Sunday, January 3, 2016

डॉक्टर बाबा साहब बी आर अम्बेडकर का जीवन परिचय

डॉक्टर बाबा साहब बी आर अम्बेडकर का जीवन परिचय 

भारत को संविधान देने वाले महान नेता डा. भीम राव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव में हुआ था। डा. भीमराव अंबेडकर के पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल और माता का भीमाबाई था। अपने माता-पिता की चौदहवीं संतान के रूप में जन्में डॉ. भीमराव अम्बेडकर जन्मजात प्रतिभा संपन्न थे।


भीमराव अंबेडकर का जन्म महार जाति में हुआ था जिसे लोग अछूत और बेहद निचला वर्ग मानते थे। बचपन में भीमराव अंबेडकर (Dr.B R Ambedkar) के परिवार के साथ सामाजिक और आर्थिक रूप से गहरा भेदभाव किया जाता था। भीमराव अंबेडकर के बचपन का नाम रामजी सकपाल था. अंबेडकर के पूर्वज लंबे समय तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में कार्य करते थे और उनके पिता ब्रिटिश भारतीय सेना की मऊ छावनी में सेवा में थे. भीमराव के पिता हमेशा ही अपने बच्चों की शिक्षा पर जोर देते थे।


1894 में भीमराव अंबेडकर जी के पिता सेवानिवृत्त हो गए और इसके दो साल बाद, अंबेडकर की मां की मृत्यु हो गई. बच्चों की देखभाल उनकी चाची ने कठिन परिस्थितियों में रहते हुये की। रामजी सकपाल के केवल तीन बेटे, बलराम, आनंदराव और भीमराव और दो बेटियाँ मंजुला और तुलासा ही इन कठिन हालातों मे जीवित बच पाए। अपने भाइयों और बहनों मे केवल अंबेडकर ही स्कूल की परीक्षा में सफल हुए और इसके बाद बड़े स्कूल में जाने में सफल हुये। अपने एक देशस्त ब्राह्मण शिक्षक महादेव अंबेडकर जो उनसे विशेष स्नेह रखते थे के कहने पर अंबेडकर ने अपने नाम से सकपाल हटाकर अंबेडकर जोड़ लिया जो उनके गांव के नाम "अंबावडे" पर आधारित था।


8 अगस्त, 1930 को एक शोषित वर्ग के सम्मेलन के दौरान अंबेडकर ने अपनी राजनीतिक दृष्टि को दुनिया के सामने रखा, जिसके अनुसार शोषित वर्ग की सुरक्षा उसकी सरकार और कांग्रेस दोनों से स्वतंत्र होने में है।


अपने विवादास्पद विचारों, और गांधी और कांग्रेस की कटु आलोचना के बावजूद अंबेडकर की प्रतिष्ठा एक अद्वितीय विद्वान और विधिवेत्ता की थी जिसके कारण जब, 15 अगस्त, 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद, कांग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार अस्तित्व में आई तो उसने अंबेडकर को देश का पहले कानून मंत्री के रूप में सेवा करने के लिए आमंत्रित किया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। 29 अगस्त 1947 को अंबेडकर को स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना के लिए बनी संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया। 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा ने संविधान को अपना लिया।


14 अक्टूबर, 1956 को नागपुर में अंबेडकर ने खुद और उनके समर्थकोंके लिए एक औपचारिक सार्वजनिक समारोह का आयोजन किया। अंबेडकर ने एक बौद्ध भिक्षु से पारंपरिक तरीके से तीन रत्न ग्रहण और पंचशील को अपनाते हुये बौद्ध धर्म ग्रहण किया। 1948 से अंबेडकर मधुमेह से पीड़ित थे. जून से अक्टूबर 1954 तक वो बहुत बीमार रहे इस दौरान वो नैदानिक अवसाद और कमजोर होती दृष्टि से ग्रस्त थे। 6 दिसंबर 1956 को अंबेडकर जी की मृत्यु हो गई।

Saturday, January 2, 2016

बाबा साहब डॉ अम्बेडकर की उंगली का महत्व



☝बाबा साहब डॉ अम्बेडकर की
उंगली का महत्व..जरुर पढे...👇

एक बार एक लड़का अपने पिता के साथ बाबासाहेब डॉ अम्बेडकर
जयंतीे की रैली में गया था।
घर वापस आने पर अपने पापा से प्रश्न पूछे.....
लड़का : पापा बाबासाहेब हमेशा सुटबुट में क्यों रहते थे ?
पापा : बेटा, क्योंकि उन्हें लगता था कि मेरा समाज भी
हमेशा सुटबुट में रहना चाहिए यदि मैं सुटबुट में रहूंगा तो मेरा
समाज मुझे आदर्श मानकर वह खुद भी सुटबुट में
रहेंगे।
लडका : ठीक है पापा,
बाबासाहेब के जेब को हमेशा पेन क्यों रहता था ?
पापा : बहुत अच्छा प्रश्न पूछा बेटा, अरे वो सिर्फ पेन
नहीं हजारों शोषित, दलित पिढीत लोगों को
गुलामगिरी से मुक्त करने की वह आधुनिक
तलवार है.....
उसी पेन से बाबासाहेब ने भारतीय संविधान
लिखा है।
बेटा : पापा मैं भी अपनी जेब में पेन
लगाऊंगा?.....
पापा आखरी प्रश्न पूछ रहा हूँ, आप थके होगे....
बाबासाहेब ने उंगली कहा दिखाई और उनके हाथ में
कौनसी किताब हैं ?
पापा : बेटा ये बहुत अच्छा प्रश्न पूछा.....
बेटा उनके हाथ में जो किताब है उसका नाम है....
" भारतीय संविधान " इस संविधान से पुरा भारत देश चलता
है, इसी संविधान से तुम्हें स्वातंत्र्य, समता और
बंधुत्व यह मानवी मुल्य तुम्हें दि है।
 बाबासाहब ने जो उंगली दिखाई है उसका मतलब "
अगर इस संविधान को सही मायने में अमल में लाना है
तो योग्य लोग संसद में आने चाहिए, वह उंगली से
यह संबोधन करते हैं कि " अपने अधिकार के लिए संसद में जाओ।
बेटा : थैंक्स पापा, मैं भी बाबासाहेब के विचारों पर
चलूँगा और इस देश को बहुत आगे ले जाऊंगा।

"मोरल ऑफ़ द स्टोरी"

👉अगर इसी प्रकार हर पापा अपने बच्चे को बाबासाहेब
के बारे समझाये तो वो दिन दूर नहीं, जब संसद क्या?
पुरे विश्व में बाबासाहब के बच्चे अपना नाम रोशन करेंगे।
🙏🙏 जय भीम . जय संविधान।🙏🙏


गुजरात 19 सितम्बर को देश का पहला राज्य बना जहा पर आरक्षण को पूर्ण रूप से हटा दिया गया

