर में धडल्ले से बली दी जाती हे ।

17-जाट हमेशा से ही प्रकृति का प्रेमी रहा हे ।कृषि और वृक्षारोपण इसका उदाहरण हे । जबकि हिन्दू मंदिर और पाखंड के नाम पर नदियों और शहरो में गंदगी के नाम की मिसाल हे ।
बहुत कुछ हे जो हमे इन हिन्दुओ से अलग करता हे ।जाट एक नस्ल हे जिसकी मिसाल अंग्रेज,यहूदी,मुस्लिम सभी देते हे।

जाट हिन्दू नहीं हो सकता सुप्रीम कोर्ट ने तो 11 दिसंबर 1995 को एक केश की सुनवाई में कहा था की हिन्दू कोई धर्म नहीं हे ।
फिर जाट तो क्या कोई भी हिन्दू नहीं हो सकता 
हिन्दू ब्राहमण का एक शस्त्र हे जिसके प्रचार और प्रसार से वो सत्ता पर बैठा हे ।यह बस ब्राहमणवाद ही हे और कुछ नहीं ।दयानंद सरस्वती उर्फ़ मूलशंकर तिवारी गुजराती ब्राहमण का आर्य समाज भी जाट कौम के लिए श्रापित हे ।

पगड़ी संभाल जट्टा
दुश्मन पहचान जट्टा 
जय जाट इन्कलाब 
जय जाट एकता
From :shivraj chodhary

महान हस्तियों के सच :- कुछ प्रसिध्द मनुवादी लोग - जिन्हें हम विज्ञापन, उनकी नाटकीयता व अज्ञान के कारण नायक मानते हैं ।

महान हस्तियों के सच  :-
कुछ प्रसिध्द मनुवादी लोग  -  जिन्हें हम विज्ञापन, उनकी नाटकीयता व अज्ञान के कारण नायक मानते हैं ।
उन लोगों के नाम के साथ उनका कार्य...!

1 ) मोहनदास करमचंद गांधी  :-  गुजराती बनिया, कलयुग का मनु, मीठी छुरी, पाखंड़ी, छली, ऊपर से उदार, अन्दर घोर जातिवादी  -  साम्प्रदायिक, बाबासाहब व मूलनिवासीयों का पक्का विरोधी...!

2 ) जवाहर लाल नेहरू  :- कश्मीरी ब्राह्मण, गांधी का चहेता चेला, सत्ता लोलुपता के कारण कारण विभाजन करवाया, रसिक, ऊपर से उदार, अन्दर से दृढ़ मनुवादी, ब्राह्मणी वर्चस्व की नींव रखी...!

3 ) बाल गंगाधर तिलक  :- चितपावन ब्राह्मण, मूलनिवासीयों का पक्का व खुला विरोधी, घोर जातिवादी व साम्प्रदायिक, मनुवादी वर्चस्व व पेशवा ब्राह्मणशाही का सपना देखता था....!

4 ) रवीन्द्रनाथ टैगोर  :- बंगाली ब्राह्मण, रंगा सियार, छिपा मनुवादी, अंग्रेजों का चाटुकार कवि, जार्ज पंचम का स्तुतिगान  'जन गण मन'  लिखा, मनुवादी शैतानों ने इसे राष्ट्रगान बना दिया....!

5 )  लजपत राय  :-  पंजाबी बनिया, उदारता का नाटक, अछूतों का विरोधी, मनुवाद समर्थक, मनुस्मृति का प्रशंसक, हिन्दू महासभाईयों का गहरा मित्र, बगुला भगत, जनेव बांटकर मूर्ख बनाया...!

6 ) वल्लभ भाई पटेल  :-  दृढ़ पिछड़े नेता, गांधी  -  नेहरू के चंगुल में, खुद को पिछड़ा न मानते, प्रधानमंत्री पद से वंचित हुए, पिछड़ों के आरक्षण, बाबासाहब तथा महार  - बुध्दिष्ट व मुस्लिम के घोर विरोधी....!

7 ) विनोबा भावे  :-  चितपावन ब्राह्मण, गांधी का पक्का शिष्य, गांधी के बाद गांधीवादी छल को आगे बढ़ाया, इसने भूदान का नाटक करके सरकार द्वारा वास्तविक भू-सुधार को रोका....!

8 ) राम मोहन राय  :-  बंगाली ब्राह्मण, अंग्रेजों का सहयोगी, ब्रह्म समाज बनाकर समाज को मूर्ख बनाया, उसे सती-प्रथा व विधवा विवाह तो दिखा पर जाति-प्रथा व छुआछूत नहीं दिखा....!

09 ) बंकिमचन्द्र चटर्जी  :-  बंगाली ब्राह्मण, साहित्यकार-कवि, घोर जातिवादी व साम्प्रदायिक, अंग्रेजभक्त, देश-भक्ति एवं मुस्लिम विरोध फैलाकर शूद्रों ध्यान भटकाने का प्रयास किया....!

