Saturday, November 26, 2016

जिग्नेश मेवानी की रिहाई की मांग

प्रेस-विज्ञप्ति
जिग्नेश मेवानी तथा तीन और साथियों की गिरफ्तारी की निंदा करते हुए उनकी रिहाई की मांग की जाति उन्मूलन आंदोलन ने

रायपुर, दिनांक 21 नवम्बर 2016। जाति उन्मूलन आंदालन छत्तीसगढ़ ने गुजरात के दलित आंदोलन के युवा नेता जिग्नेश मेवानी और तीन अन्य साथियों को गिरफ्तार कर अहमदाबाद सेंट्रल जेल में रखने की तीव्र निंदा की है। विदित हो कि जिग्नेश मेवानी, गुजरात के उना में कथित गौरक्षकों और कट्टर हिंदूत्ववादी गिरोहों के अत्याचार से पीड़ित दलितों के अभूतपूर्व आंदोलन में उभरे हैं। जिस आंदोलन में यह नारा लगा कि ’’गाय की पूंछ तुम रखो, हमें हमारी जमीन दो’’। तत्पश्चात् यह आंदोलन पूरे गुजरात में फैल गया है। जिग्नेश और साथियों की गिरफ्तारी दलितों और उत्पीड़ितों द्वारा जाति व्यवस्था के खिलाफ, भूमि और वैकल्पिक रोजगार के लिए जो संघर्ष छेड़ा जा रहा है उस पर एक हमला है। यह हमला ब्राम्हणवादी, मनुवादी फासिस्ट ताकतें जो देश के काॅर्पोरेटीकरण की आड़ में पूरे देश में कर रही हैं उसी का हिस्सा है। हम तमाम प्रगतिशील ताकतों से अपील करते हैं कि वो जिम्नेश और अन्य साथियों की रिहाई के लिए अपनी आवाज बुलंद करें तथा जाति व्यवस्था के खिलाफ, दलितों के लिए भूमि व वैकल्पिक रोजगार की मांग के साथ ज्योतिबा फूले के मृत्युदिवस 26 नवंबर से डाॅ. बी.आर. आंबेडकर के मृत्युदिवस 6 दिसंबर 2016 तक प्रतिरोध अभियान चलाएं।
जय भीम लाल सलाम,

संजीव कुमार
संयोजक
जाति उन्मूलन आंदोलन
छत्तीसगढ़

कैशलेस हो जाने से टैक्स चोरी नहीं बंद होती

🐶 CHEMISTRY OF CASHLESS ECONOMY🐶        कैशलेस हो जाने से टैक्स चोरी नहीं बंद होती💥

अमरीका में 30 से 32 लाख करोड़ की सालाना टैक्स चोरी होती है। जिस तरह से भारत में आयकर विभाग है उसी तरह से अमरीका के इंटरनल रेवेन्यू सर्विस की एक रिपोर्ट इसी साल अप्रैल में छपी है। इस रिपोर्ट के अनुसार 2008 से 2010 के बीच हर साल औसतन 458 अरब डालर की टैक्स चोरी हुई है। अगर मैंने इसका भारतीय मुद्रा में सही हिसाब लगाया है तो अमरीका में 30 से 32 लाख करोड़ रुपये सालाना टैक्स चोरी हो जाती है। यह आंकड़ा इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में नोटबंदी के बाद से कैशलेश का ऐसा प्रचार किया जा रहा है जैसे ये हींग की गोली है जो अर्थव्यवस्था की बदहज़मियों को दूर कर देगी। कहा जा रहा है कि भारत में टैक्स चोरी बंद हो जाएगी या कम से कम हो जाएगी लेकिन अमरीका में कहां कम हो गई। कहां बंद हो गई है।

फ्रांस की संसद की रिपोर्ट है कि हर साल 40 से 60 अरब यूरो की टैक्स चोरी होती है। 60 अरब यूरो को भारतीय मुद्रा में बदलेंगे तो यह चार लाख करोड़ रहोता है। वहां का टैक्स विभाग 60 अरब यूरो की कर चोरी में से 10 से 12 अरब यूरो ही वसूल पाता है। यानी 30 से 50 अरब यूरो की टैक्स चोरी वहां भी हो ही जाती है। ब्रिटेन में हर साल 16 अरब यूरो की टैक्सचोरी होती है। भारतीय मुद्रा में 11 हज़ार करोड़ की चोरी। जापान के नेशनल टैक्स एजेंसी ने इस साल की रिपोर्ट मे कहा है कि इस साल 13.8 अरब येन की टैक्स चोरी हुई है। भारतीय मुद्रा में 850 करोड़ की टैक्स चोरी होती है। 1974 के बाद वहां इस साल सबसे कम टैक्स चोरी हुई है।