गुजरात 19 सितम्बर 2015 को देश का पहला राज्य बना जहा पर 
आरक्षण 
को पूर्ण रूप से हटा दिया गया सरकारी नोकरी हो या पढाई सभी में आरक्षण को पूर्ण रूप से समाप्त घोषित कर दिया गया हे ।
और ये सब संभव हुआ प्रधान मंत्री  नरेंद्र मोदी द्वारा 
जिन्होंने   आरक्षण को समाप्त किया।
अब गुजरात में अगले 25 सालो तक 
1 रेलवे में सफ़र 
2 बसो में सफ़र 
3 फ़िल्म 
4 होटल बुकिंग
5 पढाई में
6 सरकारी नोकरी में
7 पदोनत्ति में
आदि आदि में अगले 25 सालो तक आरक्षण लागू नहीं होगा ।

यदि आप sc/st/obcतो इसे हर भारतीयके मोबाइल में भेज दो 
ताकि और राजनेताओ को वोट का मतलब पता चल सके ।

 गुजरात हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला 
अब जनरल (GEN) केटेगरी मे कोई भी अन्य वर्ग का (ST-SC-OBC) अब नौकरी या कॉलेज मे apply नही कर सकता...
मतलब वो लॉग अपनी ही कैटेगिरी मे apply करेंगे
From-- ETV gujrat
आज सवर्ण जाती की पहली जीत हासिल हुई है। आज गुजरात हाई कोर्ट का फैसला आया है और फैसला दिया है कि आरक्षित वर्ग के व्यक्तियों को सिर्फ आरक्षण उनके वर्ग में ही मिलेगा चाहे उसका मेरिट मे कितना ही ऊँचा स्थान हो। अगर कोई जाति प्रमाण पत्र देता है तो उसे आरक्षित क्षेत्र में ही जगह मिलेगी और वह अनारक्षित कोटा में जगह नहीं बना सकता। गुजरात ब्राह्मण समाज ने रोस्टर प्रणाली के तहत मुकदमा किया था और वे लोग विजयी हुए। 
गुजरात हाइ कोर्ट का ऐतीहासिक फैसला 
अब जनरल केटेगरी मे कोई भी sc.st.obc अब नौकरी और कॉलेज मे अप्लाय नही करेगा मतलब वो लॉग अपनी ही केटेगरी मे अप्लाय करेगा।

पोलीस स्टेशनला तक्रार नोंदविने

👮👮पोलीस स्टेशनला तक्रार नोंदविने 👮👮
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              माजी न्यायाधीश
                      अनिल वैद्य 
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        जीवनात कधी कुणाशी भांडण होते, तर कधी चोरी, अपघात, खून, विनयभंग तर कधी कुणी जीवे मारण्याची धमकी देतो. या  ना त्या कारणाने पोलीस स्टेशनला तक्रार देण्याची वेळ येत असते. दखलपात्र असलेले व दखलपात्र नसलेले गुन्हे असे गुन्ह्यांचे दोन प्रकार आहेत. जेव्हा तुम्ही दखलपात्र गून्ह्याची तक्रार  पोलीस स्टेशनला देता त्याची दखल पोलीस घेतात त्यालाच प्रथम सुचना अहवाल first information report (एफ.     आय. आर.)म्हणतात. गून्ह्याच्या तपासाला यामुळेच चालना मिळत असल्याने व पुरावा कायद्यान्वये तक्रारकर्त्याची सत्यता न्यायालयात पडताळतांना या रिपोर्टला महत्वाचे समजले जाते. फौजदारी प्रक्रिया कायद्याच्या कलम १५४ मध्ये याबाबत तरतूद केली असून विविध खटल्यांमध्ये उच्च व सर्वाच्च न्यायालयाने या संदर्भात आपले मत व्यक्त केले आहे.
        कायद्यान्वये पोलीस स्टेशनला तक्रार तोंडी किंवा लेखी स्वरुपात देता येईल. तोंडी तक्रार पोलीसांनी लिहून घेतली पाहिजे व तक्रारकर्त्याला वाचून दाखवली पाहिजे. तक्रारकर्त्याने त्यावर सही केली पाहिजे. तक्रारकर्त्याला नक्कलप्रत ताबडतोब विनामूल्य दिली पाहिजे, अशी तरतूद आहे.
        पोलीस स्टेशन प्रमुखांनी जर तक्रार घेण्यास नकार दिला व त्यामुळे अन्याय झाला असे वाटत असेल तर कायद्यान्वये जिल्हा पोलीस अधीक्षक किंवा पोलीस आयुक्त (जेथे आयुक्त असेल त्या ठिकाणी) यांच्याकडे पोस्टाने तक्रार पाठविता येईल. हे अधिकारी स्वतः गून्ह्याचा तपास करू शकतात किंवा आपल्या हाताखालिल अधिकाऱ्यास तपासाचा आदेश देऊ शकतात.
        घटना जर दखलपात्र नसलेल्या गून्ह्याची असेल तर पोलीस तशी नोंद फौजदारी प्रक्रिया कायद्याच्या कलम १५५ अन्वये दखलपात्र नसलेल्या गुन्ह्यांच्या रजिस्टरमध्ये करून ठेवतात.अशा गुन्ह्यामध्ये पोलीसांना गुन्हा नोंदवून आरोपीस अटक करता येत नाही. त्यासाठी तक्रारकर्त्याला न्यायालयात फौजदारी खटला दाखल करण्याची सुचना पोलीसांनी दिली पाहिजे, अशी तरतूद आहे. यालाच सर्वसामान्य पणे, एन. सी. नोंदविने म्हणजे (non cognizable offence) नोंदविने म्हणतात.
        पोलीस स्टेशन प्रमुखांनी तक्रार घेतली नाही तर भादंवि १६६अन्वये त्यांच्याविरुध्द कारवाई होऊ शकते. सरकारी कायदा मोडला या गुन्ह्यासाठी कलम भादंवि १६६अन्वये १ वर्षापर्यंत तुरुंग व  दंड या शिक्षेची तरतूद आहे. गुन्ह्यांचे गंभीर स्वरूप असूनही हलक्या स्वरूपाचा गुन्हा मुद्दाम नोंदविला तर भादंवि १६७ अन्वये सरकारी नोकराने गैर दस्तऐवज तयार करणे यास्तव गुन्हा होईल व यासाठी ३वर्ष तुरुंग किंवा दोन्ही अशा शिक्षेची तरतूद आहे. किंवा भादंवि. २१७ नुसार शिक्षेपासून कुणाचा बचाव करण्याच्या हेतूने कायद्यातचा भंग केला म्हणून गुन्हा ठरेल व त्यासाठी २वर्ष तुरुंग व दंडाच्या शिक्षेची तरतूद आहे. शिवाय वरिष्ठ पोलीस अधिकारी,मुंबई  पोलीस अधिनियमाच्या कलम २५ अन्वये प्रशासकीय कारवाई करू शकतात. 
🌟🌟🌟तक्रार करताना घ्यावयाची खबरदारी 🌟🌟🌟
        घटनेत दिवस, वेळ, स्थळ, नूकसानीचे वर्णन, उपस्थित व्यक्ति इत्यादि नमूद करावे. तक्रार घटना घडल्यानंतर  विनाविलंब नोंदविली पाहिजे. तक्रारीमध्ये घटनेचा महत्वाचा भाग नमूद करायचा राहू नये. तक्रार करण्यास उशीर झाला असेल तर त्याचे योग्य ते कारण नमूद करावे अन्यथा आरोपीला संशयाचा फायदा मिळतो व  तो निर्दोष होऊ शकतो. तक्रार ही सत्य असावी.