10 )  अरविन्द घोष  :-  बंगाली ब्राह्मण, उच्च आधुनिक शिक्षा प्राप्त मनुवादी, मनुवाद पर आध्यात्मिकता-दर्शन-तर्क-साहित्य का मुलम्मा चढ़ाया व इसने  'ब्राह्मण'  महामानव बताया है....!

11 )  एनी बीसेन्ट  :-  आईरिश शैतान उपासक फ्रीमसेन, मनुवाद-जातिवाद में गहरी आस्था, थीयोसॉफिकल सोसायटी एवं कांग्रेस में सक्रिय, अंग्रेजों-मनुवादियों में गहरा भाईचारा बनवाया....!

12 )  मदनमोहन मालवीय  :-  उत्तर भारतीय ब्राह्मण, चतुर किन्तु बहुत ही संकीर्ण, छुआछूत व जातिवाद में आस्था, अंग्रेजों का चहेता चाटुकार, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का संस्थापक....!

13 ) दयानन्द सरस्वती  :-  सरयूपारी ब्राह्मण, जातिवाद-छुआछूत व वेदों का समर्थक,  'आर्य समाज'  बनाकर व 'सत्यार्थ प्रकाश'  लिखकर मनुवादी को जिंदा किया, जनेव बांटकर खूब मूर्ख बनाया....!

14 )  गोलवलकर  :-  चितपावन ब्राह्मण, फुले-शाहु -अम्बेडकरी आन्दोलन का विरोधी, मुस्लिम शत्रू, मुस्लिम भय उत्पन्न कर मूलनिवासीयों में मनुवादी वर्चस्व को बनाए रखने का प्रयास किया....!

15 )  वी. ड़ी. सावरकर  :-  चितपावन ब्राह्मण, कट्टर व खुला मनुवादी, मनुवाद को जीवित करने के लिए हिन्दू महासभा बनाई, गांधी हत्या में आरोपित किन्तु सबूत अभाव से बच गया....!

16 ) के. बी. हेडगेवार  :-  चितपावन ब्राह्मण, बहुत चतुर - चालाक, महाराष्ट्र के फुले-शाहु-अम्बेडकरी आन्दोलन को समाप्त करने के लिए मुस्लिम भय दिखाकर विषवृक्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बनाया.....!

इन सारे ब्राह्मण पुरूषों ने केवल ब्राह्मणों के हित के लिए काम  (कार्य ) किया, बहुजनों के लिए नहीं...?

अम्बेडकर अनुयायियों को उमराव सालोदिया के इस आकस्मिक और एकाकी निर्णय ने निराश कर दिया है


