Monday, November 28, 2016

छूने तक का अधिकार देने को तैयार नहीं

*झाँसी: कलराज ने मंच पर की केशव मौर्या की बेइज्जती*

झाँसी में परिवर्तन रैली में भाजपा नेताओं ने परिवर्तन का आह्वान करने के साथ-साथ प्रदेशाध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्या की अच्छी-खासी बेइज्जती कर दी। मंच पर जब सारे नेता एकजुटता का संदेश देने के लिए खड़े होकर एक दूसरे का हाथ पकड़कर उठाने लगे तो केंद्रीय लघु उद्योग मंत्री कलराज मिश्रा ने केशव प्रसाद मौर्या का हाथ ही झटक दिया। मंच पर हुई बेइज्जती से अकबकाए केशव मौर्या को जब कारण समझ नहीं आया तो कलराज मिश्रा ने डाँटकर उनसे दूर रहने की हिदायत दे दी।

दरअसल, केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्रा इस बात पर ध्यान लगाए रहे कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह उनके ही बगल में रहें। इसमें तो वे कामयाब रहे लेकिन वे यह नहीं देख पाए कि उनकी दूसरी तरफ  कोई राष्ट्रीय या ब्राह्मण नेता नहीं, बल्कि केशव प्रसाद मौर्या ही आ गए हैं।

इसके बाद जब उत्साहित होकर सभी नेता एक दूसरे का हाथ पकड़कर एकजुटता का संदेश देने लगे तो अपने को बड़ा नेता मानने की गफलत में पड़े केशव मौर्या ने बगल में खड़े कलराज मिश्रा का हाथ पकड़कर ऊपर उठाने की कोशिश की। जब कलराज ने देखा कि केशव प्रसाद मौर्या उनका हाथ पकड़कर रहे हैं, तो वे बुरी तरह बिफर गए। उन्होंने गुस्से और हिकारत से केशव का हाथ झटक दिया, और डाँट दिया। 

मजबूर होकर केशव को अपनी झेंप मिटाने की कोशिश करते हुए अपना एक ही हाथ ऊपर करना पड़ा। मंच पर मौजूद नेताओं का तो इस घटना पर उस समय ध्यान नहीं गया, लेकिन नीचे से सब देख रहे लोगों को ये घटना बहुत बुरी लगी।

केशव प्रसाद मौर्या एक ओर जहाँ अपने को प्रदेशाध्यक्ष होने के नाते मुख्यमंत्री पद का दावेदार बता रहे हैं, और इस बहाने कुशवाहा, मौर्या वोटों को लुभाने में लगे हैं, वहीं ब्राह्मणी संस्कृति में पले-बढ़े कलराज मिश्रा उन्हें छूने तक का अधिकार देने को तैयार नहीं हुए, और मंच पर ही उनकी बेइज्जती कर बैठे।

अगले दिन जब अखबारों में तस्वीर और खबर छपी, तो केशव प्रसाद मौर्या को अपनी बेइज्जती का अहसास हुआ, लेकिन वो अब कुछ करने की स्थिति में नहीं रहे। भाजपा के सवर्ण नेताओं ने भी इसे सामान्य घटना मानकर इसकी अनदेखी कर दी है।

रैली में कुशवाहा और अन्य ओबीसी नेताओं का भी पर्याप्त अपमान हुआ। प्रतिष्ठित नेता हरगोविंद कुशवाहा को कुछ ही दिन पूर्व बहुजन समाज पार्टी छोड़कर भाजपा में आए थे, लेकिन उन्हें भी कोई तवज्जो नहीं दी। खास बात ये है कि बुंदेलखंड में कुशवाहा समाज की संख्या काफी है, और वो जीत में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र नारायण सिंह यादव का कहना है कि स्थानीय कुशवाहा समाज के साथ-साथ प्रदेश स्तर पर भी कुशवाहा और ओबीसी समाज में इस घटना को लेकर काफी नाराजगी और अपमान की भावना देखी जा रही है।  बाबूसिंह कुशवाहा के जनाधिकार मंच के कार्यकर्ता सबसे तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं और कह रहे हैं कि भाजपा में कुशवाहा नेताओं का अपमान हो रहा है।

हालाँकि, खुद केशव प्रसाद मौर्या भी अपनी ही पार्टी के दलित नेताओं का अपमान करते रहे हैं। पिछले दिनों सोनभद्र जिले में वे भाजपा के दलित सांसद छोटेलाल खरवार की अच्छी-खासी बेइज्जती कर चुके हैं। इस खबर के अखबारों में आने के बाद और अपमानित छोटेलाल खरवार की तस्वीरें वायरलहोने के बाद भाजपा की अच्छी-खासी बेइज्जती हुई थी। सोशल मीडिया पर भी भाजपा की अच्छी-खासी फजीहत हुई थी।