🌟🌟🌟प्रथम सूचना अहवाल सार्वजनिक दस्तऐवज 🌟🌟🌟
        न्यायालयाने चन्नपा विरुद्ध कर्नाटक राज्य या खटल्यात प्रथम सूचना अहवाल हे पुरावा कायद्याच्या कलम ७४व ७६ अन्वये सार्वजनिक दस्तऐवज (public document) आहे. हे तपासण्याचा नागरिकांना हक्क आहे. योग्य ती 'फी'  घेऊन त्याची प्रत दिली पाहिजे. असे मा. कर्नाटक उच्च न्यायालयाने म्हटले आहे (१९८० क्री. लॉ. ज. पान १०२२)

🌟🌟🌟खोटी तक्रार 🌟🌟🌟
           पोलीसांना खोटी तक्रार देणे भादंवि कलम २११ अन्वये गुन्हाअसून त्यासाठी २ वर्ष तुरुंग दंड अशा शिक्षेची तरतूद आहे. कलम १८२अन्वये सुध्दा गुन्हा होईल.
        तक्रारदेऊनही पोलीसांनी काहीही कारवाई केली नाही तर न्यायालयात खासगी फौजदारी खटला दाखल करता येतो. पोलीसांना चौकशी करण्याचा आदेश न्यायालय देऊ शकते.
       पोलीस स्टेशन प्रमुखाने तक्रार नोंदविली नाही तर जिल्हा पोलीस अधीक्षकाकडे तक्रार करता येईल.
        आपण दिलेल्या तक्रारीचे काय झाले ? याची माहिती अधिकार कायद्यान्वये विहीत नमुन्यात अर्ज करून मागता येईल. माहिती आधिकार कायद्याअंतर्गत आपणास आवश्यक माहिती कोणत्याही कार्यालयातून मिळु शकेल.
        माहिती आधिकार कायद्यान्वये विहित नमुन्यात  योग्य ती 'फी' चे कोर्ट तिकीट लावून अर्ज करायचा असतो. संबंधीत  कार्यालयाच्या माहिती अधिकाऱ्याने अर्ज पुरविणे बंधनकारक आहे. माहिती न दिल्या किंवा चुकीची किंवा अपूर्ण माहिती दिल्यास ३०दिवसा नंतर अपील करता येईल. अपील अधिकारी त्याच कार्यालयात नेमलेले असतात.त्यावर अपीलासाठी राज्यस्तरीय व राष्ट्रीयस्तरीत माहिती अधिकारी नियुक्त केलेले आहेत.पोलीस स्टेशन चे माहिती अधिकारी पोलीस आयुक्त किंवा सहाय्यक पोलीस आयुक्त कार्यालयात असतात. माहिती आधिकारा अंतर्गत माहिती पोष्टने सुध्दा मागता येते परंतु विलंब टाळण्यासाठी व अर्जातील त्रुटिंची पूर्तता करण्यासाठी संबधीत कार्यालयात प्रत्यक्ष जाऊन अर्ज करणे चांगले. माहिती अधिकाऱ्याने विनाकारण माहिती दिली नाही तर शिक्षेची तरतूद आहे. 'पेनॉल्टी' चा मराठी अर्थ शिक्षा होतो.
          फिर्याद लिहून घेण्यास नाकारने हा भा. दं. वि कलम १६६ आणी २१७ नुसार गुन्हा होईल. फिर्यादी नुसार घटनेचे गांभीर्य न  नोंदविता गुन्ह्यांचे स्वरुप सौम्य करणे हा भा. दं. वि  १६७ व २१८ अन्वये गुन्हा होईल.
         गून्ह्याची नोंद केल्यावर पोलीसांनी प्रथम सुचना अहवालाची एक प्रत न्यायालयात पाठविली पाहिजे.

🌟संधर्भ🌟
  ए. आय. आर. १९७६सुप्रीम कोर्ट पान २४२३.

         अदखलपात्र गून्ह्यात तपास करायचा असेल तर पोलीसांनी फौजदारी प्रक्रिया कायदा कलम १५५(२) अन्वये न्यायालयाची परवानगी घेतली पाहिजे.
🌟संदर्भ 🌟
   अविनाश मधुकर वि. महाराष्ट्र राज्य १९८३क्रि. लॉ. ज. ८३३ , १९८४ महाराष्ट्र लॉ. जनरल ८८.

🌟  तक्रार नोंदविण्याबाबतच्या नव्या सूधारीत तरतुदीं🌟

      भा. द. वि. 326 अ  (ॲसिड टाकणे किंवा प्रयत्न करणे)
          354, 354 अ, ब, क, ड,  (विनयभंग) 376, 376, अ, ब, क, ड, ई, व कलम 509 या गुन्ह्या अंतर्गत तक्रार देण्यास महिला पोलीस स्टेशनला आली असेल तर तिची तक्रार महिला आधिकाऱ्याने लिहिली पाहिजे. या गुन्ह्यासाठी तक्रार देणारी महिला मानसिक रुग्ण असेल किंवा अपंग असेल तर तिच्या घरी जाऊन किंवा तिच्या सोयींच्या जागेवर जावून फिर्याद लिहून घेतली पाहिजे. अशा महिलेच्या तक्रारीचे व्ही. डी. ओ. रेकॉर्डिंग सुध्दा केले  पाहिजे अशी तरतूद  2013 च्या कलम दुरुस्ती अन्वये करण्यात आली आहे.
🙏👮👮👮👮👮👮👮👮👮👮👮👮🙏

                   *अनिल वैद्य*
          *माजी न्यायाधीश*
📕📕📕📕📕📕📕📕
या देशातील नागरिकांना आपल्या अधिकाराची माहिती झाली तर तो प्रशासनाला धारेवर धरेल म्हणून सर्व ग्रूप्स ला पाठवा 📢📢📢📢📢📢📢

डॉ बाबासाहेब आंबेडकरांनी कानून मंत्री (Law Minister) पदाचा राजीनामा का दिला?



डॉ बाबासाहेब आंबेडकरांनी कानून मंत्री (Law Minister) पदाचा राजीनामा का दिला?

मुख्य 4 कारणे....

Note:- 

कृपया नक्की वाचा आणि सर्व
SC/ST/OBC पर्यंत पोहचवा.

"बाबासाहेबांनी घटनेमधे 340 कलम ओ. बी. सी . च्या आरक्षणा विषयी लिहिले त्याची वस्तुस्थिती आणि कर्मकहाणी"

1) कलम क्र. 341 नुसार 
शेड्युल्ड कास्ट ( SC ) ना 15 % प्रतिनिधित्व दिले

2) कलम क्र. 342 नुसार शेड्युल्ड ट्रायब्जना 
( ST ) 7.5 % प्रतिनिधित्व दिले 

आणि या वर्गवारीतील लोकांचा विचार करण्या अगोदर बाबासाहेबांनी प्रथम OBC म्हणजेच इतर मागासवर्गीय यांचा विचार केला. 