मान लीजिए कि पूरी आबादी इलेक्ट्रानिक तरीके से लेन-देन करती है तो भी यह गारंटी कौन अर्थशास्त्री दे रहा है कि उन तमाम लेन-देन की निगरानी सरकारें कर लेंगी। क्या यह उनके लिए मुमकिन होगा। अगर ऐसा है तो सरकार सभी बैंक खातों की जांच कर ले। हमारे बैंक तो इलेक्ट्रानिक हैं न। कई लोग कहते हैं कि बैंकों में अभी भी लोगों के कई नाम से खाते खुले हैं। बैंक अपने ग्राहकों से पहचान पत्र मांगता है तब भी बैंकों में खाता खोलकर काला-धन रखा ही जाता है। आयकर विभाग तमाम शहरों के कुछ बड़े दुकानदारों या बिजनेसमैन के यहां छापे डालकर लोगों में भ्रम पैदा करती है, सरकार सबको पकड़ रही है। क्या आप यह बात आसानी से मान लेंगे कि सांसदों, विधायकों के पास काला धन नहीं है। क्या सभी दलों के सांसदों या विधायकों के यहां छापे की ख़बर आपने सुनी है।

दुनिया में आप कहीं भी टैक्स चोरों का प्रतिशत देखेंगे कि ज़्यादातर बड़ी कंपनियां टैक्स चोरी करती हैं। आप उन्हें चोर कहेंगे तो वे आपके सामने कई तरह के तकनीकि नामों वाले बहिखाते रख देंगे। लेकिन कोई किसान दो लाख का लोन न चुका पाये तो उसके लिए ऐसे नामों वाले बहिखाते नहीं होते। उसे या तो चोर बनने के डर से नहर में कूद कर जान देनी पड़ती है या ज़मीन गिरवी रखनी पड़ती है। क्या उनके लिए आपने सुना है कि कोई ट्राइब्यूनल है। 2015 में Independent Commission for the Reform of International Corporate Taxation(ICRIT) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अंतर्राष्ट्रीय कारपोरेट टैक्स सिस्टम बेकार हो चुकी है।

अब बताइये, जिसकी तरह हम होना चाहते हैं, उसे ही बेकार और रद्दी कहा जा रहा है। इंटरनेट सर्च के दौरान ब्रिटेन के अख़बार गार्डियन में इस रिपोर्ट का ज़िक्र मिला है। इतने तथ्य हैं और रिपोर्ट हैं कि आपको हर जानकारी को संशय के साथ देखना चाहिए। इस रिपोर्ट का कहना है कि मल्टीनेशनल कंपनियां जिस मात्रा में टैक्स चोरी करती हैं उसका भार अंत में सामान्य करदाताओं पर पड़ता है। क्योंकि सरकारें उनका तो कुछ बिगाड़ नहीं पाती हैं। एक दो छापे मारकर अपना गुणगान करती रहती हैं। इन मल्टीनेशनल कंपनियों के टैक्स लूट के कारण सरकारें गरीबी दूर करने या लोककल्याण के कार्यक्रमों पर ख़र्चा कम कर देती हैं।

इसका मतलब यह है कि दुनिया भर की कर प्रणाली ऐसी है कि एक देश का अमीर दूसरे देश में अपना पैसा ले जाकर रख देगा। उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। इसी साल इंडियन एक्सप्रेस ने पनामा पेपर्स पर कई हफ्तों की रिपोर्ट छापी कि कैसे यहां के बड़े बड़े लोग फर्ज़ी कंपनी और शेयर के ज़रिये विदेशों में अपना पैसा रखे हुए हैं। सरकार जांच-वांच का एलान करती है मगर इस रफ्तार से काम करती है कि अंतिम नतीजा आते आते आप सबकुछ भूल चुके होंगे। नोटबंदी के सिलसिले में सब स्लोगन बांच रहे हैं। काला धन चला जाएगा। टैक्स चोरी बंद हो जाएगी। क्या भारत में नेशनल और मल्टीनेशनल कंपनियों की टैक्स चोरी बंद हो जाएगी? इस विश्वास का आधार क्या है? क्या अमरीका में 30 लाख करोड़ रुपये की टैक्स चोरी ग़रीब और आम आदमी करता है। वहां भी बड़ी कंपनियां टैक्स चोरी करती हैं। जानबूझ कर करती हैं ताकि टैक्स अदालतों में लंबे समय तक मामला चले और फिर अदालत के बाहर कुछ ले-दे कर सुलझा लिया जाए।

अमरीका में 70 प्रतिशत लोगों के पास डेबिट या क्रेडिट कार्ड हैं। आखिर अमरीका जैसे अति विकसित देश में 30 प्रतिशत लोगों के पास कार्ड क्यों नहीं है। ज़ाहिर है वे निर्धन होंगे। उनके पास बैंक में रखने के लिए पैसे नहीं होंगे। बैंक भी सबका खाता नहीं खोलते हैं। ग़रीब लोगों को अमरीका क्या भारत में भी कंपनियां क्रेडिट कार्ड नहीं देती हैं। अमरीका में भी दिहाड़ी मज़दूर होते हैं जो नगद में कमाते हैं। वहां क्यों नहीं इसे पूरी तरह ख़त्म कर दिया गया जो भारत में कुछ लोग इसे राष्ट्रवाद में लपेट कर धमकी भरे स्वर में बता रहे हैं कि यह आर्थिक तकलीफों से मुक्ति का श्रेष्ठ मार्ग है। गार्डियन अखबार में कैशलेश अर्थव्यवस्था पर आर्थिक पत्रकार Dominic Frisby का एक आलोचनात्मक लेख पढ़ा। इसमें उन्होंने कहा है कि कैशलेश का नारा दरअसल ग़रीबों के ख़िलाफ़ युद्ध का नारा है। ग़रीबी के ख़िलाफ़ नहीं। उन्होंने कहा है कि जिस तरह से इसकी वकालत की जा रही है, उन नारों को सुनेंगे तो लगेगा कि नगद का इस्तमाल करने वाले लोग अपराधी हैं। आतंकवादी हैं। टैक्स चोर हैं।

