Friday, April 29, 2016

रोहित से कन्हैया तक, और नरेंद मोदी की बदनामी तक

आज मुझे छह वर्षों से अधिक हो गए हैं डॉ. भीमराव अम्बेडकर के विचारों का प्रचार प्रसार करते हुए और बहुजन राजनीती या कहें कि मूवमेंट से जुड़े हुए। इन वर्षों में मैंने बहुत से अम्बेडकरवादियों को देखा। भारत से ले कर विदेशों तक के। परन्तु कन्हैया नाम के किसी अम्बेडकरवादी छात्र को न ही तो असल में या इंटरनेट पर ही देखा। जे एन यू में भी अम्बेडकरवादी मित्र रहे, वहां की दलित, आदिवासी और ओबीसी छात्र संस्थान बा प सा के मित्रों से भी मुलाकात की।  इनमें से बहुतों से फोन या नेट पर भी बात की पर कन्हैया कहीं नज़र नहीं आया। 

कम-से-कम बहुत से ऐसे अम्बेडकरवादियों को तो जानता हूँ कि जिन्होंने इंटरनेट पर और असल ज़िन्दगी में डॉ अम्बेडकर के विचारों का प्रचार प्रसार करने में दिन रात लगा दिए। ऐसे कई अनगिनत नाम हैं जिनका हिन्दू मीडिया में जिक्र तक नहीं होता। ऐसे ही अनगिनत लोग बहुजन समाज पार्टी, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया आदि के हैं। बहुत से सरकारी कर्मचारी भी डॉ अम्बेडकर के विचारों के प्रचार प्रसार और पिछड़े वर्गों को न्याय दिलाने के कार्यक्रमों में लगे हैं परन्तु इन सभी में मुझे कोई कन्हैया नज़र नहीं आया। 

रोहित वेमुला के साथ जो हुआ उस बात का कन्हैया से क्या सम्बन्ध (लिंक) था ? जे एन यू का मुद्दा उछला था कश्मीरियों द्वारा भारत विरोधी नारों के साथ।  उस सब में जब कन्हैया का नाम आया तो वह जय भीम, जय भीम चिल्लाने लगा। मीडिया ने उसे क्रन्तिकारी भगत सिंह से ले कर अम्बेडकरवादी तक बना दिया और तो और उसे दलित राजनीती से भी जोड़ दिया। कन्हैया की जात क्या है यह किसी ने बताई नहीं। मैंने सुना कि वह भूमिहार ब्राह्मण है, वही बिहार के भूमिहार ब्राह्मण जो वर्षों से दलितों का कत्लेआम करते आए हैं। कन्हैया गरीब है, किसान का पुत्र  है, जैसी बातों से उसके प्रति संवेदना जगाई गई। जब पुलिस केस बना तो वही कन्हैया उसी कांग्रेस की गोद में चला गया जिस कांग्रेस के राज में कई दलित छात्र खुदखुशी कर चुके थे और तब कांग्रेस के भावी महाराज राहुल गांधी के मुंह से उफ्फ तक नहीं निकली थी।

इस सब प्रकरण में दलित भी कन्हैया के जय भीम और रोहित वेमुला को शहीद बनाने में लग गए। मुझे रोहित की मौत पर दुःख है, पर मैं पूछता हूँ कि वह अम्बेडकरवादी जो वर्षों से दिन रात डॉ अम्बेडकर के सपनों को साकार करने में लगे हैं, क्या उनके कार्य रोहित के कार्यों से कम हैं। ऐसे अम्बेडकरवादी जो नौकरी भी करते हैं और बाबा साहेब के काम भी करते हैं, क्या उनका सहयोग कम है? क्या आज भी ऐसे लाखों दलित बच्चे नहीं हैं जो स्कूल तक नहीं देख पाते, तो उनके जीवन को सुधारने के लिए मरना जरुरी है या और सुधारवादी कार्यों को करना ?