म्हणुन बाबासाहेबांनी 340 या कलमानुसार OBC ना प्रथम प्रतिनिधित्व दिले 

3) कलम 340 नुसार OBC ना 52% प्रतिनिधित्व देण्याचे कलम घटनेत टाकले, तेव्हा त्यावेळचे लोहपुरुष सरदार पटेल या कलमाला विरोध करताना म्हणाले 
 हे OBC कोण आहेत?"
असा प्रश्न सरदार पटेलांनी स्वत: 
OBC असुनहि विचारला.

कारण त्यावेळी SC आणि ST यांची वर्गवारी निश्चित झाली होती आणि OBC नेमके कोण 
हे identified झाले नव्हते.

कोणतेही कलम लिहिल्या नंतर बाबासाहेबांना ते कलम प्रथम तीन लोकांना दाखवावे लागत असे.

1) पंडीत नेहरू 
2) राजेंद्र प्रसाद आणि 
3)सरदार पटेल.

हे तिघे 'मंजुर' म्हणाले की बाकीचे त्याला 
विरोध करण्याचे धाडस करत नव्हते. 

त्यावेळी संविधान सभेत एकूण 308 सदस्य होते व त्यापैकी 212 Congress चे होते . 

340 कलम 341 आणि 342 च्या 
अगोदर आहे हे सर्व OBC बांधवानी 
लक्षात घेतले पाहिजे.

340 वे कलम हे नेमके काय आहे

ज्यावेळी बाबासाहेबांनी 340 व्या कलमाचे प्रावधान केले व सरदार पटेलान्ना दाखवले त्यावर सरदार पटेल बाबासाहेबांना प्रश्न विचारतात 
 "ये OBC कौन है?" 

हम तो SC और ST कोही  backward  मानते है ये OBC आपने कहा से लाये ?
सरदार पटेल हे पण बॅरिस्टर होते आणि 

ते स्वत: OBC असताना त्यांनी 
या कलमाला विरोध केला .

परंतु या मागील मेंदु मात्र गांधी नेहरुंचा होता.

यावेळी बाबासाहेब सरदार पटेलांना म्हणाले 

" its all right Mr. Patel मै आपकी बात संविधान मे डाल देता हू की

" संविधानातील 340 कलम हे सरदार पटेलांच्या तोंडचे वाक्य असुन 340 व्या कलमानुसार या देशाचे राष्ट्रपती यांना obc कोण आहेत हे माहीत नाही आणि हे ओळखण्यासाठी आयोग नियुक्त करण्याचा आदेश देत आहे." 

गांधी.. नेहरू .. पटेल ... प्रसाद आणि त्यांची congress OBC ओ. बी. सी. ला प्रतीनीधीत्व देउ ईच्छित नाही हे बाबासाहेबांना दाखवुन द्यायचे होते

परंतु 340 व्या कलमानुसार राष्ट्रपती राजेंद्र प्रसाद यांनी OBC कोण आहेत हे ओळखण्या साठी आयोग नेमला नाही म्हणून दि. 27 सप्टेंबर 1951  बाबासाहेबांनी केंद्रीय  कायदेमंत्रीपदाचा राजीनामा दिला. 

म्हणजे OBC च्या कल्याणासाठी केंद्रीय मंत्रीपदाचा राजीनामा देणारी पहिली आणि शेवटची व्यक्ति म्हणजे बाबासाहेब.

परंतु अजुनही ही घटना इथल्या OBC ना माहिती नसावी ही खेदाची गोष्ट आहे.

सर्वांत महत्वाचे म्हणजे बाबासाहेबांना तो राजीनामा पंडीत नेहरूनी संसदेत वाचु दिला नाही. 

शेवटी 10 OCT 1951 रोजी बाबासाहेबांनी तो संसदेच्या बाहेर प्रसार माध्यमांपुढे मांडला.

जर संसदेत राजीनामा वाचला असता तर भविष्यात OBC ना कळले असते की बाबासाहेबांनी त्यांच्यासाठी कायदेमंत्रीपदाला लाथ मारली. 

बाबासाहेबांनी कायदेमंत्रीपदाचा राजीनामा दिला ती चार कारणे अणुक्रमाने खालीलप्रमाणे.

1) 340 कलमानुसार OBC साठी आयोग नियुक्त केला नाही म्हणुन 

2) नेहरुंचे परराष्ट्रीय धोरण चुकीचे होते..

3) हिंदु कोड बील 

4) पंतप्रधानांनी ( नेहरू ) खाते वाटपात बाबासाहेबां बरोबर केलेला दुजाभाव. 

पण बाबासाहेबांनी हिंदु कोड बीलासाठी राजीनामा दिला याचा मात्र जाणिवपणे प्रचार केला जातो. 

राजीनामाचा वरील क्रम पाहीला तर बाबासाहेबांनी कुणाला जास्त महत्व दिले होते हे आपल्या लक्षात येत.



डॉ भीमराव अम्बेडकर के जीवन की सच्ची प्रेरणादायक बातें - संकलन: निखिल सबलानिया



बाबासाहेब डॉ. बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की ईमानदारी का ऐतिहासिक प्रसंगअम्बेडकर की ईमानदारी का ऐतिहासिक प्रसंग

1943 में बाबसाहेब श्रम मंत्री थे और पी डब्ल्यू डी विभाग भी उन्हीं के पास था। डॉ अम्बेडकर के इस विभाग का प्रमुख बनने से पहले इस विभाग का सालाना बजट एक करोड़ रूपये का था जो डॉ अम्बेडकर के प्रमुख बनने के बाद पचास करोड़ रूपये सालाना का हो गया था क्योंकि दिल्ली का विकास करना था और डॉ अम्बेडकर को इसलिए मुखिया बनाया गया था क्योंकि वह एक, शिक्षित, बुद्धिमान, ईमानदार और उच्च चरित्र के आदरणीय व्यक्ति थे। 30-6-1944 को दिल्ली के एक बड़े करोड़पति ठेकेदार के पुत्र बाबासाहेब के बेटे यशवंत राव से दिल्ली में मिले और उनसे कहा कि यदि वह डॉ अम्बेडकर को सरकारी ठेके दिलवाने के लिए मनवा ले तो वह यशवंत को उन ठेकों में भागिदार बना लेंगे और 25%-50% तक कमीशन देंगे। माननीय यशवंत मान गए। उसी शाम जब डॉ अम्बेडकर को यह बात पता चली तो वह अपने पुत्र पर इतने आग बबूल हो गए कि की यशवंत को उसी रात यह कहते हुए वापिस बॉम्बे (मुंबई) भिजवा दिया कि : " मैं यहाँ पर केवल सारे अछूत (दलित) समाज के उद्धार के ध्येय को लेकर आया हूँ। अपनी संतान को पालने नहीं आया हूँ। ऐसे लोभ-लालच मुझे मेरे ध्येय से डिगा नहीं सकते।" डॉ अम्बेडकर के पुत्र को उसी रात भूखे पेट ही बॉम्बे के लिए रवाना होना पड़ा। - (यह घटना पुस्तक 'युगपुरुष बाबासाहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर' में लिखी है। 

बाबासाहेब डॉ अम्बेडकर की दलितों के उत्थान के प्रति सच्ची निष्ठा का एक ऐतिहासिक प्रसंग