पत्रकार महेंद्र नारायण सिंह यादव ने पूरे घटनाक्रम पर व्यंग्य करते हुए फेसबुक  पर लिखा है- "ओबीसी होकर ब्राह्मण को छूते हो? पंडितजी को अपवित्र कर दिया! सर्दी के दिनों में पंडित जी को तुरंत नहाना पड़ गया होगा! "75" साल पारकर चुके पंडित जी ठंड लग जाए तो कौन जिम्मेदार होगा?  बड़े आए मुख्यमंत्री बनने का सपना देखने वाले, दूर हटो

Saturday, November 26, 2016

आरक्षण की समीक्षा

[10/20, 10:51 AM] ‪+91 92001 42243‬: आजकल जहाँ भी दो चार जनरल केटेगरी वाले इक्कठे बैठते हैं वहाँ एक ही चर्चा होती है कि इस आरक्षण ने देश को बर्बाद कर दिया है, अब तो सभी बराबर हो गए हैं कोई जातिवाद नहीं है इसलिए अब इस आरक्षण को खत्म कर देना चाहिए।

अफशोस की बात यह की हमारे कई नेता भी बोलने लगे हैं कि आरक्षण की समीक्षा होती है तो क्या बुरा है।

जिन लोगों को सब कुछ ठीक ठाक लग रहा है और कहीं भी जातिवाद नजर नहीं आता है उनको आह्वान किया जाता है कि आओ मेरे साथ मैं तुम्हें जातिवाद दिखाता हूँ।

आओ चलें ईंट भट्ठों पर और देखो वहाँ जो ईंट पाथ रहें हैं या पक्की हुई ईंटों की निकासी कर रहे हैं जिनमें पुरुषों के साथ साथ उतनी ही संख्या में महिलाएं भी दिखाई दे रही हैं उनमें ब्राह्मण, राजपूत और बणिया कितने हैं ?

इसका जवाब यही होगा कि इनमें तो उन समाजों का एक भी व्यक्ति नहीं है तो फिर यह जातिवाद नहीं है तो फिर क्या है ?

अब आगे चलो मेरे साथ शहरों की गलियों में और ध्यान से देखो जो महिलाएं सड़कों पर झाड़ू लगा रही हैं और गंदी नालियाँ साफ कर रही हैं उनमें कितनी ब्राह्मणी, ठुकराईंन और सेठाणी जी दिखाई दे रही हैं ?

यहाँ भी वही जवाब की इनमे तो ब्राह्मणी, ठुकराएंन और सेठाणी एक भी नहीं है तो यह जातिवाद नहीं है क्या ?

अब आओ चलते हैं रेलवे स्टेशन, हमारे देश में कई हजारों की संख्या में रेलवे स्टेशन बने हुए हैं वहाँ जो रेलवे लाइनो पर शौच के ढेर के ढेर लगे हुए रहते हैं उनको रातों रात साफ करने के लिए पंडित जी आता है या सिंह साहब या फिर शाहूकार जी सेवा देते हैं।

इसका भी वही जवाब मिलेगा की उनमे से तो एक भी नहीं आता है तो फिर क्या यह जातिवाद नहीं है ?

अब रूख करते हैं भवन निर्माण कार्य करने वाले मिस्त्री और मजदूरों की ओर, जो पूरे दिन अपना हाथ चलाते रहते हैं जिन्हें मिस्त्री कहते हैं और जो पूरे दिन सिर पर काठड़ी ढोने में लगे रहते हैं उन्हें मजदूर कहा जाता है वैसे वे मजदूर नहीं बल्कि मजबूर हैं क्योंकि 50 डिग्री तापमान में कोई कूलर की हवा खा रहा होता है तो कोई ऐ सी में मौज कर रहा होता है उस वक्त भी ये लोग तेज गर्मी और लू के थपेड़े खा रहे होते हैं, अब इनमे भी नजर दौड़ाते हैं तो उनकी संख्या नदारद मिलती है तो क्या यह जातिवाद नहीं है क्या ?

अब अपना ध्यान जगह जगह बोरी बिछाकर बैठे हुए उन लोगों की ओर लेकर जाओ जो जूता पॉलिश करते हैं या जूतों की मरमत करते हैं उनमें पंडित जी और उनके साथियों की भागीदारी कितनी है, जवाब मिलेगा बिलकुल शून्य, तो पूरा का पूरा तो जातिवाद भरा पड़ा है ।

अब आजाओ बाजारों की ओर चारों ओर जो बड़े बड़े मॉल और बड़ी बड़ी दुकाने दिखाई दे रही है उनका मालिक कोई एस सी समाज वाला भी है या नहीं ?

यहाँ एकदम से ही पासा पलट गया है अब यहां एस सी का एक भी बन्दा नजर नहीं आएगा और सभी पर ब्राह्मण और बनिया व राजपूत का कब्जा मिलेगा।

अब सभी मिलकर सोचो कि क्या यह जातिवाद नही है ?