मैं अपने अनुभव से कह सकता हूँ कि रोहित की मौत पर जम कर राजनीती हुई है और हो रही है। किसी को अपनी राजनैतिक पार्टी को उठाना है, किसी को संगठन को चमकाना है , किसी को रोहित ने नाम पर कार्यक्रम करके चन्दा एकत्र करना है और किसी को रोहित का नाम ले कर खुद को पुलिस से बचाना है। 

इस सब में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को भी बहुत अपमानित और बदनाम किया गया। पर मैं पूछता हूँ कि आज तक कोई प्रधान मंत्री, और वह भी इतने बड़े बहुमत से निर्वाचित, एक शक्तिशाली प्रधान मंत्री हुआ है जिसने बाबा साहेब  डॉ. अम्बेडकर और भगवान् बुद्ध का इतना प्रचार किया हो? जिन नरेंद्र मोदी को उनके शत्रु हिन्दुओं के एक क्रूर शासक के रूप में स्थापित करना चाहते थे उन्ही नरेंद्र ने विश्व में भगवान् बुद्ध का नाम ले कर विश्व से यह आव्हान किया, विश्व को एक सन्देश दिया, कि भारत भगवान् बुद्ध का देश है। नरेंद्र मोदी के इस साहसी कदम को देखते हुए ब्राह्मणवाद इतना बौखलाया कि शंकराचार्य तक उनके विरोध में आ गए। चाहे अमेरिका की संसद में बाबा साहेब के योगदान को याद दिलाने की बात हो, अथवा संसद में संविधान दिवस मनाने की शुरुआत करने की, नरेंद्र मोदी ने हर वह कार्य किया है जिससे बाबा साहेब की गरिमा और भगवान् बुद्ध की ख्याति में वृद्धि ही हुई है। ऐसे में कन्हैया जैसा एक व्यक्ति जो खुद को अम्बेडकरवादी बताए और फिर राहुल गांधी की गोद में बैठ कर नरेंद्र मोदी को बदनाम करे, इससे यही नज़र आता है कि डॉ अम्बेडकर का नाम सिर्फ उन्हीं नरेंद्र को बदनाम करने के लिए लिया जा रहा है जिन्होंने एक प्रधानमंत्री के रूप में डॉ अम्बेडकर और भगवान् बुद्ध की ख्याति के लिए वह कार्य किए जो किसी प्रधानमन्त्री ने नहीं किए। 

मेरा यह लेख लिखने का मकसद है कि मैं अम्बेडकरवादियों को और समस्त भारतवासियों को यह बताऊँ कि जय भीम करनेवाला कन्हैया कितना अम्बेडकरवादी है, इस पर गौर करे और अम्बेडकरवादियों को जे एन यू की घटना से न जोडें। आज देश में लोग समझ रहे हैं कि कन्हैया दलित (अनुसूचित जाती का) है। लोग अम्बेडकरवादियों को कन्हैया से जोड़ रहे हैं। पर मैं यह स्पष्ट कर दूँ, और मैं जानता हूँ अम्बेडकरवादियों को, कि वह कश्मीर के विभाजन के पक्षधर नहीं हैं और न ही कन्हैया को उनसे कोई लेनादेना है। जहां तक अम्बेडकरवादियों और बौद्धों की बात है तो वह जानते हैं कि किस प्रकार इस्लाम का नाम लेकर मलेशिया से ले कर ताज़िकिस्तान तक बौद्धों का क़त्ल किया गया और एक बड़ा क्षेत्र इस्लाम के घेरे में आ गया।