एक बार इंग्लैंड की एक पत्रिका के प्रतिनिधि वहां से भारत यहां के प्रमुख नेताओं के इंटरव्यू लेने को आए। उन्हें मिस्टर गांधी से मिलने का समय रात्रि 9 बजे मिला, मिस्टर जिन्ना से मिलने का समय 9:30 (साढ़े नौ बजे) का मिला और डॉ अम्बेडकर ने कहा कि वह किसी भी समय आ सकते हैं। जब वह मिस्टर गांधी से मिलने गए तो उनसे कहा गया कि वह सो गए हैं सो अगले दिन आए। जब वहमिस्टर जिन्ना के घर पहुंचे तो उनके यहां भी यही कहा गया कि वह सो गए हैं सो गए हैं सो अगले दिन आए। इस बीच डॉ अम्बेडकर के पास पहुंचने में उन्हें देर हो गए और वह रात के 12:00 (बारह बजे) डॉ अम्बेडकर के घर पहुंचे तो यह देख कर आश्चर्यचकित रह गए कि बाबासाहेब अपनी पूर्ण वेशभूषा में अध्यन्न करते हुए उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। इंग्लैंड के लोगों ने यह दखते हुए आश्चर्य से उनसे कहा, "आश्चर्य है, देश के दो महान नेता मिस्टर गांधी और मिस्टर जिन्ना, हमको सोए हुए मिले लेकिन आप अभी तक अपनी नियमित ड्रेस में हमारी प्रतीक्षा में जाग रहे हैं !" बाबासाहेब ने उत्तर दिया " मिस्टर गांधी और मिस्टर जिन्ना आराम से सोते हैं, क्योंकि उनका समाज जागृत है - उनका समाज जागरूक है। मैं जाग रहा हूँ, क्योंकि मेरा समाज सोया हुआ है - अनभिज्ञ है, वह उनके समाज की भांति जागरूक नहीं है। " इंग्लॅड से आए पत्रकार यह सुन कर अवाक् रह गए।


(यह प्रसंग पुस्तक 'युगपुरुष बाबासाहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर' में दिया है।)


कैसे बाबासाहेब डॉ अम्बेडकर ने तैयार की दलितों में से पहले गजेटेड अफसरों की फ़ौज


ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत में अछूतों (दलितों), हिन्दुओं, सीखो, मुसलमानों और ईसाईयों को गोलमेज सम्मलेन में प्रतिधित्व के अधिकार दिए गए जिसे 1935 के संविधान में रखा गया। उसके तहत मुसलमानों, सिखों और ईसाईयों को तो आरक्षण दिया गया परन्तु दलितों को तब भी वंचित रखा गया क्योंकि सरकार में तब भी अफसर बामण-बणिया थे और अपनी बामणवादी विकृत मानसिकता के कारण वह दलितों को उनको मिले अधिकारों से वंचित रखना चाहते थे। मुस्लमान, सिख, और ईसाई दलितों की तुलना में हर प्रकार से बहुत ताकतवर समूह थे सो उनके आरक्षण का कड़ाई से पालन किया जाता था और यहां तक कि उनका आरक्षण न भरा जाने पर उनके स्थानों को हिन्दुओं से भी नहीं भरा जाता था और यदि ऐसा होता तो यह समूह आंदोलन करते थे। पर बाबासाहेब डॉ अम्बेडकर को इस बात की चिंता थी कि दलितों को प्रतिनिधित्व से वंचित रखा जा रहा था। सरकार ने केवल एक आदेश जारी किया पर उस पर काम तो बामण-बणिया सरकारी अधिकारीयों ने ही करना था और वह उसका पालन नहीं कर रहे थे। फिर 1943 में डॉ अम्बेडकर श्रम मंत्री बने। बनते ही उन्होंने अपनी पार्टी 'शेड्यूल कास्ट फेडरेशन' के भारत भर के दफ्तरों में यह सन्देश भिजवाया कि जो भी ग्रेजुएट (स्नातक) दलित युवक मिले उनको दिल्ली भेजा जाए। सारे भारत में खोज शुरू हो गई और बंगाल, आसाम, उड़ीसा, बिहार (झारखण्ड), तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र (गुजरात), मध्य प्रदेश (छत्तीसगढ़), राजस्थान, पंजाब (हरियाणा और हिमाचल प्रदेश), उत्तर प्रदेश (उत्तराखंड) और दिल्ली में जो भी शेड्यूल कास्ट के ग्रेजुएट मिले उन्हें बाबासाहेब ने अपने पास बुलवाया और उन्हें गजेटेड पोस्टों पर नियुक्त करवाया। उन्ही में से एक डी. संजीवया बाद में आँध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री, भारतीय कांग्रेस के अध्यक्ष और केंद्र में मंत्री बने। सैकड़ों वर्ष बाद अछूतों को देश का शासन करने के लिए शासक वर्ग का अंग बाबासाहेब ने इस प्रकार बनाया। यह था बाबासाहेब डॉ अम्बेडकर का आश्चर्यजनक संघर्ष और चमत्कार। 


डॉ अम्बेडकर के पुस्तक प्रेम की प्रशंसा

मिस्टर जॉन मुंथर ने अपनी पुस्तक 'इनसाइड एशिया' (1938) में लिखा है कि "बाबासाहेब का निजी पुस्तकालय, व्यक्तिगत पुस्तकालयों में संसार में सबसे बड़ा था।" उन्होंने यह भी लिखा है कि "लोग रहने के लिए मकान बनाते हैं, लेकिन डॉ अम्बेडकर ने पुस्तकों के लिए अपना 'राजगृह' बनवाया है। " सन 1938 में उनके पुस्तकालय में लगभग 8000 किताबें थी। वह संख्या उत्तरोत्तर बढ़तीही गई, घटने का तो प्रश्न ही नहीं था। (1956 में बाबा साहेब के परिनिर्वाण के समय उनके निजी संग्रह में पचास हज़ार पुस्तकें थी। )

मेरे लोगों का पेट भरते ही दूसरी कौम वालों की नौकरी की चिंता लग जाती है - डॉ अम्बेडकर

मुझे (लेखक को) बाबासाहेब ने उद्योग विभाग में इन्स्पेक्टर सिविल सप्लाईज -पंजाब में रु 400 - 800 के ग्रेड में, केंद्र सरकार की ऊंची नौकरी पर नवम्बर, 1943 में नियुक्त करवाया था। मेरा प्रधान कार्यालय लाहौर में था। मैं लाहौर विश्वविद्यालय का पोस्ट ग्रेजुएट था। बहुत समय तक लाहौर का सार्वजनिक विद्यार्थी रहा था। वहाँ पर मेरे एक साथी थे। वे हिंदू थे। उन्होंने एम. ए. (इंग्लिश) किया था। मैं संस्कृत का एम. ए. , एम्. एल. ओ. था। लेकिन हम दोनों गहरे मित्र थे। बाबासाहेब के स्नेह और उनकी कृपा से मेरी अच्छी अधिकार संपन्न नौकरी लग गई थी। किन्तु अभी मेरी नौकरी लगी ही थी। मैं प्रायः पंजाब से यानी लाहौर से बाबासाहेब की चरण वंदना करने दिल्ली हर साप्ताह आता जाता था।