नोटबंदी ने हमें अपनी आर्थिक समझ का विस्तार करने का सुनहरा मौका दिया है। हमें नारों को ज्ञान नहीं समझना चाहिए। किसी बात को अंतिम रूप से स्वीकार करने की जगह, तमाम तरह की जानकारियों को जुटाइये। तरह तरह के सवाल पूछिये। फैसला सही है या नहीं है, इसके फेर में क्यों पड़े हैं। फैसला हो चुका है। इसके अच्छे-बुरे असर को जानना चाहिए और इसके बहाने समझ का विस्तार करना चाहिए। हम सब जानते हैं कि राजनीतिक रैलियों में लोग कैसे लाये जाते हैं। ज़ाहिर है अब नेता उन्हें हज़ार-पांच सौ का चेक देकर तो नहीं लायेंगे। नेता ही कहते हैं कि उनकी रैली में पैसे देकर लोग लाए गए थे। अब ऐसी रैली में अगर कोई काला धन की समाप्ति का एलान करे तो पैसे लेकर आई भीड़ ताली तो बजा देगी लेकिन जिस असलीयत को वह जानती है, उससे आंखें कैसे चुरा सकती है। एक काम हो सकता है कि जिस रैली में काला धन की समाप्ति का एलान हो, उसमें कहा जाए कि यहां आई जनता को पैसे देकर नहीं लाया गया है। इस रैली के आयोजन में इतना पैसा ख़र्च हुआ है, कुर्सी से लेकर माइक के लिए इतना इतना किराया देना पड़ा है, इन इन लोगों ने रैली के लिए चंदा दिया है।
निष्कर्षे_
बेहतर है कि नोटबंदी के लोग किये जा रहे दावों को छोड़ हम सवालों से देखें। हर जवाब हमारी आर्थिक समझदारी को विकसित करेगा। हम सभी सामान्य नागरिक लोग भी उतने योग्य नहीं है कि अर्थव्यवस्था के इन बारीक सवालों को दावे के साथ रख सकें। मैंने कोई अंतिम बात नहीं की है। आप भी अंतिम बात जानने का मोह छोड़ दें, नई बातें जानने की बेचैनियों का विस्तार करें।                     🙏🏻विचार क्रांति🙏🏻

अछूत के बच्चे की हत्या

मेरे प्रिय बंधुओं
    जरूर पढें आजादी के लगभग 70 साल बाद भी
       आज ब्राह्मणवाद व जातीय विद्वेसता का शिकार हुआ एक अधिवक्ता सिविल कोर्ट जिला श्रावस्ती  अवधेश कुमार भास्कर ने अपनी पत्नी  श्रीमती नैना भास्कर ग्राम लखैहिया पोस्ट किशुन पुर चन्दन भरी  जिला श्रावस्ती  को प्रसव कराने के लिए आज 11/08/2016को डा0 सोनल मिश्रा जो इन्द्रा कालोनी गली नम्बर 2 टी0 बी0 अस्पताल के सामने पुलिस लाइन रोड  बहराइच में है दिखाने ले गए अधिवक्ता अवधेश भास्कर  व परिवारजन  गए तो डा0 सोनल मिश्रा व डा0 सौरभ मिश्रा ने अपने आवास पर भर्ती कर लिया कुछ समय बाद फीस के रूप में 25 हजार रूपये नगद जमा करा लिया रात करीब 11:30 1ही मरीज नैना भास्कर थी  लड़का पैदा हुआ तब बच्चे के रोनी की आवाज आई   डा0 सोनल मिश्रा ने आकर अवधेश भास्कर से  बताया की लड़का पैदा  हुआ तो डाक्टर ने कहा की मरी माता को  परसाद मान दो भास्कर ने कहा मैं देवी देवता को नहीं मानता हूं वकील अवधेश  भास्कर उपरोक्त ने कहा मैं वकील हूं और मेरा लड़का जज बनेगा तब डा0 नाराज  होकर नैना भास्कर के पास रूम में  चली गई जब वकील अवधेश भास्कर उनके परिवार के लोग मिलना चाहा तो अंदर नहीं जाने दिया तथा 1 घटे बाद बच्चे का गला दबा कर मार डाला जब वकील अवधेश भास्कर डा0 सोनल मिश्रा व डा0 सौरभ मिश्रा से बात करने लगा तो जाति सूचक भद्दी -भद्दी गली देने लगे और कहा की चमार साले तुम लडके को जज बनाना चहते थे मैने मार कर जज बनाने का सपना खत्म कर दिया और सहपरिवार को जान से मार देने की धमकी देते हुये धक्के मार कर भगा दिया अधिवकता उपरोक्त आज भी शोक से ब्याकुल है डरा सहमा अपने घर में पडा है और डा0 सोनल मिश्रा चिकित्सा अधिकारीा सामु0स्वा0 केंद्र, गिलौला, श्रावस्ती  है तथा  डा0 सौरभ मिश्रा चि0 अधि0 सामु0 स्वा0 केंद्र पयागपुर बहराइच में पदाआसीन रहते हुए  भी अपने आवास पर अस्पाताल का संचालन कर रहे है तथा जातीय विद्वेषता के कारण अछूत के बच्चे की हत्या कर रहे है
🙏🏼🙏🏼 मेरे जय भीम वाले दोस्तों  से निवेदन है हर ग्रुप में भेजे जिससे पता चले की ब्राह्मण वाद आजादी के लगभग 70 साल बाद भी हावी है ।
सच्चे जय भीम वालो से निवेदन है की जल्दी से जल्दी भेजे जिससे अपने समाज के गरीब लोग बच सके और  एडवोकेट अवधेश भास्कर  सिविल कोर्ट श्रावस्ती।
*🙏🏻👏🏻नमो बुद्धाय जय भीम