मेरी किसी कन्हैया से कोई दुश्मनी नहीं है। वह कुछ भी करने के लिए स्वतन्त्र है, पर जय भीम कहना है तो डॉ. अम्बेडकर के विचारों पर काम करे। आलोचना करे उस कांग्रेस की जिसके राज में कई दलित छात्रों ने खुदखुशी की। आलोचना करे इस्लाम के नाम पर आतंकवादी संगठनों को चलाने वालों की और कश्मीरी अलगाववादियों की। आलोचना करे नितीश की, जिसके राज में दलितों पर अत्याचार हो रहे हैं। और अम्बेडकरवादियों की तरह वर्षों दिन रात काम करे। ध्यान रहे कि असली अम्बेडकरवादी चुपचाप अपने कार्य करते हैं और यदि आज भारत सरकार और अन्य कई सरकारों ने डॉ अम्बेडकर की 125 वीं जयन्ती इतनी धूमधाम से मनाई है तो यह उन अनगिनत अम्बेडकरवादियों के दिन रात के कार्यों की वजह से ही है जो चुपचाप अपना कार्य करते हैं। और अंततः मैं यह बात दावे के साथ कह सकता हूँ, कि यदि कन्हैया दलित होता तो उसे हिन्दू मीडिया द्वारा इतनी पब्लिसिटी नहीं मिलती जितनी कि मिली है। उसे पब्लिसिटी देने का मकसद अम्बेडकरवादियों को बदनाम करना, बहुजन राजनीती में विभाजन, नरेंद्र मोदी को बदनाम करना और दलितों को एक ऐसे नए नेता की तरफ आकर्षित करना मानो कि वह कोई अवतार हो जैसे अरविन्द केजरीवाल को एक अवतार, एक आइडियल बना दिया गया। मेरा यह लेख लिखने का उद्देश्य नरेंद्र मोदी अथवा बी जे पी का राजनैतिक पक्ष लेना भी नहीं है, क्योंकि मैं वैचारिक तौर पर बहुजन समाज पार्टी का समर्थक हूँ और मायावती जी को ही भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखता हूँ। 

- जय भीम, निखिल सबलानिया, दिल्ली 




Wednesday, February 24, 2016

बाबा साहब डाँ. अम्बेडकर का ऐतिहासिक भाषण आगरा, 18 मार्च 1956

समाज के जिम्मेदार लोगों से बाबा साहब की एक अपील

बाबा साहब डाँ. अम्बेडकर का ऐतिहासिक भाषण 
आगरा, 18 मार्च 1956 

जन समूह से -

पिछले तीस वर्षों से तुम लोगों को राजनैतिक अधिकार के लिये मै संघर्ष कर रहा हूँ। मैने तुम्हें संसद और राज्यों की विधान सभाओं में सीटों का आरक्षण दिलवाया। मैंने तुम्हारे बच्चों की शिक्षा के लिये उचित प्रावधान करवाये। आज, हम प्रगित कर सकते है। अब यह तुम्हारा कर्त्तव्य है कि शैक्षणिक, आथिर्क और सामाजिक गैर बराबरी को दूर करने हेतु एक जुट होकर इस संघर्ष को जारी रखें। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये तुम्हें हर प्रकार की कुर्बानियों के लिये तैयार रहना होगा, यहाँ तक कि खून बहाने के लिये भी।

नेताओ से-

यदि कोई तुम्हें अपने महल में बुलाता है तो स्वेच्छा से जाओ। लेकिन अपनी झौपड़ी में आग लगाकर नहीं। यदि वह राजा किसी दिन आपसे झगड़ता है और आपको अपने महल से बाहर धकेल देता है, उस समय तुम कहां जाओगे? यदि तुम अपने आपको बेचना चाहते हो तो बेचो, लेकिन किसी भी हालत में अपने संगठन को बर्वाद होने की कीमत पर नहीं। मुझे दूसरों से कोई खतरा नहीं है, लेकिन मै अपने लोगों से ही खतरा महसूस कर रहा हूँ।

भूमिहीन मजदूरों से -

मै गाँव में रहने वाले भूमिहीन मजदूरों के लिये काफी चिंतित हूँ। मै उनके लिये ज्यादा कुछ नहीं कर पाया हूँ। मै उनकी दुख तकलीफों को नजरन्दाज नहीं कर पा रहा हूँ। उनकी तबाहियों का मुख्य कारण उनका भूमिहीन होना है। इसलिए वे अत्याचार और अपमान के शिकार होते रहते हैं और वे अपना उत्थान नहीं कर पाते। मै इसके लिये संघर्ष करूंगा। यदि सरकार इस कार्य में कोई बाधा उत्पन्न करती है तो मै इन लोगों का नेतृत्व करूंगा और इनकी वैधानिक लड़ाई लडूँगा। लेकिन किसी भी हालात में भूमिहीन लोगों को जमीन दिलवाले का प्रयास करूंगा।