बिलकुल यह खुलं खुला जातिवाद हैं।

अब मंदिरों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहना चाहता हूँ कि मंदिरों में कितने पुजारी ब्राह्मण के अलावा देखने को मिलते हैं, शायद एक भी नहीं । क्या इसे आप जातिवाद नहीँ समझते हो।

आज भी हर कदम पर जातिवाद का जहर भरा हुआ है और लोग कहते हैं कि अब कोई जातिवाद नहीं है अब आरक्षण खत्म कर दिया जाना चाहिए।

आरक्षण होते हुए भी उच्च पदों पर हमारे समाज के लोगों को पहुंचने से रोका जाता है यदि जिस दिन आरक्षण खत्म हो जायेगा उस दिन से तो जातिवाद और अधिक पढ़ जायेगा ।
इसलिये जो ऐसी बात करता है उसे कहो कि आओ मेरे साथ तुम्हेँ जातिवाद दिखाता हूँ ।

.....भारत में 3% ब्राह्मण .....
**********************
3% लोगों का हिस्सा देखिये....

लोकसभा में ब्राह्मण : 48 %
राज्यसभा में ब्राह्मण : 36 %
ब्राह्मण राज्यपाल : 50 %
कैबिनेट सचिव : 53 %
मंत्री सचिव में ब्राह्मण : 64%
अतिरिक्त सचिव ब्राह्मण : 62%
पर्सनल सचिव ब्राह्मण : 70%
यूनिवर्सिटी में ब्राह्मण वाईस
चांसलर : 61%
सुप्रीम कोर्ट में ब्राह्मण जज: 85%
हाई कोर्ट में ब्राह्मण जज : 70 %
भारतीय राजदूत ब्राह्मण : 51%
पब्लिक अंडरटेकिंग ब्राह्मण :
केंद्रीय : 67%
राज्य : 82 %

बैंक में ब्राह्मण : 67 %
एयरलाइन्स में ब्राह्मण : 61%
IAS ब्राह्मण : 72%
IPS ब्राह्मण : 61%
टीवी कलाकार एव बॉलीवुड : 83%
CBI Custom ब्राह्मण 72%
यदि हमारा आरक्षण गलत है और उसका सवर्णों के द्वारा विरोध किया जाता है! तो ये क्या है इसका विरोध आज तक किसी ने क्यो नही किया गया ? कहाँ छुपे हैं आरक्षण विरोधी लोग।
एससी-एसटी और ओबीसी को जो आरक्षण मिला है वह जनसंख्या के अनुपातिक आधार पर मिला है जिसके तहत SC & ST को 22.5% नौकरी और राजनीति में मिला है।ओबीसी की जनसंख्या 60%है जबकि आरक्षण केवल 27%मिला है । निम्न सारणी पर ध्यान दें ।
जनसंख्या आरक्षण प्रतिशत
एस सी 15 % 15 %
एस टी 7.5 % 7.5 %
ओबीसी 60 % 27 %
_______________________

योग 85 % 49.5% _______________________
अाज 60% ओबीसी समाज को 69 वर्षों में केवल 5% ही भर सका है।
SC, ST, OBC, MINORITY's जनसंख्या 85% और आरक्षण 49.5%
General castes जनसंख्या
15% और आरक्षण 50.5%
अब इस आंकड़ा को देख कर बताइए की वास्तविक में आरक्षण कौन ले रहा है? कुल मिला कर इस देश में मनुवादी ब्यवस्था आज भी कायम है। इसे कायम रखने वाले यहाँ की मनुवादी सरकारें है। जिन्होंने बारी बारी इस देश में 70 सालों तक राज किया । और अपनी ब्यवस्था को कायम रखने के लिए अपनी कूटनीति के तहत हमें आपस में लडाते रहते हैं और हमारे आरक्षण का विरोध करते हैं ताकि उनको मिल रही आरक्षण की ओर हमारा ध्यान ना जा सके। पर दुःख की बात तो यह है कि हमारे अपने ही लोग ढाल बन कर इनका साथ देते हैं जिसे मै अज्ञानी और मुर्ख के अलावा और कुछ नही कह सकता है।
: 👉 *मायावती ने मात्र 600 करोड़ में भारत के संविधान निर्माता का स्मारक _"अम्बेडकर पार्क"_ क्या बनाया पूरा मीडिया और विरोधी दिन रात  चिल्लाते रहे*।

1.जबकि कारीगर भी भारतीय थे।
2.रोजगार भी भारतीयों को मिला।
3.मैटेरियल भी भारत का ही था।
4.निर्माण शैली भी भारतीय  ही थी।
5.राज्य सरकार को स्मारक से राजस्व भी मिला।

गर्व से हम कह सकते हैं, *भारतीयों द्वारा*, *भारत में    निर्मित*

👉 *जबकि BJP सरकार 2500 करोड़ की सरदार पटेल की मूर्ति लगवा रही है वो भी _"मेड इन चीन"_*

1.जिस चीन ने आतंकवाद पर भारत का विरोध किया।
2.जो चीन आतंकवाद पर पाकिस्तान के साथ खड़ा है।
3.जिस चीन ने भारत के लिए पानी बन्द कर किया
4.जो चीन हमारे देश की जमीन हडपे हुए है।
5.जो चीन बात बात पर भारत को आंखे दिखाता है।

*तो उस चीन को इतना बडा आर्थिक लाभ क्यूँ*?