जातिवाद देश में कलंक

नीच अंदर नीच जात, नानक तिन के संग

आस्ट्रिया की राजधानी वीएना में गुरु रविदास के अनुयाइयों पर सिखों के हमले ने सिख समुदाय में जातिवाद को सतह पर ला दिया है। वीएना की इस घटना के बाद पंजाब में शुरू हुए दंगों से सिखों में व्याप्त जातिवाद का जहर सबके सामने आ गया है।
गुरु नानक देव जाति प्रथा के बेहद खिलाफ थे। उनके जमाने में जातिवाद शिखर पर था। ऊंची जाति के लोग दलितों को छू लेने पर खुद को अपवित्र मानकर गंगाजल से नहाते थे। दलित की छाया को अपवित्र मानते थे ऊंची जाति के लोग, खासकर ब्राह्मण। ऐसे वक्त में गुरुनानक देव ने भाई लालो को अपना परम सहयोगी चुना था, जो दलित था। गुरुनानक देव ने कहा था- 'नीच अंदर नीच जात, नानक तिन के संग, साथ वढ्डयां, सेऊ क्या रीसै।'

यानी नीच जाति में भी जो सबसे ज्यादा नीच है, नानक उसके साथ है, बड़े लोगों के साथ मेरा क्या काम। सिख धर्म में लंगर प्रथा जातिवाद खत्म करने के लिए ही शुरू की गई थी। ताकि सिख धर्म के अनुयाइयों में बराबरी का एहसास हो। गुरुबाणी में यह भी लिखा है- 'ब्राह्मण, खत्री, सुद, वैश-उपदेश चाऊ वरणों को सांझा।' यानी गुरुबाणी का उपदेश ब्राह्मणों, क्षत्रीय, शूद्र और वैश्य सभी के लिए एक जैसा है।
गुरु नानक देव और गुरु रविदास एक ही समय में हुए थे। दोनों की आपस में कई मुलाकातें भी हुई। गुरुनानक देव का जन्म ननकाना साहिब में हुआ, तो गुरु रविदास का जन्म बनारस में हुआ था। वह चमार के घर में पैदा हुए थे, लेकिन ब्राह्मणों की तरह रहते थे। उन्हें काशी के नरेश ने इस बात पर तलब किया था कि वह माथे पर तिलक क्यों लगाते हैं। जातिवाद के खिलाफ मुहिम चलाने वाले गुरु रविदास की गुरुनानक देव से गहरी पटती थी। गुरुनानक देव ने बनारस जाकर गुरु रविदास से उनकी लिखी बाणियां और दोहे हासिल किए थे, जिन्हें बाद में गुरुबाणी में शामिल किया गया था।
गुरुग्रंथ साहिब में शामिल ये 40 दोहे ही अब गुरु गोबिन्द सिंह के सिखों और गुरु रविदास के अनुयाइयों में झगड़े का कारण बने हुए हैं। पंजाब के भटिंडा में जन्मे संत पीपल दास ने बीसवीं सदी के शुरू में गुरु रविदास की बाणी के आधार पर डेरा सच खंड शुरू किया। डेरा सच खंड में निम्न जातियों के सिख और हिंदू बड़ी तादाद में शामिल हो चुके हैं। डेरा सच खंड ने गुरु रविदास की जन्मस्थली बनारस में एक विशाल मंदिर बनाया है जिसका उद्धाटन दलित नेता बसपा प्रमुख कांशीराम से करवाया गया था। पीपल दास के बाद संत स्वर्ण दास, संत हरिदास, संत गरीब दास और अब निरंजन दास डेरा के प्रमुख हैं। वीएना में संत निरंजन दास को ही निशाना बनाया गया था, लेकिन वह बच गए हैं और उनके बाद डेरा में नंबर दो की हैसियत रखने वाले संत रामानंद की मौत हो गई है।
सिखों के डेरा सच्चा सौदा और डेरा सच खंड के झगड़ों का मुख्य कारण यह है कि गुरु ग्रंथ साहिब के बाद कोई गुरु नहीं हो सकता और गुरु ग्रंथ साहिब के कुछ हिस्से लेकर कोई नया ग्रंथ सिखों को गवारा नहीं। सच्चा सौदा के प्रमुख राम रहीम सिंह की सबसे बड़ी गलती यह है कि वह गुरु गोबिन्द सिंह का पहनावा पहनकर उनका स्वांग करते थे। डेरा सच खंड गुरु रविदास के दोहों पर आधारित ग्रंथ बना चुका है, जिसमें गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल 40 दोहे भी शामिल हैं। गुरु गोबिन्द सिंह ने गुरु ग्रंथ साहिब लिखने के बाद गुरु प्रथा खत्म कर दी थी। उन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब में लिखा था- 'सब सिखन को हुकुम है, गुरु मान्यो ग्रंथ।' लेकिन डेरा सच खंड के साथ ताजा झगड़े का कारण जातिवाद माना जा रहा है, जिसे खत्म करने के लिए सिख धर्म की स्थापना हुई थी। गुरु गोबिन्द सिंह ने जातिवाद को खत्म करने के लिए हुकुम दिया था कि हर सिख अपने नाम के आखिर में 'सिंह' लिखेगा और सिख महिलाएं 'कौर', लेकिन गुरु गोबिन्द सिंह का मकसद खत्म हो चुका है। सिख अपने नाम के पीछे ढिल्लो, सेखों, मेहता, भल्ला आदि लगाकर खुद को मजहबी (छोटी जाति पृष्ठभूमि वाले सिख) सिखों से अलग दिखाने लगे है ये सभी जातियां उनके जाट-क्षत्रीय होने का सूचक हैं। वीएना में हुई हिंसा की पंजाब में हुई प्रतिक्रिया बरसों से पनप रही इसी जातिवादी मानसिकता का विस्फोट है। जबकि गुरु नानक देव ने कहा था- 'एक पिता, एक के हम वारिस, मानस की जात सभै एक पहचानबो।'