अपने समर्थकों से-

बहुत जल्दी ही मै तथागत बुद्ध के धर्म को अंगीकार कर लूंगा। यह प्रगतिवादी धर्म है। यह समानता, स्वतंत्रता एवं वंधुत्व पर आधारित है। मै इस धर्म को बहुत सालों के प्रयासों के बाद खोज पाया हूँ। अब मै जल्दी ही बुद्धिस्ट बन जाऊंगा। तब एक अछूत के रूप में मै आपके बीच नहीं रह पाऊँगा, लेकिन एक सच्चे बुद्धिस्ट के रूप में तुम लोगों के कल्याण के लिये संघर्ष जारी रखूंगा। मै तुम्हें अपने साथ बुद्धिस्ट बनने के लिये नहीं कहूंगा, क्योंकि मै आपको अंधभक्त नहीं बनाना चाहता परुन्त जिन्हें इस महान धर्म की शरण में आने की तमत्रा है वे बौद्ध धर्म अंगीकार कर सकते है, जिससे वे इस धर्म में द्रण विशवास के साथ रहें और बौद्धाचरण का अनुसरण करें।

बौद्ध भिक्षुओं से-

बौद्ध धम्म महान धर्म है। इस धर्म संस्थापक तथागत बुद्ध ने इस धर्म का प्रसार किया और अपनी अच्छाईयों के कारण यह धर्म भारत में दूर-दूर तक गली-कूचों में पहुंच सका। लेकिन महान उत्कर्ष पर पहुंचने के बाद यह धर्म 1213 ई. में भारत से विलुप्त हो गया जिसके कई कारण हो सकते हैं। एक प्रमुख कारण यह भी है की बौद्ध भिक्षु विलासतापूर्ण एवं आरामतलब जिदंगी जीने के आदी हो गय थे। धर्म प्रचार हेतु स्थान-स्थान पर जाने की बजाय उन्होंने विहारों में आराम करना शुरू कर दिया तथा रजबाड़ो की प्रशंसा में पुस्तकें लिखना शुरू कर दिया। अब इस धर्म की पुनरस्थापना हेतु उन्हें कड़ी मेहनत करनी पडेगी। उन्हें दरवाजे-दरवाजे जाना पडेगा। मुझे समाज में एसे बहुत कम भिक्षु दिखाई देते हैं, इसलिये जन साधारण में से अच्छे लोगों को भी इस धर्म प्रसार हेतु आगे आना चाहिये और इनके संस्कारों को ग्रहण करना चाहिये।

शासकीय कर्मचारियों से -

हमारे समाज की शिक्षा में कुछ प्रगति हुई है। शिक्षा प्राप्त करके कुछ लोग उच्च पदों पर पहूँच गये हैं परन्तु इन पढ़े लिखे लोगों ने मुझे धोखा दिया है। मै आशा कर रहा था कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे समाज की सेवा करेंगे, किन्तु मै देख रहा हूँ कि छोटे और बडे क्लर्कों की एक भीड़ एकत्रित हो गई है, जो अपनी तौदें (पेट) भरने में व्यस्त हैं। मेरा आग्रह है कि जो लोग शासकीय सेवाओं में नियोजित हैं, उनका कर्तव्य है कि वे अपने वेतन का 20वां भाग (5%) स्वेच्छा से समाज सेवा के कार्य हेतु दें। तभी समग्र समाज प्रगति कर सकेगा अन्यथा केवल चन्द लोगों का ही सुधार होता रहेगा। कोई बालक जब गांव में शिक्षा प्राप्त करने जाता है तो संपूर्ण समाज की आशायें उस पर टिक जाती हैं। एक शिक्षित सामाजिक कार्यकर्ता  समाज के लिये वरदान साबित हो सकता है।