*लेकिन इस पर सारा मीडिया*, *पूरा देश खामोश है।*

*तो ऐसे में देश की जनता  चीनी सामान के बहिष्कार को कैसे गम्भीरता से लें*?

दीपावली की मीमांसा

🔥दीपावली🔥 मीमांसा

लेखक✍-सुनील

हम बचपन से स्कूली किताबों और अखबारों में पढते आएँ हैं कि दीपावली राम के वन से घर आने की खुशी में मनाई जाती है और विजयादशमी रावण को मारने की खुशी में।
क्या आप भी इसे सच मानते हैं?
यदि हाँ
फिर तो मुझे यह कहते हुए बड़ा दुःख होगा कि आप भेड़ वृति के हैं।
बुरा न माने
अपने ग्रंथों को उठाकर देखें।
पढना बड़ा भारी काम होता है चलो मैं ही बता देता हुँ।
चैत्रः श्रीमानयं मासः पुण्यः पुष्पितः कानन:।
यौवराज्याय रामस्य सर्वमेवोपकल्प्यताम्।।
-वाल्मिकी रामायण अयोध्या काण्ड ३/४
अर्थ-यह चैत्र मास बड़ा सुंदर और पवित्र है इसमें सारे वन उपवन खिल उठे हैं इस समय राम का युवराज पद पर अभिषेक करने के लिए सब सामग्री एकत्र कराईए।

श्व एव पुष्यो भविता श्वोभिषेच्यस्तु मे सुतः।
-अयोध्या कांड ४/२
अर्थ-कल ही पुष्य नक्षत्र होगा अतः मेरे पुत्र का कल ही अभिषेक होगा।

और पाठकों आपको पता है राम अगले दिन १४ वर्ष के वनवास को चले गए थे।
१३ वर्ष तक कुशल रही और १४ वें वर्ष परेशानियाँ आनी शुरू हुई।

सीता हरण के बाद जब हनुमानादि खोज में निकले तब अंगद कहता है-
वयमाश्व युजे मासि काल संख्या व्ययस्थिताः।
प्रस्थिता सोपिचातीतः किमतः कार्यमुत्तरम्।।
-किष्किंधा कांड सर्ग५३/९
अर्थ-सीता की खोज में हम आश्विन मास बीतते बीतते निकले थे किंतु यह तो यहीं निकल गया।अब हमें आगे क्या करना चाहिए।

पाठकों देखिए सीता की खोज में ही आश्विन मास निकल गया और हिंदू आश्विन मास में ही रावण का वध करवा डालते हैं।

सीता सुंदर कांड सर्ग ३७/8 में हनुमान से कहती है-"वानर!यह दसवाँ महीना चल रहा है"
मतलब चौदहवें वर्ष का पौष का महीना।

इसी कांड के ४०/१० में सीता कहती है-"राजकुमार शत्रुसूदन!मैं आपकी प्रतिक्षा में एक मास जीवित न रह सकूँगी।"
अर्थात् अभी फाल्गुन मास चल रहा है।

एक मास निकल जाने के बाद राम रावण युद्ध होता है और युद्ध कांड ९२/६८ में लिखा है-
अभ्युत्थानं त्वमद्यैव कृष्णपक्ष चतुर्दशी।
कृत्वा निर्याह्यमावस्यां विजयाय क्लैर्वृतः।।
अर्थ-आज कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी है आज तैयारी करके कल अमावस्या के दिन युद्ध के लिए प्रस्थान करो।

देखिए मित्रों १४ वाँ वर्ष बीत जाने पर अर्थात् चैत्र मास की अमावस्या को राम रावण युद्ध हुआ फिर हिंदू आश्विन में रावण क्यों जलाते हैं राम का विजया दशमी से क्या संबंध है?