          उन्हीं के बंगले पर ठहरता था। 20 दिसंबर, 1943 के दिन प्रात: कालीन नाश्ता करते समय बाबासाहेब के प्रसन्न मन को जान कर मैंने यों ही बाबासाहेब से प्रार्थना की कि मेरे एक दोस्त को भी कहीं नौकरी पर लगवा दें। मैंने अपने हिंदू दोस्त की सारी योग्यताओं को बताया। उसके बायोडाटा का कागज़ उनके सामने रख दिया । 
          उस कागज़ को पढने के बाद बाबासाहेब ने मेरी और गंभीरता से देखा और कहा, "मेरे लोगों का पेट भरते ही दूसरी कौम वालों की नौकरी की चिंता लग जाती है।" उस समय दूसरे लोग-कुछ अधिकारी और आगंतुक भी टेबल पर साथ ही बैठे थे। लगभग सभी अपने ही लोग थे। बाबासाहेब मेरी और देखते हुए बोले, "हमारे लोग आजतक परोपकार करने में अपने आप को गौरवशाली समझते हैं। देखो इस लड़के को, अभी-अभी नौकरी पर लगा है, इसे हमारे समाज के गरीब लोगों की शिक्षा की चिंता नहीं है। इसे अपने हिंदू मित्र की चिंता है? अपने लोगों की सहायता करने के लिए मैं केंद्रीय सरकार या प्रांतीय सरकारों में एक अकेला हूँ। जबकि हिंदू या मुसलमान अपने धर्म के शिक्षित लड़कों की सहायता करने के लिए हजारों आफिसर और मंत्री विद्यमान हैं। ऐसे परोपकार करनेवाले हमारे समाज में ही मिलेंगे!" इस सम्बन्ध में उन्होंने एक एतिहासिक कथा भी सुनाई:-
          "चौदहवीं सदी में गोधरा (गुजरात) में महाराजा कृष्ण प्रसाद का राज्य था। उसके राज्य में अकाल पडा। बामण ज्योतिषियों ने राजा को बताया कि यदि नगर के विशाल तालाब में किसी मनुष्य की बलि दी जाए तो उससे जलदेवी, जो स्वयं प्यासी तड़प रही है, मनुष्य के खून को पीकर तृप्त होगी और वर्षा कर देगी। महाराज ने अपने सारे राज्य में ढिंढोरा पिटवाया कि जो कोई भाई जल की देवी के लिए अपना बलिदान करेगा उसे महापुण्य का फल प्राप्त होगा और वह स्वर्ग में जा कर महादिव्य सुख पाएगा। उसके बलिदान से जलदेवी प्रसन्न होकर सारी प्रजा के लिए जल की वर्षा करेगी। बलिदान की तिथि निश्चित कर दी गई और तालाब पर राजा का यज्ञ आरम्भ हो गया। लेकिन निश्चित तिथि तक किसी भी हिंदू धर्म वाले ने, अपनी बलि देने के लिए अपने आप को स्वर्ग जाने की इच्छा से राज ज्योतिषी के सुपुर्द नहीं किया। राजाज्ञा का कोई प्रभाव उसकी हिंदू प्रजा पर नहीं पडा। वर्षा न होने के कारण चारों और त्राहि - त्राहि मच रही थी। बामणों को छोड़ कर सभी प्यासे और भूखे मर रहे थे। बामनों में राजा अन्न बाँट रहा था। तालाब पर तमाशा देखने के लिए लोग हजारों की संख्यां में एकत्र हुए थे। बहुत से बकरे-बकरियों और गायों को काट-काट कर वर्षा की देवी पर चढ़ाया जा चुका था। अब केवल नर-बलि ही करना बाकी रह गया था। फिर से ढिंढोरा पिटा गया लेकिन उसके बाद भी कोई हिंदू आगे नहीं आया। तब एक भूखा अधनंगा, दीनहीन आदमी भीड़ में से निकला और उसने अपनेआप को बलि होने के लिए राजा के सुपुर्द किया। वह व्यक्ति अछूत था। वह जंगल में वास करता था। उसी तालाब में बामणि हत्यारों ने उसका गला काट दिया। उसके बलिदान से वर्षा हुई या नहीं, इस सम्बन्ध में इतिहास लिखने वाले चुप हैं लेकिन नर-बलि से वर्षा होती तो संसार में कहीं पर भी अकाल नहीं पड़ता। इसिलए यह केवल बामणि धोखेबाजी थी। ठीक यही अवस्था हमारे लोगों की है। अत्याचार करनेवाले, शोषण करनेवाले और दिन दहाड़े हमारी झोपड़ियों में आग लगानेवालों की रक्षा करने के लिए हमारे लोग सदा ही तैयार रहते हैं।" मेरी ओर इशारा करते हुए बाबासाहेब ने कहा - "इस लड़के की कुर्बानी इससे कम नहीं है। यह अपने बंधू-बांधवों और समाज के बेरोजगार नौजवानों की सहायता करे। इसी में समाज की भलाई है।"


डॉ भीमराव आंबेडकर का पुस्तक प्रेम - सच्ची बातें



पढ़ना-लिखना डॉ भीमराव आंबेडकर के जीवन की सबसे बड़ी ख़ुशी थी। इसका एक उद्देश्य था, उनके जीवन में यह उनका लक्षय था कि अपने आपको हर संभव शस्त्रास्त्र से लैस करे, ज्ञान का भण्डार अर्जित करे और मानसिक शक्ति विकसित करके और भी ऊँची उपलब्धियों और उस नई ज़िन्दगी के लिए स्वयं को तैयार करें, जो उनके लिए एक महान कैरियर के द्वार और संभावनाएं खोलनेवाली थी। 

डॉ आंबेडकर बड़े पढ़ाकू थे। उनकी पुस्तकों का संग्रह देश में सबसे विपुल और विविध था। पुस्तकों और ज्ञानार्जन की उनकी पिपासा कभी शांत नहीं होती थी और गंगा की तरह अजस्त्र थी। वह कहते थे, "मेरी पुस्तकें मेरी साथी रही हैं, वह मुझे पत्नी और बच्चों से भी अधिक प्यारी हैं।" पुस्तकें डॉ आंबेडकर के जीवनभर उनकी महान और सच्ची  मित्र रहीं। पुस्तकों की संगती में उन्हें अपार आनंद और सुख का अनुभव होता था। पुस्तकें उन्हें गम्भीरतापूर्वक औरों से ऊपर और अलग रखती थीं। वह उनके उनके लिए आत्म-विकास, शिक्षा, मनोरंजन और आनंद का सबसे बड़ा साधन थीं। उन्हें मनुष्य की संगती की अपेक्षा पुस्तकों की संगती में अधिक आनंद मिलता था। वह अपना एक क्षण भी नष्ट नहीं करते थे और पूरी शांति व तन्मयता से पढ़ने-लिखने में बहुत आनंद लेते थे। कभी-कभी वह मौन धारण कर लेते थे और कई तरह की पुस्तकें एक साथ पढ़ते थे और अचानक एक पुस्तक रख कर दूसरी उठा लेते थे। वह घंटी की टन-टन, गाड़ियों की गड़गड़ाहट, हथौड़े की ठक-ठक, कर, टैक्सी और बसों की चिल्ला-पौं से दूर रहना चाहते थे। सुबह-सुबह जब उनका कुत्ता जब उनकी थपथपाहट के  लिए उनके पास आता था, तभी उन्हें पता चलता था कि सुबह हो चुकी है। 