छात्रों एवं युवाओं से-

मेरी छात्रों से अपील है की शिक्षा प्राप्त करने के बाद किसी प्रकार कि क्लर्की करने के बजाय उसे अपने गांव की अथवा आस-पास के लोगों की सेवा करना चाहिये। जिससे अज्ञानता से उत्पत्र शोषण एवं अन्याय को रोका जा सके। आपका उत्थान समाज के उत्थान में ही निहित है।

"आज मेरी स्थिति एक बड़े खंभे की तरह है, जो विशाल टेंटों को संभाल रही है। मै उस समय के लिये चिंतित हूँ कि जब यह खंभा अपनी जगह पर नहीं रहेगा। मेरा स्वास्थ ठीक नहीं रहता है। मै नहीं जानता, कि मै कब आप लोगों के बीच से चला जाऊँ। मै किसी एक ऐसे नवयुवक को नहीं ढूंढ पा रहा हूँ, जो इन करोड़ों असहाय और निराश लोगों के हितों की रक्षा करने की जिम्मेदारी ले सके। यदि कोई नौजवान इस जिम्मेदारी को लेने के लिये आगे आता है, तो मै चैन से मर सकूंगा।"

(संदर्भ- सलेक्टेड आफँ डाँ अम्बेडकर - लेखक डी.सी. अहीर पृष्ठ क्रमांक 110 से 11 तक के भाषण का हिन्दी अनुवाद) 

बुद्धिजीवी साथियों से विनम्र निवेदन है कि इस ऐतिहासिक भाषण की प्रतियाँ छपवाकर समाज में वितरित करें, यह एक सामाजिक जागृति का महान दयित्व है।
(समाज हित में जारी)

☝मंजिल वही सोच नयि🙏

गुरू रैदास की हत्या

आम मान्यता के अनुसार, 
गुरू रैदास 100 वर्षो से भी ज्यादा समय तक जीवित रहे, 
अतः प्रश्न यह उठता है कि उन्होने सम्पूर्ण जीवनकाल में क्या मात्र 41 पद ही रच पायें । यह बात पूर्णत अविश्वसनीय लगता है कि, ऐसा माना जाता है कि गुरू नानक जब गुरू रैदास से मिले तब वे 41 पद को उनकी हत्या से पूर्व ही अपने साथ ले गये जिसका संकलन लगभग 150 वर्षो बाद '' गुरू ग्रन्थ साहिबा '' मे किया गया ।
प्रश्‍न यह उठता है कि शेष बाणियाँ कहा गई । माननीय चन्द्रिका प्रसाद का मानना है की गुरू रैदास की हत्या करके उनकी चिता मे उनकी समस्त बाणीया उनके शरीर के साथ आग की भेंट चढा दी गई । अगर उनकी हत्या नही की गई होती तो उनकी बाणीया अवश्य मिलती ।
प्रश्‍न यह भी है की यह नीच काम किसने किया, सीधा सा उत्तर है ऐसा काम उन्ही लोगों ने किया जिन्होंने उनके शरीर से ''जनेऊ'' निकाले थे । यह ब्राह्मणो व सामंतो ने बड़ी चतुराई से मिलकर एक षडयन्त्र के तहत जनेऊ दिखाने के बहाने उनके शरीर को राणा विक्रम सिंह चितोड़गढ़ के भरे दरबार मे गुरू रैदास का सीना चीर कर उनकी जीवन लीला समाप्त कर दी और उनके पार्थिव शरीर को मेघवालों कि बस्ती मे भिजवा दिया गया, और यह कहलवा कर कि तुम्हारे गुरू ने भीतर का जनेऊ दिखाकर सभी को चकित कर दिया और स्वेच्छा से शरीर छोड़ दिया है ।
Jaago Bahujan Jaago

Monday, February 8, 2016

अर्थव्यवस्था पर भारी आस्था

सभी से नम्र निवेदन, थोडा ध्यान से पढ़े और समझने की कोशिश करें।

  नदी में भी पैसे नहीं डालने चाहिए ।
 इसी लिए लिखा गया ।

"अर्थव्यवस्था पर भारी आस्था" एक लेख !