💥 नानक नंहे होय रहो जैसे नहीं दूब 🍀।
👉 ऊग रूख सब सूख जाएगें के दूब 🍀 के खूब की खूब।
👉 साथियों भारत में जातिवाद को रोकने और पाखंड अंधविश्वास को खत्म करने के लिए गुरू नानक देव और संत रविदास जो एक ही समय 🕒 के पैदा हुए थे बहुत कोशिश किया परन्तु मनुस्मृति के वायरस जो लोगों के दिलों दिमाग में जातिवाद और पाखंड अंधविश्वास के रूप था नहीं निकाल पाये और गुरू नानक देव ने अपने अनुयायियों के साथ सिख धर्म की स्थापना की। और संत रविदास जी ने देखा कि मनुवादी व्यवस्था को बदलना आसान नहीं नहीं तो रबिदासिया संप्रदाय को चलाया।
👉 साथियों जातिवाद और पाखंड अंधविश्वास हमारे देश में कलंक है।

दुनिया के वो महान नास्तिक लोग जिन्होंने मानव सभ्यता के विकास को गति दी

■■ दुनिया के वो महान नास्तिक लोग जिन्होंने मानव सभ्यता के विकास को गति दी-■■

1 - चार्वाक का कहना था -"इश्वर एक रुग्ण विचार प्रणाली है , इससे मानवता का कोई कल्याण होने वाला नहीं है "

2- गौतम बुद्ध (563ईसा पूर्व - 483 ईसा पूर्व  )– बुद्ध कहते है की भगवान नाम की कोई चीज नही है! भगवान कि लिये अपना समय नष्ट मत करो ।
केवल सत्य ही सब कुछ है l अपना दीपक खुद बनो ।

3- अजित केशकम्बल ( 523 ई . पू )अजित केश्कंबल बुद्ध के समय कालीन विख्यात तीर्थंकर थे , त्रिपितिका में अजित के विचार कई जगह आये हैं , उनका कहना था -" दान, यज्ञ , हवन नहीं .. लोक परलोक नहीं "

4 - सुकरात ( 466-366 ई पू )"इश्वर केवल शोषण का नाम है "

5 - इब्न रोश्द ( 1126-1198 )इन6का जन्म स्पेन के मुस्लिम परिवार में हुआ था , रोश्द के दादा जामा मस्जिद के इमाम थे , इन्हें कुरआन कंठस्थ थी । इन्होने अल्लाह के अस्तित्व को नकार दिया था और इस्लाम को राजनैतिक गिरोह कहाथा । जिस कारण मुस्लिम धर्मगुरु इनकी जान के पीछे पड़ गए थे ।रोश्द ने दर्शन के बुद्धि प्रधान हथियार से इस्लाम के मजहबी वादशास्त्रियों की खूब खबर ली ।

6 - कॉपरनिकस ( 1473-1543)इन्होने धर्म गुरुओं की पूल खोल थी इसमें धर्मगुरु ये कह कर को मुर्ख बना रहे थे की सूर्य प्रथ्वी के चक्कर लगता है । कॉपरनिकस ने अपने पप्रयोग से ये सिद्ध कर दिया की प्रथ्वी सहित सौर मंडल के सभी ग्रह सूर्य के चक्कर लगाते हैं, जिस कारण धर्म गुरु इतने नाराज हुए की कोपरनिकस के सभी सार्थक वैज्ञानिको को कठोर दंड देना प्रारंभ कर दिया.