रावण को मारने के बाद नव वर्ष लग गया।
पूर्णे चतुर्दशे वर्षे पंचभ्यां लक्ष्मणाग्रजः।
भरद्वाजाश्रमं प्राप्य ववन्दे नियतो मुनिम्।।
-युद्ध कांड १२४/१
अर्थ-राम ने 14 वर्ष पूर्ण होने पर पंचमी तिथि को भारद्वाज आश्रम में पहुंचकर मन को वश में रखते हुए मुनि को प्रणाम किया।
अर्थात् चैत्र शुक्ल पक्ष पंचमी को।

और इसी कांड के १२५/३ में राम हनुमान को भरत के पास जाकर अगले दिन राम के आने का संदेश देने को कहते हैं।

हनुमान भरत से कहते हैं-"हे भरत!किष्किंधा से गंगा तट पर आकर वे प्रयाग में भारद्वाज मुनि के समीप ठहरे हैं। कल पुष्य नक्षत्र के योग में बिना किसी विघ्न बाधा के आप राम का दर्शन करेंगे।

तो मित्रों इस प्रकार राम अगले दिन यानी चैत्र शुक्ल षष्ठी को अयोध्या लौटते हैं उसी पुष्य नक्षत्र में जिसमें वन को गये थे।
तो फिर हमें क्यों पढाया जाता है कि राम कार्तिक अमावस्या के दिन अयोध्या आये थे जिसकी खुशी में दिपावली मनाई जाती है।

न तो विजयादशमी को रावण मारा गया न कार्तिक अमावस्या को राम घर लौटा।

सच तो यह है विजया दशमी बौद्धों का त्यौहार है और दीपावली बुद्ध काल में भी यक्ष रात्रि के नाम से मनाया जाता था जिसका एक प्रमाण यह है कि इस दिन यक्षराज कुबेर की पूजा होती है।

लक्ष्मी की पूजा करते समय हिंदू यह बात नहीं जानते की लक्ष्मी की मूर्ति का विकास बुद्ध की माता महामाया की मूर्ति से ही हुआ है।

मेरा उद्देश्य तो मात्र हिंदुओं की भूल का प्रतिकार करना है ताकि विजयादशमी और दिपावली जैसे प्राचीन त्यौहारों के मूल का ज्ञान हो और कल्पित रामायण से इनका पीछा छूटे।

लेखक-✍सुनील
📞9166862313

भारत देश के एक मात्र राष्टपिता ,लोकमान्य ओर महात्मा जोतीराव फुले है

महात्मा जोतिराव गोविंदराव फुले  19वीं सदी के एक महान भारतीय विचारक, समाज सेवी, लेखक, दार्शनिक तथा क्रान्तिकारी कार्यकर्ता थे। सितम्बर १८७३ में इन्होने महाराष्ट्र में सत्य शोधक समाज नामक संस्था का गठन किया। महिलाओं व दलितों के उत्थान के लिय इन्होंने अनेक कार्य किए। समाज के सभी वर्गो को शिक्षा प्रदान करने के ये प्रबल समथर्क थे।

ज्योतिबा फुले भारतीय समाज में प्रचलित जाति आधारित विभाजन और भेदभाव के खिलाफ थे।
उन्होंने विधवाओं और महिलाओं के कल्याण के लिए काफी काम किया। उन्होंने इसके साथ ही किसानों की हालत सुधारने और उनके कल्याण के लिए भी काफी प्रयास किये। स्त्रियों की दशा सुधारने और उनकी शिक्षा के लिए ज्योतिबा ने 1851 में एक स्कूल खोला। यह इस काम के लिए देश में पहला विद्यालय था। लड़कियों को पढ़ाने के लिए अध्यापिका नहीं मिली तो उन्होंने कुछ दिन स्वयं यह काम करके अपनी पत्नी सावित्री को इस योग्य बना दिया। उच्च वर्ग के लोगों ने आरंभ से ही उनके काम में बाधा डालने की चेष्टा की, किंतु जब फुले आगे बढ़ते ही गए तो उनके पिता पर दबाब डालकर पति-पत्नी को घर से निकालवा दिया इससे कुछ समय के लिए उनका काम रुका अवश्य, पर शीघ्र ही उन्होंने एक के बाद एक बालिकाओं के तीन स्कूल खोल दिए।
विद्यालय की स्थापना
ज्योतिबा की संत-महत्माओं की जीवनियाँ पढ़ने में बड़ी रुचि थी। उन्हें ज्ञान हुआ कि जब भगवान के सामने सब नर-नारी समान हैं तो उनमें ऊँच-नीच का भेद क्यों होना चाहिए। स्त्रियों की दशा सुधारने और उनकी शिक्षा के लिए ज्योतिबा ने 1851 में एक स्कूल खोला। यह इस काम के लिए देश में पहला विद्यालय था। लड़कियों को पढ़ाने के लिए अध्यापिका नहीं मिली तो उन्होंने कुछ दिन स्वयं यह काम करके अपनी पत्नी सावित्री को इस योग्य बना दिया। उच्च वर्ग के लोगों ने आरंभ से ही उनके काम में बाधा डालने की चेष्टा की, किंतु जब फुले आगे बढ़ते ही गए तो उनके पिता पर दबाब डालकर पति-पत्नी को घर से निकालवा दिया इससे कुछ समय के लिए उनका काम रुका अवश्य, पर शीघ्र ही उन्होंने एक के बाद एक बालिकाओं के तीन स्कूल खोल दिए।
महात्मा की उपाधि
दलितों और निर्बल वर्ग को न्याय दिलाने के लिए ज्योतिबा ने 'सत्यशोधक समाज' स्थापित किया। उनकी समाजसेवा देखकर 1888 ई. में मुंबई की एक विशाल सभा में उन्हें 'महात्मा' की उपाधि दी। ज्योतिबा ने ब्राह्मण-पुरोहित के बिना ही विवाह-संस्कार आरंभ कराया और इसे मुंबई हाईकोर्ट से भी मान्यता मिली। वे बाल-विवाह विरोधी और विधवा-विवाह के समर्थक थे। अपने जीवन काल में उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखीं- तृतीय रत्न, छत्रपति शिवाजी, राजा भोसला का पखड़ा, ब्राह्मणों का चातुर्य, किसान का कोड़ा, अछूतों की कैफियत. महात्मा ज्योतिबा व उनके संगठन के संघर्ष के कारण सरकार ने ‘एग्रीकल्चर एक्ट’ पास किया. धर्म, समाज और परम्पराओं के सत्य को सामने लाने हेतु उन्होंने अनेक पुस्तकें भी लिखी