उमराव सालोदिया का उमराव खान हो जाना
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राजस्थान के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी उमराव सालोदिया ने मुख्य सचिव नहीं बनाये जाने से नाराज हो कर स्वेच्छिक सेवा निवृति लेने तथा हिन्दुधर्म छोड़कर इस्लाम अपनाने की घोषणा कर सनसनी पैदा कर दी है ।
राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार से अब न उगलते बन रहा है और न ही निगलते। यह सही बात है कि वरीयता क्रम में वे मुख्य सचिव बनने के लिए बिलकुल पात्र थे और यह भी सम्भव था कि वे राज्य के पहले दलित मुख्य सचिव बन जाते मगर भाजपा सरकार ने वर्तमान मुख्य सचिव सी एस राजन को तीन माह का सेवा विस्तार दे कर सालोदिया को वंचित कर दिया ।
सेवा एवम् धर्म छोड़ने की घोषणा करते हुए सालोदिया ने यह भी कहा कि उन्हें सेवाकाल के दौरान सामान्य वर्ग के एक व्यक्ति ने बहुत परेशान किया ,जिसकी प्राथमिकी दर्ज कराये जाने के बावजूद उस व्यक्ति के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गयी।सालोदिया ने यह भी कहा कि वे समानता की चाह में इस्लाम कबूल कर रहे है । हालाँकि उन्होंने यह भी बताया कि उनकी इस्लाम में रूचि लंबे समय से है और उन्होंने इस्लाम को भली भांति पढ़ समझ कर ही धर्मान्तरण का फैसला किया है।
उमराव सालोदिया अब उमराव खान बन चुके है।उनके धर्म परिवर्तन करने पर मिश्रीत प्रतिक्रियाएं आई है ।राज्य के गृह मंत्री गुलाब चन्द कटारिया ने इसे व्यक्तिगत निर्णय बताते हुए कहा कि अगर उनके साथ अन्याय हुआ है और उन्हें लगता है कि उन्हें वंचित किया गया है तो उसका विरोध उचित फोरम पर किया जा सकता था। चिकित्सा एवम् स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र सिंह राठौड़ ने इसे सेवा नियमों का स्पष्ट उल्लंघन करार देते हुए कहा कि वे पद पर रहते हुए इस तरह प्रेस वार्ता कैसे कर सकते है ।उन्हें दूसरे मान्य तरीके अपनाने चाहिए ।
यह तो निर्विवाद तथ्य है कि उन्हें मुख्य सचिव बनाया जाना चाहिये।यह उनका हक़ है जिसे सरकार ने जानबूझ कर छीना है मगर उनके इस तरीके और इस्लाम कबूल करने को लेकर दलित बहुजन आंदोलन ने भी कई सवाल खड़े करके उन्हें इस लड़ाई में अकेला छोड़ दिया है।
दरअसल विगत कुछ दिनों से दलित समुदाय के युवा सोशल मीडिया के ज़रिये उमराव सालोदिया को मुख्य सचिव बनाने की पुरजोर मांग कर रहे थे।इन उत्साही अम्बेडकर अनुयायियों को उमराव सालोदिया के इस आकस्मिक और एकाकी निर्णय ने निराश कर दिया है।अब तक उनके पक्ष में खड़े लोग ही अब पूंछ रहे है कि उमराव सालोदिया उमराव गौतम क्यों नहीं हुए ? जिस अम्बेडकर की वजह से वे इतने बड़े पद तक पंहुचे उनका मार्ग क्यों नहीं लिया खान साहब ने ?
दलित बहुजन आंदोलन को इस्लाम से ना तो परहेज़ है और ना ही कोई दिक्कत ,परेशानी उमराव सालोदिया के तरीके और निर्णय से है। बिना संघर्ष किये ही उनके नौकरी छोड़ने के निर्णय को पलायन माना जा रहा है तथा बुद्ध धर्म नहीं अपनाने की कड़ी आलोचना हो रही है।
दलित युवा सोशल मीडिया पर बहस छेड़े हुए है कि अब वे दलितों की समानता के मिशन के लिए काम करेंगे अथवा दीन की तब्लीग के लिए जमाती बन जाएंगे। यह भी प्रश्न उठाया जा रहा है कि अगर उनके साथ नौकरशाही में रहते हुए लंबे अरसे से अन्याय व भेदभाव हो रहा था तो वे इतने समय तक खामोश क्या सिर्फ मुख्य सचिव बनने की झूठी आशा में थे ? यहाँ तक पूंछा जा रहा है कि क्या अगर उन्हें चीफ सेकेट्री बना दिया जाता तो उनकी नज़र में हिन्दू धर्म समानता का धर्म हो जाता ? अब लोग यह भी जानना चाह रहे है कि क्या उन्होंने बौद्ध धर्म को पढ़ा है ?
जो उमराव सालोदिया को जानते है उनके मुताबिक वे कभी भी आंबेडकर की मुहिम में शामिल नहीं रहे है और ना ही उन्हें मुक्तिकामी कबीर, फुले, अम्बेडकर की विचारशरणी से कोई मतलब रहा है।यह भी कहा जा रहा है कि उन्हें समाज हित में एक सामूहिक फैसला ले कर नज़ीर स्थापित करनी चाहिए थी ।उन्हें अपने साथ हुए भेदभाव और वंचना के प्रश्न को समाज जागृति का हथियार बनाना चाहिए था मगर वे इससे चूक गए और इसे केवल निजी हित का सवाल बना डाला है।संभवतः उमराव सालोदिया से यह चूक इसलिए हुयी है क्योंकि उनका जुड़ाव समुदाय से लगभग नहीं के बराबर रहा है । वे पूरे सेवाकाल में इन्हीं लोगों के होने में लगे रहे जैसे अधिकांश बड़े दलित अधिकारी करते है।
यह बात कुछ हद तक सही भी है कि जो अधिकारी और राजनेता समाज से कट कर जीते है फिर उन्हें अपनी लड़ाई अक्सर अकेले ही लड़नी होती है और फिर वे ऐसे ही अदूरदर्शी निर्णय ले कर अपनी तथा अपने वर्ग की किरकिरी करा बैठते है।
बेहतर होता कि उमराव सालोदिया इस लड़ाई को थोडा पहले शुरू करते और अंत तक लड़ते ,मगर उन्होंने योद्धा बनने के बजाय भगौड़ा बनना स्वीकार किया है ,जिसका दलित बहुजन आंदोलन ने स्वागत करने से साफ इंकार कर दिया है।अब दलित किसी धर्म में मुक्ति नहीं देखते,क्योंकि उन्हें मुक्ति संघर्ष में दिखाई देती है पलायन में नहीं ।
- भंवर मेघवंशी
( लेखक स्वतन्त्र पत्रकार है ,उनसे Bhanwar meghwanshi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है