जब वह गहन अध्यन्न में जुटे होते थे, तब तक कोई भी व्यक्ति बाधा डालने का साहस नहीं कर सकता था। व्यापारियों के लिए समय ही पैसा होता है, किन्तु, डॉ आंबेडकर के साथ तो समय ने एक परम्परा का रूप ले लिया था जो उनके नाम के इर्द-गिर्द घूमता था। 

उन्हें दोस्त बनाना भी नहीं आता था। इसका एक कारण यह था कि उन्हें मनुष्यों से अधिक पुस्तकों का साथ अच्छा लगता था और वह अधिकाँश समय पढ़ने लिखने और सोचने में लगे रहते थे। ज्ञान की उनकी पिपासा एक साम्राज्य की पिपासा थी और उनके जीवन की सबसे बड़ी चाहत पुस्तकें थी। दुर्लभ पुस्तकों के संग्रह को वह बेहद लालायित रहते थे. कभी-कभी वह अपने मित्रों से इस आधार पर दुर्लभ पुस्तकें ले-लेते थे कि उनकी कॉपी करवा कर लौटा देंगे, और उन दिनों यह बड़ा मुश्किल काम होता था।  

कभी अगर वह घर पर नहीं होते थे तो उन्हें ढूंढना किसी के लिए भी मुश्किल नहीं होता था। घर के अलावा वह बस पुस्तकालयों और पुस्तकों की दुकान में ही मिलते थे। उनकी राय थी कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आमदनी का दस प्रतिशत पुस्तकों पर खर्च करना चाहिए। 

संकलन: निखिल सबलानिया www.cfmedia.in



डॉ. भीमराव अम्बेडकर का काम पूरा करेगा आर्थिक रूप से मजबूत समाज

डॉ भीमराव अम्बेडकर का वह काम है : बराबरी वाले समाज की स्थापना करना। पढ़िए पूरा लेख और जानिए कि कैसे इस काम को पूरा करेगा आर्थिक रूप से मजबूत समाज।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने अपने जीवन में आर्थिक विषमताओं से जूझते हुए भारत के पिछड़े और शोषित लोगों के उत्थान के कार्य पूरे किए। अपने जीवनकाल में उन्हें बहुत बार ऐसी कठिन आर्थिक परिस्थितियों से जूझना पड़ा जिनकी वजह से उन्हें कई बार अपने कई सामाजिक और राजनैतिक कार्यों को रोकना पड़ा। बेशक बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर उन विषम आर्थिक परिस्थितियों से भी जूझते रहे, परन्तु फिर भी उन्होंने अपने कामों का कारवां कभी नहीं रोका। वह विषम आर्थिक परिस्थिति में भी अपने कारवां को बढ़ाते रहे और पिछड़े और शोषित समाज के अधिकारों, सम्मान और सुरक्षा के लिए निरंतर प्रयत्नरत रहे और अपने प्रयत्नों में सफल भी रहे। परन्तु फिर भी अपने जीवन में कई बार उन्होंने इस बात का अफ़सोस किया कि उनके और उनकी संस्थानों के पास उतना धन नहीं था जितना कि उन लोगों के पास था जो शोषण करते थे और अपने राजनैतिक और धार्मिक संस्थानों को चला रहे थे। धन की कमी को बाबा साहेब अक्सर कहा करते थे और अपने जीवन के अंतिम दिनों में भी उनकी यह चिंता थी। 

अपने जीवन के अंतिम कुछ दिनों में भी बाबा साहेब को इसी बात की चिंता थी कि उनकी संस्थानों के पास धन की कमी है। बिमारी की हालत में भी वह चंद हज़ार रुपयों को अपनी पार्टी के बैंक खाते में जमा करवाना चाहते थे जिससे कि उनके बाद भी पार्टी का काम चलता रहे। लोगों से मिले धन को उन्होंने कभी अपना नहीं समझा और न ही वह कभी गलत तरीके से कमाए धन पर अपनी नज़र रखते थे। वह एक सच्चे ईमानदार व्यक्ति थे और अपने गरीब लोगों के धन को बहुमूल्य मानते थे। परन्तु उस समय उनके अनुयाईयों के पास धन अधिक मात्रा में नहीं था और उनके बाद न ही तो उनके अनुयायी धन के सही स्रोत्र ही पैदा कर पाए और न ही धन को संचय कर पाए जिसकी वजह से उनके जाने के बाद आज भी उनके कार्य रुके पड़े हैं और धन की वह व्यवस्था नहीं बन पाई है जिससे कि उनके कार्यों को आगे बढ़ा कर पूरा किया जा सके। 

डॉ. अम्बेडकर के कार्यों को पूरा करने के लिए एक ऐसे सामाजिक ढाँचे को खड़ा करने की जरुरत है जो बराबरी और न्याय में विशवास रखता हो। एक ऐसा सामाजिक ढांचा जहाँ लोग चरित्रवान हों, जहाँ ईमानदारी, सच्चाई और मानवता व्याप्त हो। एक ऐसा सामाजिक ढांचा जो जातीपति न मानता हो और आर्थिक रूप से कमजोरों को उठाने के निरंतर प्रयास करनेवाला हो। एक ऐसा समाज जहाँ मानवीय भावना इतनी मजबूत हो कि उस ढाँचे के लोग एक दूसरे को मारने-काटने या लूटने की जगह, एक दूसरे की भलाई की बाते सोचें। 

डॉ. भीमराव अम्बेडकर के उस कार्य, उस सामाजिक ढाँचे को खड़ा करने के कार्यों को आगे बढ़ाना अपनेआप में एक विशाल कार्य है। उस विशाल कार्य में आते हैं अनगिनत कार्य। सामाजिक शिक्षा, राजनैतिक शिक्षा, बौद्ध धम्म की शिक्षा, मानवता की शिक्षा और शिक्षा के साथ-साथ राजनैतिक, सामाजिक और धम्म के संस्थाओं को खड़ा करना, जो पहले से ही खड़े हैं उन्हें विकसित करना और भविष्य के लिए उनको सुरक्षित करना। यह सारे काम करने के लिए भावना, दृढ़ संकल्प, मेहनत और शिक्षा के साथ जो बहुत महत्वपूर्ण पर्याय की आवश्यकता है वह है धन। और धन को उपलब्ध करा सकते हैं ऐसी धनी लोग जो डॉ. अम्बेडकर के कार्यों को पूरा करने के लिए दृढ़ संकल्प हों। और वह धनी लोग उसी सामाजिक ढाँचे से ही आ सकते हैं जिस ढाँचे के लिए डॉ. अम्बेडकर काम कर रहे थे। परन्तु उस ढाँचे में आज भी उतने धनी और संपन्न लोग नहीं हैं जो कि इतना धन उपलब्ध करा सकें जिससे कि डॉ. अम्बेडकर के कार्यों को पूरा किया जा सके। डॉ. अम्बेडकर शिक्षा, नौकरियों और सामाजिक न्याय की व्यवस्था तो संविधान के माध्यम से उपलब्ध करा गए थे पर शायद वह कुछ और वर्ष रहते तो धन की व्यवस्था भी कर देते। 