भारत देश के एक मात्र राष्टपिता ,लोकमान्य ओर महात्मा जोतीराव फुले है

जय भारत

क्या था साईमन कमीशन?

क्या था साईमन कमीशन?

जब बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर विदेश से पढकर भारत में बडौदा नरेश के यहां नौकरी करने लगे तो उनके साथ बहुत ज्यादा जातिगत भेदभाव हुआ। इस कारण उन्हें 11 वें दिन ही नौकरी छोड़कर बडौदा से वापस बम्बई जाना पड़ा। उन्होंने अपने समाज को अधिकार दिलाने की बात ठान ली।

उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को बार-बार पत्र लिखकर depressed class की स्थिति से अवगत करवाया और उन्हें अधिकार देने की माँग की।
बाबा साहेब के पत्रों में वर्णित छुआछूत व भेदभाव के बारे में पढकर अंग्रेज़ दंग रह गए कि क्या एक मानव दूसरे मानव के साथ ऐसे भी पेश आ सकता है। बाबा साहेब के तथ्यों से परिपूर्ण तर्कयुक्त पत्रों से अंग्रेज़ी हुकूमत अवाक् रह गई और 1927 में depressed class की स्थिति के अध्ययन के लिए मिस्टर साईमन की अध्यक्षता में एक कमीशन का गठन किया गया।

जब कांग्रेस व मो.दा.क.चं. गांधी को कमीशन के भारत आगमन की सूचना मिली तो उन्हें लगा कि यदि यह कमीशन भारत आकर depressed class की वास्तविक स्थिति का अध्ययन कर लेगा तो उसकी रिपोर्ट के आधार पर अंग्रेजी हुकूमत इस वर्ग के लोगों को अधिकार दे देगी। कांग्रेस व मो.दा.क.चं. गांधी ऐसा होने नहीं देने चाहते थे।
अतः 1927 में जब साईमन कमीशन अविभाजित भारत के लाहौर पहुंचा तो पूरे भारत में कांग्रेस की अगुवाई में जगह-जगह पर विरोध प्रदर्शन हुआ और लाहौर में मिस्टर साईमन को काले झंडे दिखा कर go back के नारे लगाए गए। बाबा साहेब स्वयं मिस्टर साईमन से मिलने लाहौर पहुंचे और उन्हें 400 पन्नों का प्रतिवेदन देकर depressed class की स्थिति से अवगत कराया। कांग्रेस ने मिस्टर साईमन की आँखों में धूल झोंकने के लिए उनके सामने ब्राह्मणों को depressed class के लोगों के साथ बैठ कर भोजन करवाया (बाद में ब्राह्मण अपने घर जाकर गोमूत्र पीकर उससे नहाये)। यह सब पाखण्ड देखकर बाबा साहेब मिस्टर साईमन को गांव के एक तालाब पर ले गये। उनके साथ एक कुत्ता भी था। वह कुत्ता अपने स्वभाव के मुताबिक सबके सामने उस तालाब में डुबकी लगाकर नहा कर बाहर आया। तब बाबा साहेब ने एक depressed class के व्यक्ति को तालाब का पानी पीने के लिए कहा। उस व्यक्ति ने घबराते हुए जैसे ही पानी पीया, आसपास के ब्राह्मणों ने हमला बोल दिया। आखिरकार बाबा साहेब सहित अन्य व्यक्तियों को पास की एक मुस्लिम बस्ती में शरण लेकर अपना बचाव करना पड़ा। मिस्टर साईमन को सब कुछ समझ में आ गया। उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को वस्तु स्थिति रिपोर्ट सौंप दी। बाबा साहेब भी बार-बार पत्राचार करते रहे और उन्होंने लंदन जाकर अंग्रेजी हुकूमत के वरिष्ठ अधिकारियों व राजनेताओं को बार-बार भारत की depressed class को अधिकार देने की मांग की।