7 - मार्टिन लूथर ( 1483-1546)इन्होने जर्मनी में अन्धविश्वास, पाखंड और धर्गुरुओं के अत्याचारों के खिलाफ आन्दोलन किया इन्होने कहा था " व्रत , तीर्थयात्रा , जप , दान अदि सब निर्थक है "

8- सर फ्रेंसिस बेकन ( 1561-1626)अंग्रेजी के सारगर्भित निबंधो के लिए प्रसिद्ध, तेइस साल की उम्र में ही पार्लियामेंट के सदस्य बने , बाद में लार्ड चांसलर भी बने । उनका कहना था"नास्तिकता व्यक्ति को विचार . दर्शन , स्वभाविक निष्ठां , नियम पालन की और ले जाती है , ये सभीचीजे सतही नैतिक गुणों की पथ दर्शिका हो सकती हैं ।

9- बेंजामिन फ्रेंकलिन (1706-1790)इनका कहना था " सांसारिक प्रपंचो में मनुष्य धर्म से नहीं बल्कि इनके न होने से सुरक्षित है "

10- चार्ल्स डार्विन (1809-1882)इन्होने ईश्वरवाद और धार्मिक गुटों पर सर्वधिक चोट पहुचाई , इनका कहना था " मैं किसी ईश्वरवाद में विश्वास नहीं रखता और न ही आगमी जीवन के बारे में "

11 - कार्ल मार्क्स ( 1818-1883)कार्ल मार्क्स का कहना था " इश्वर का जन्म एक गहरी साजिश से हुआ है " और " धर्म एक अफीम है " उनकी नजर में धर्म विज्ञानं विरोधी , प्रगति विरोधी , प्रतिगामी , अनुपयोगी और अनर्थकारी है , इसका त्याग ही जनहित में है ।

12- पेरियार (1879-1973)इनका जन्म तमिलनाडु में हुआ और इन्होने जातिवाद , ईश्वरवाद , पाखंड , अन्धविश्वास पर जम के प्रहार किया l

13- अल्बर्ट आइन्स्टीन ( 1879-1955)विश्वविख्यात वैज्ञानिक का कहना था " व्यक्ति का नैतिक आचरण मुख्य रूप से सहानभूति , शिक्षा और सामाजिक बंधन पर निर्भर होना चाहिए , इसके लिए धार्मिक आधार की कोई आवश्यकता नहीं है . मृत्यु के बाद दंड का भय और पुरस्कार की आशा से नियंत्रित करने पर मनुष्य की हालत दयनीय हो जाती है"

14 कामरेड - भगत सिंह (1907-1931)प्रमुख स्वतन्त्रता सैनानी भगत सिंह ने अपनी पुस्तक " मैं नास्तिक क्यों हूँ?" में कहा है " मनुष्य ने जब अपनी कमियों और कमजोरियों पर विचार करते हुए अपनी सीमाओं का अहसास किया तो मनुष्य को तमाम कठिनाईयों का साहस पूर्ण सामना करने और तमाम खतरों के साथ +वीरतापूर्ण जुझने की प्रेरणा देने वाली तथा सुख दिनों में उच्छखल न हो जाये इसके लिए रोकने और नियंत्रित करने के लिए इश्वर की कल्पना की गयी है "

15- कामरेड लेनिन– लेनिन के अनुसार " जो लोग जीवन भर मेहनत मशक्कत करते है और आभाव में जीते हैं उन्हें धर्म इहलौकिक जीवन में विनम्रता और धैर्य रखने की तथा परलोक में सुख की आशा से सांत्वना प्राप्त करने की शिक्षा देता है , परन्तु जो लोग दुसरो के श्रम पर जीवित रहते हैं उन्हें इहजीवनमें दयालुता की शिक्षा देता है , इस प्रकार उन्हें शोषक के रूप में अपने सम्पूर्ण अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करने का एक सस्ता नुस्खा बता देता है"

16-रामस्वरूप वर्मा (संस्थापक- अर्जक संघ)-अर्जक समाज का शोषण करने के लिए ईश्वर, आत्मा, पुनर्जन्म, भाग्यवाद ,जाति-पाति छुआछूत आदि ब्राह्मणों ने बनाया है।