पर आज हमें उनके कार्यों को पूरा करना है और उनका वह कार्य जो शायद वह अपने और कुछ वर्षों में करते, कि धन की व्यवस्था करते, उस कार्य को आज हमें पूरा करना है। हमें धन, धनी, धनी बनने वाले और धनी बनाने वाले लोगों की जरुरत है। धन की शिक्षा, व्यवसाय की शिक्षा और उस शिक्षा पर चलते हुए धन संचय और धन के स्रोत्र पैदा करना एक ऐसा बड़ा कार्य है जिस पर उन अनगिनत लोगों का भविष्य टिका है जो आज एक दमनकारी सामाजिक ढाँचे में फंसे हुए हैं। आज से सौ वर्षों पहले जो लोग उस दमनकारी ढांचे में फंसे थे आज उनकी एक पीढ़ी ऐसी बन चुकी है जो डॉ. अम्बेडकर की दिलाई सुविधा से शिक्षित और नौकरीपेशा बन चुकी है। परन्तु अभी भी इस पीढ़ी में धन की वह शक्ति नहीं है जिससे कि यह डॉ. अम्बेडकर के कार्यों को पूरा कर पाएं। और साथ ही नौकरीपेशा होने की वजह से इन्हें वह शिक्षा और अनुभव प्राप्त नहीं हो पाता जो व्यवसाय (बिज़नेस) और निवेश ( इन्वेस्टमेंट ) करने वालों को होता है।  इसलिए आज इस पीढ़ी के लिए जरुरत है कि वह अपनी और शिक्षाओं के साथ धन की शिक्षा भी लें। वह यह शिक्षा भी लें कि धन कैसे बनाया जाता है और कैसे बढ़ाया जाता है। धन को बनाना और बढ़ाना कोई तिगड़म ( ट्रिक ) नहीं है बल्कि एक शिक्षा है जो कि अनुभव के साथ बढ़ती और विकसित होती है।  जीवन में हर सफल काम को करने के लिए उस काम की शिक्षा की आवश्यकता होती है और इसीलिए धन को बनाने और बढ़ाने के लिए भी इसकी शिक्षा की आवश्यकता है। 

यह अफ़सोस का विषय है कि धन को बनाने और बढ़ाने की शिक्षा न स्कूलों में और न ही कालेजों में ही मिल पाती है। यह शिक्षा कुछ अनुभवी लोग ही जानते हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी से व्यवसाय करते आ रहे हैं। और सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक विषमता झेलने वाले लोगों में तो यह शिक्षा न के बराबर ही है। एक तो व्यवसाय और निवेश से चंद लोग ही जुड़े हैं, दूसरे, धन की शिक्षा भी नहीं है, इन सबके मिश्रण से एक ऐसा अज्ञान सामाजिक ढांचा खड़ा होता है जहाँ "निर्भरता और असहायता" लोगों की जनसंख्या के साथ और अधिक बढ़ती जाती है। वह लोग जो धन के लिए नौकरियां पाने के लिए धनी लोगों पर निर्भर होते हैं और यह निर्भरता पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ती ही जाती है और फिर वही लोग असहाय होते हैं क्योंकि वह धन की शिक्षा और उसके अभाव में धन बनाने और बढ़ाने के स्रोत्र नहीं पैदा कर पाते। तो कल तक जो लोग डॉ. अम्बेडकर की दिलाई सुविधाओं के अभाव में अपने उत्थान के कार्यों को करने में असमर्थ थे, वहीं उनकी नई पीढ़ी जो आज थोड़े सम्मानजनक और अधिकारपूर्ण जिंदगियों को जी रही हैं, वह भी धन के अभाव में अपने पूर्वजों की तरह निर्भर और असहाय ही हैं और वह कार्य जो उनके पूर्वजों ने शुरू किए थे उन्हें आगे बढ़ाने में असक्षम हैं। 

तो धन की शिक्षा के लिए जरुरी है कि उसकी शिक्षा ली जाए। उस शिक्षा को लेने के लिए जरुरी है कि उस शिक्षा से जुड़े शिक्षाविदों से ज्ञान प्राप्त किया जाए और साथ ही वह कार्य किए जाएं जिससे कि धन को बनाना और बढ़ाना सीख सकें।  व्यवसाय और निवेश दो ऐसे तरीके हैं जिनसे कि धन बनाने और बढ़ाने के स्रोत्रों को पैदा किया जाता है। यदि इनकी शिक्षा ली जाए तो वह कार्य किए जा सकते हैं जिससे कि वह सामाजिक ढांचा खड़ा किया जा सके जिसके लिए डॉ. भीमराव अम्बेडकर समस्त जीवनभर प्रयत्ननशील रहे। परन्तु धन के अभाव में वह अपने कार्यों को और विस्तृत रूप नहीं दे पाए जो विस्तृत रूप शोषण करने वाले लोग दे पाते थे क्योंकि शोषण करने वालों के पास न केवल धन बहुत अधिक मात्रा में ही था बल्कि उनकी नज़रें केवल और केवल धन और धन के स्रोत्रों पर ही टिकी रहती थीं। आज भी उसी शोषण करने वालों की पीढ़ियों के द्वारा ही समस्त सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक, न्यायिक, व्यावसायिक, शैक्षिक, सुरक्षा और संचार की संस्थाएं चल रही हैं। इन सब व्यवस्थाओं पर अपना वर्चस्व कायम कर गैरबराबरी वाले ढाँचे को ज्यों-का-त्यों रखा जाता है और यदि उस ढाँचे को गिराने की कोशिश की जाती है तो उस चुनौती को भी चपलता और चालाकी से समाप्त कर दिया जाता है। इसलिए जरुरत है उस पर्याय को पाने की जिससे कि डॉ. अम्बेडकर के बराबरी वाले कार्यों को मजबूत और विस्तृत किया जाए। और उसके लिए जरुरी है कि धन, धनी और धन के स्रोत्र बनाने वाली शिक्षा का अध्यन्न और प्रचार किया जाए। 

यदि आप भी धन की शिक्षा लेना चाहते हैं तो आप हमारी सात पुस्तकों का सैट जरूर पढ़ें। मेरा यह लेख पढ़, सुन या देख कर यह न समझें कि यह कोई व्यवसाय का प्रचार है, यह प्रचार है शिक्षा का, उस शिक्षा का, जिसकी सबसे ज्यादा जरुरत, गरीब, शोषित व कमजोर लोगों को होती है। जीवन में सबसे बहुमूल्य है समय, इसलिए यदि आप यह पुस्तकें खरीद भी लें परन्तु यदि आप इन्हें पढ़ने और इनकी सीख पर अमल करने में अपना समय नहीं लगाते तो आपकी सबसे बड़ी हानि होती है क्योंकि आप धन लगा कर भी समय नहीं दे पाए और यह शिक्षा पाने का अवसर जीवन में गँवा दिया। इसलिए जरुरी है कि आप अपने समय का सदुपयोग करें और इस शिक्षा को ग्रहण करने में अपना समय लगाएं। हो सकता हो कि आप में वह गुण उत्पन्न हो जाएं जिनसे कि आप धन को बनाना और बढ़ाना सीख सके और फिर डॉ. भीमराव अम्बेडकर के कार्यों को और विकसित और विस्तारित कर पाएं। - निखिल सबलानिया 


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