बाबा साहेब के तर्कों को अंग्रेजी हुकूमत नकार नहीं सकी और उसने भारत की depressed class को अधिकार देने के लिए 1930 में communal award (संप्रदायिक पंचाट) पारित किया।
हमें विद्यालय में यह पढाया गया था कि कांग्रेस ने साईमन कमीशन को काले झंडे दिखा कर go back के नारे लगाए। परंतु उसने वास्तव में ऐसा क्यों किया, यह नहीं पढाया गया।

ऐसा शहर जहां न तो धर्म है, न पैसा है और न ही कोई सरकार

आज हम आपको भारत के एक ऐसे शहर के बारे में बताने जा रहे हैं ना तो यहां ना तो धर्म है, ना पैसा है और ना ही कोई सरकार। आप सभी यह सोच रहे होंगे कि भारत में तो शायद ही कोई ऐसा शहर हो लेकिन यह सत्य है और सबसे बड़ी बात यह है कि यह शहर चेन्नई से केवल 150 किलोमीटर दूर है। इस जगह का नाम ऑरोविले है आपको बता दें कि इस शहर की स्थापना 1968 में मीरा अल्फाजों ने की थी। इस जगह को सिटी ऑफ डॉन भी कहा जाता है यानी भोर का शहर।

आप सभी को जानकर हैरानी होगी कि इस शहर को बसाने के पीछे सिर्फ एक ही मकसद था कि यहां पर लोग जात-पात, ऊंच-नीच और भेदभाव से दूर रहें। यहां कोई भी इंसान आकर रह सकता है लेकिन शर्त सिर्फ इतनी हैं कि उसे एक सेवक के तौर पर रहना होगा। यह एक तरीके की प्रयोगिक टाउनशिप है जो की Viluppuram District तमिलनाडु में स्थित है। अब चलिए जानते हैं कौन है मीरा अल्फाजों। आपको बता दें कि मीरा अल्फाज़ों श्री अरविंदो स्प्रिचुअल रिट्रीट में 29 मार्च 1914 को पॉन्डिचेरी आई थी और वर्ल्ड वार प्रथम विश्वयुद्ध के बाद वह कुछ समय के लिए जापान चली गई थी।

लेकिन 1920 में वह वापस से पोंडीचेरी आ गई थी 1924 मैं श्री अरविंदो स्प्रिचुअल संसथान से जुड़ गयी और जनसेवा के कार्य करने लगी। 1968 आते आते उन्होंने ऑरोविले की स्थापना करदी जिसे यूनिवर्सल सिटी का नाम दिया गया जहा कोई भी कही से भी आकर रह सकता है। 2015 तक इस शहर का आकर बढ़ता चला गया और इसे कई जगह सराहा भी जा रहा है। आप इस शहर में करीबन 50 देशों के लोग रहते हैं।

इस शहर की आबादी करीब 24000 लोगों की है यहां पर एक मंदिर भी है। हालांकि मंदिर में किसी धर्म से जुड़े भगवान की पूजा नहीं होती यहां सिर्फ लोग आते हैं और योगा करते हैं। इस शहर की यूनेस्को ने भी प्रशंसा की है और आपको यह बात शायद नहीं पता होगी कि यह शहर भारतीय सरकार के द्वारा भी समर्थित है। हम आशा करते हैं यह जानकारी आपके लिए ज्ञानवर्धक सिद्ध हुई होगी क्योंकि हममें से शायद ही कोई हो जिसे यह पता हो कि भारत में भी इस प्रकार का कोई शहर है।

नोट बंद करने के लिए तीन तर्क

यह पोस्ट  तर्कहीन और विवेकहीन  भक्तो के  लिए  नहीं है .....


नोट  बंद  करने  के लिए  तीन  तर्क  दिए  जा  रहे  हैं, पहला  अर्थव्यवस्था रेगुलेटेड हो ,  दूसरा काला  धन  बाहर आएगा  और कला धन  वालों  को  पकड़ा  जायेगा और  तीसरा नकली नोट चलन से बाहर किये जांय ! अगर  यह  तीन  बातें  हो  तो  इसको  पूरा  समर्थन  |

 लेकिन ५०० और १००० के  नोट  बंद करने के फैसले  पर  कुछ  ज़रूरी बात  जिनपर  विचार  होना  चाहिए  :-

1.१०० से  कम  बड़े  कॉर्पोरेट घरानों (ख़रब  पतियों ) पर  बैंक का १२ लाख  करोड़ क़र्ज़  है, यह  हम  सब  जानते हैं की यह  पैसा किसी  सरकार , मंत्री या बैंक की  अपनी सम्पति  नहीं है  , यह  आम जानता की  गाढ़ी कमाई का  पैसा है  , जिसका  व्याज एक लाख चौदह हज़ार  करोड़  इस  साल  बजट  में  माफ़    कर  दिया  गया  | अगर सच में मोदी  जी को आम  जनता के  हित  में काले  धन  की  चिंता  है  तो क्यों  यह   व्याज  माफ़  किया जा रहा है क्यों  यह  क़र्ज़  नहीं  वसूला जा  रहा  है ?