17- चौधरी महाराज सिंह भारती (प्रणेता-अर्जक संघ)-ब्राह्मणवाद शोषण का हथियार है।

18 -जगदेव प्रसाद (पूर्व मंत्री-बिहार सरकार)-ईश्वर, आत्मा आदि की कल्पना तमाम पिछङे, दलितों को बेवकूफ बनाकर ब्रहा्मणों ने अपना उल्लू सीधा करने के लिए बनाया है!

via - #Rattan_Lal_Gottra
फेसबुक प्रदीप नागदेव की वोलसे साभार

गुनाहों पर पर्दे का औजार है राष्ट्रवाद

गुनाहों पर पर्दे का औजार है राष्ट्रवाद



लीजिए भाई। अब राष्ट्रवाद भी बिकाऊ हो गया है। पहली बोली मुम्बई में लगी है। कीमत लगी है 5 करोड़ रुपये। यह एक फ़िल्म को रिलीज करने देने के एवज में लगी है। यह सौदा मुख्यमन्त्री देवेन्द्र फड़नवीस की मध्यस्थता में उनके घर पर हुआ है। इस बैठक में सूबे की मशीनरी को बंधक बनाने वाले राज ठाकरे भी शामिल थे। साथ ही फ़िल्म के निर्माता निर्देशक के साथ बिरादरी के दूसरे वरिष्ठ लोग मौजूद थे। इसमें तय हुआ कि फ़िल्म के निर्माता सेना के कल्याण कोष में 5 करोड़ रुपये जमा करेंगे। साथ ही ठाकरे ने इसकी भी घोषणा कर दी कि आइन्दा कोई 5 करोड़ रुपये देकर पाक कलाकारों को फ़िल्म में रख सकता है। यानी 5 करोड़ में दुश्मन दोस्त में बदल जाएगा। और राष्ट्रवाद की गरिमा भी अक्षुण हो जायेगी। पहली बात तो हमारी सेना और उसका कल्याण इस तरह के किसी सौदे और फिरौती के पैसे के मोहताज नहीं है। और यह खुद उसके सम्मान के साथ खिलवाड़ है । साथ ही एक ऐसे अंदरूनी राजनीतिक मामले में उसको ले आना देश के भविष्य और उसकी राजनीति के लिए बहुत घातक है।

इस मामले में केंद्र सरकार और खासकर गृहमंत्री राजनाथ सिंह की भूमिका भी संदिग्ध रही। फ़िल्म के निर्माता और निर्देशक ने राजनाथ से मुलाकात की थी। उसके बाद देवेन्द्र फडनवीश भी उनसे मिले थे। यानी सब कुछ उनके संज्ञान में हुआ। ऐसे में अगर केंद्र ने इस समस्या का यही समाधान निकाला तो यह बहुत अफसोसनाक है। यह बिल्कुल कानून और व्यवस्था का मामला था। और फ़िल्म को शांतिपूर्ण तरीके से पर्दे पर दिखाये जाने की जिम्मेदारी सरकार की थी। लेकिन अपना यह कर्तव्य निभाने में वह पूरी तरह से नाकाम रही है। उसने एमएनएस के गुंडों के सामने समर्पण किया है। कल एक दूसरा गुंडा अपराधी इसी तरह से किसी मामले में सामने आए तो उसके लिए यह एक नजीर होगा। और हालात जिस तरफ जा रहे हैं कल को यह राष्ट्रवाद अगर चुरमुरे के भाव बिके तो किसी को अचरज नहीं होना चाहिए।

बहरहाल कांधार कांड में आतंकियों के सामने घुटने टेकने वालों से इससे ज्यादा उम्मीद भी नहीं की जा सकती है। बस अंतर यही है कि तब इन लोगों ने समर्पण बाहरी अपराधियों और गुंडों के सामने किया था। इस बार देश के भीतर के गुंडों के सामने किया है।

राष्ट्रवाद भेड़ियों का नया खोल है। यह एक ऐसी गंगा हो गया है। जिसमें चोर, लुटेरे, गिरहकट्ट, भ्रष्ट, दलाल, अपराधी सब डुबकी लगाने के लिए बेताब हैं। यही वजह है कि राष्ट्रवाद का झंडा बुलंद करने में यह तबका सबसे आगे है। आमतौर पर देखा गया है। ज्यादातर लोग गंगा में डुबकी पाप से छुटकारा पाने के लिए लगाते हैं। और इस क्रिया में फल कहिए या फिर नफा नुकसान। उसका हिसाब मौत के बाद होता है। लेकिन राष्ट्रवाद इस मामले में बहुत आगे खड़ा है। इसका लाभ नगद है। कर्म कीजिए और तुरंत फल लीजिए। यह सब कुछ इंसान अपने सामने होते देखता है। यानी जिंदा रहते फायदे का भोग। अनायास नहीं इसमें डुबकी के लिए एक लंबी और न खत्म होने वाली कतार है। कोई दंगाई है। भारत माता की जय बोल दे। उसके सारे खून माफ। उससे बड़ा राष्ट्रवादी कोई नहीं। आप धनपति हों, भ्रष्टाचार में डूबे हों। तिरंगा लेकर कंधे पर दौड़ जाइये। मजाल क्या कि कोई अंगुली उठा दे।

माफिया और डान भी इसका फायदा लेने से नहीं चूके। छोटा राजन का नाम कोई भूला नहीं होगा। एक दूसरा उदाहरण भी है। पूर्वांचल का माफिया मुख्तार अंसारी माफिया है। और उसी इलाके का दूसरा माफिया ब्रिजेश सिंह राष्ट्रवादी। क्योंकि उसने भगवा चोला पहन लिया है। देश में राष्ट्रवाद की गंगा बहाने से पहले ही बीजेपी ने उसके फायदे बता दिए थे। जब उसने राष्ट्रवाद की गंगोत्री में एक तड़ीपार को बैठाया। यह राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा और सफल मॉडल था। उसके बाद तो एक-एक कर कतार लग गयी। इनके दौर में भारतीय राजनीति पाताल के किस लोक में जाएगी अंदाजा लगाना मुश्किल है। स्नूपिंग से लेकर एनकाउंटर और सेक्स स्कैंडल से लेकर ब्लैकमेलिंग हर तरह का हुनर इनके पास है। हर प्रयोग के ये महारथी हैं। गुजरात में यह सफल रहा है। अब केंद्र में इसको दोहराया जा रहा है। और इन सबके स्रोत चोटी पर बैठे शीर्ष पुरुष के बारे में क्या बताना। वो तो अब माया का रूप लेते जा रहे हैं। लेकिन सच यही है कि सब कुछ उन्हीं के संरक्षण और निर्देशन में हो रहा है। राष्ट्रवाद की गंगा में डुबकी से सिर्फ पाप नहीं धुलते बल्कि आप बिल्कुल पवित्र होकर निकलते हैं। यह उन्हीं ने सिखाया है। सैमुअल जानसन का यह कथन एक बार फिर जिंदा होता दिख रहा है कि राष्ट्रवाद अपराधियों की आखिरी शरणस्थली होता है।

अपने बच्चों को अपने महापुरुषों का सच्चा इतिहास बताओ

आखिर हम अब भी पीछे क्यों हैं..
क्योंकि हम अपने बच्चों को अब तक अपना इतिहास और महापुरुष बताने में समर्थ रहे...
(1) हम अपने बच्चों को यह नहीं बता पाये कि बेटा अगर महात्मा फुले ने शिक्षा की शुरुआत नहीं की होती तो मुझे पढ़ने-लिखने का अधिकार नही मिलता और तेरी मम्मी भी पढ़ी- लिखी नहीं होती और अगर तेरी माँ पढ़ी- लिखी नही होती तो बेटा तेरी परवरिश भी अच्छी नही हो पाती ।
(2)हम अपने बच्चों को यह नही समझा पाये की बेटा अगर छत्रपति शाहू जी महाराज ने 1902 में  आरक्षण की सुरुआत नहीं की होती और बाबा साहब ने 1950 में इसे लागु नहीं किया होता तो मुझे यानि तेरे बाप को कभी नौकरी नही मिली होती।
(3) हम अपने बच्चों को यह नहीं समझा पाये की बेटा अगर मेरी नौकरी नहीं होती तो न तू  सेंकी और चेंकु होता और न में रणविजय और रणधीर होता अगर बाबा न होते तो में किसी ठाकुर के घर का दुखीराम या दयाराम होता और तू हमारे घर का पलटू राम होता ।
( 4) बेटा अगर बाबा न होते तो  आज न तू CBSE ya PUBLIC CONVENT ka student hota aur बल्कि तू भी अपने बड़े पाप के 'राधेश्याम' के साथ मामा के स्कूल में हाथ में कटोरा लेकर खीर खा रहा होता।
(5)हम अपने बच्चों को अपने महापुरुषो का सच्चा इतिहास नहीं बता पाये और इस तरह हमने एक अज्ञानी पीढ़ी तैयार कर दी जो 'जय भीम', 'जय रविदास', 'जय शिवराय' या इन सबकी एक साथ जय करने के लिए "जय मूलनिवासी" बोलने की बजाय अपने दुश्मनो का दिया हुआ खाकी नेकर पहन कर शाखा में जाता है और 6 दिसम्बर बाबा साहब की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि देने की जगह शौर्य दिवस की बधाई देने लग गया! बाबा साहब ने कहा था "जो कौम अपना इतिहास नहीं जानती बो अपना इतिहास कभी नहीं बना सकती।"
बाबा साहब के गुरु तथागत बुद्ध,संत कबीर और राष्ट्रपिता जोतिबाराव फुले थे।बाबा साहब ने  स्वयं कहा है कि यदि जोतिबा न होते तो मैं भी न होता।इसीलिए हमारे लिए सभी महापुरुष बहुत मायने रखते हैं।अपने राज्य में 50% आरक्षण की व्यवस्था सबसे पहले लागू करने वाले छत्रपति राजर्षि शाहू महाराज को क्या आप भूल सकते हैं!!!!????नहीं न!!!
 इसलिये मेरा आपसे निवेदन है कि अपने बच्चों को अपने महापुरुषों का सच्चा
इतिहास बताओ और आने बाली पीढ़ी को ज्ञानवान बनाओ!