2.यह  पूरा  अभियान  विदेशों से  काला धन न  ला  पाने  , सबके खाते  में  १५ लाख  का  वादा  पूरा  न  कर  पाने  की नाकामी को छुपाने  का  प्रयास  है | वे जो  ब्लैकमनी होल्डर हैं (असली / बड़े वाले ) उनपर कार्यवाही तो दूर आप सुप्रीम  कोर्ट तक के पूछने पर  उन लोगों के नाम  उजागर नहीं  करते | येही  है  आपका  साहस  |

3 अब  यहाँ  विचार  कीजिये  की  यह  खेल  आखिर है  क्या ? १२ लाख  करोड़  बैंक   का  corporates  के पास फंसा है, और  उन corporates के हितों की रखवाली  मोदी सरकार  द्वारा  उसका व्याज भी  माफ़ कर दिया  जा  रहा है | अब  पूँजी  के इस बढ़ते  संकट से  निपटने  के लिए बहुत  ज़रूरी  है की किसान ,मजदूर , खोमचे वाले ,  पटरी दुकानदार , तीसरी चौथी श्रेणी का कर्मचारी आम  महिलायों  और मध्यम वर्ग  के  पास रखे  पैसे को  बैंक  में एक झटके  में  जमा  कराया  जाये जिससे बैंक के पास  फिर  से  पूँजी  एकत्र  हो  और  सरकार  फिर  corporates  को  कर्ज  दिलवा सके |

4. सबसे  ख़राब स्थिति  यह  है कि करीब पाँच करोड़  लोग खुद और परिवार की बेहद ज़रूरी ज़रूरतों (दवा सब्ज़ी आटा चाय  दूसरी खुदरा चीज़ों)के लिये बेवजह सताये गय हैं । वे भोर से बैंकों, पोस्ट आफिसों की लाइनों में खड़े  रहे  । अपने ही  कमरतोड़ मेहनत से कमाए अपने पैसे को  अपने ऊपर खर्च करने  के  लिए  भीख  की तरह  लेने के लिए  ! इनमें से शायद ही कोई वो हो जिसको पकड़ने के लिये ये नोटबंदी की स्कीम लाई गई है | कितने  मजदूर , पटरी दुकानदारों  के  यहाँ  चूल्हा  तक  नहीं  जला  उसकी ज़िम्मेदारी  कोन लेगा ?

5. नोट्बंदी के  लिए ज़ारी किये  गए  तुगलकी सरकारी  आदेश में  यह  भी  शर्त लगायी  है  की अगर किसी  के  खाते  में  अगर  आज  से  लेकर  ३० दिसम्बर तक  २.५ लाख  से ज्यादा पैसा  जमा हुआ तो वोह जांच के  घेरे  में  आएगा  और उस पर  दो सौ परसेंट पेनालिटी  लगायी  जाएगी  | अच्छा  मजाक  है  मेहनत  से  इमानदारी  से  सचाई  से  अगर पैसा कमाया  है और उसमे से  अपना पेट काटकर  ( जो  प्राय: आम किसान  और  मजदूर परिवारों और निम्न मध्य वर्ग  में  होता  रहा  है )  पाँच सात , १० लाख जोड़ ले, या पत्नियों  द्वारा  सालों  साल पतियों  से  मिलने  वाले  घर  खर्च में  से  बचा कर  जो  पूँजी आज   एकत्र की  हो वोह काला धन  हो  जाएगी ? सबको  पता  है  काला धन  कोई नकद  में  नहीं  रखता होगा |

ऊपर लिखी  सारी मुसीबत  अगर  आम  जानता झेल  भी लेती  है  तब भी  सवाल  वोही  रहेगा  की  क्यों ? और  किसलिए ? इससे आम जनता  को  क्या  मिलेगा ? महगाईं  कम  होगी  ? आमदनी  बढ़ेगी  ? खाते  में  १५ लाख  आएगा  ? शिक्षा , खेती  , चिकित्षा में  सब्सिडी मिलेगी या  मुफ्त  हो  जायेगा  ?
या  आम  जनता को  भूखा मार  कर , परेशान  करके  बड़े कॉर्पोरेट घरानों  के   हितों  की रक्षा  की जाएगी जिनके  टुकड़े  खाकर  यह  सरकार  बनी  है  तो  अब नमक  का  हक़  तो  अदा करना  ही  है ।

सोचियेगा अवश्य l