हमारे देश में रोज न जाने कितनी रेलगाडियां न जाने कितनी नदियों को पार करती हैं और उनके यात्रियों द्वारा हर रोज नदियों में सिक्के फेकने का चलन । अगर रोज के सिक्को के हिसाब से गढ़ना की जाये तो ये रकम कम से कम दहाई के चार अंको को तो पार करती होगी । सोचो अगर इस तरह हर रोज भारतीय मुद्रा ऐसे फेक दी जाती इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को कितना नुकसान पहुँचता होगा ? ये तो एक अर्थशास्त्री ही बता सकता । लेकिन एक रसायनज्ञ होने के नाते ये जरूर लोगों को सिक्के की धातु के बारे में जागरूक कर सकता हूँ । वर्तमान सिक्के 83% लोहा और 17 % क्रोमियम के बने होते है । आप सबको ये बता हूँ कि क्रोमियम एक भारी जहरीली धातु है । क्रोमियम दो अवस्था में पाया जाता है, एक Cr (III) और दूसरी Cr (IV) । पहली अवस्था जहरीली नही मानी गई बल्कि क्रोमियम (IV) की दूसरी अवस्था 0.05% प्रति लीटर से ज्यादा हमारे लिए जहरीली है । जो सीधे कैंसर जैसी असाध्य बीमारी को जन्म देती है । सोचो एक नदी जो अपने आप में बहुमूल्य खजाना छुपाये हुए है और हमारे एक दो रूपये से कैसे उसका भला हो सकता है ? सिक्के फेकने का चलन तांबे के सिक्के से है । एक समय मुगलकालीन समय में दूषित पानी से बीमारियां फैली थी । तो ,राजा ने प्रजा के लिए ऐलान करवाया कि हर व्यक्ति को अपने आसपास के जल के स्रोत या जलाशयों में तांबे के सिक्के को फेकना अनिवार्य कर दिया । क्योंकि तांबा जल को शुद्ध करने वाली सबसे अच्छी धातु है । आजकल सिक्के नदी में फेकने से उसके ऊपर किसी तरह का उपकार नही बल्कि जल प्रदूषण और बीमारियों को बढ़ावा दे रहे है । इसव्लिए आस्था के नाम पर भारतीय मुद्रा को हो रहे नुकसान को रोकने की जिम्मेदारी हम सब नागरिकों की है ।
अपने नजदीकी और परिचितों को सिक्के के बदले ताम्बे के टुकड़े ,नदी या जलस्रोत में डालने को कहे।

 देशहित में सहयोग करे।जय भारत।

कृपया पुन: आपसे निवेदन कि इसे आप अपने मित्रों, बच्चो' तथा अशिक्षित ब्यक्तियों को विशेष रूप समझाये ताकि अज्ञानता में गलती न हो ।

बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर के अंग्रेजी और मराठी में लिखे मूल संकलन के कॉपीराइट्स प्रकाश आंबेडकर के पास हैं


बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर की 125वीं जयंती के मौके पर होने वाले आयोजनों में उनके मूल लेखन कार्यों के संकलन का प्रकाशन करने की केंद्र सरकार की योजना कॉपीराइट के झमेले में फंस गई है। केंद्र सरकार बाबा साहेब के अंग्रेजी वाले लेखन के संकलन की प्रिंटिंग के लिए 14 अप्रैल की डेडलाइन पूरी करने में जुटी हुई है, लेकिन उनके पौत्र प्रकाश आंबेडकर ने प्रकाशन की इजाजत देने से मना कर दिया है। इसी दिन आंबेडकर जयंती के मौके पर होने वाले आयोजनों का समापन होना है।

बाबासाहेब के अंग्रेजी और मराठी में लिखे मूल संकलन के कॉपीराइट्स प्रकाश आंबेडकर के पास हैं। महाराष्ट्र सरकार के साथ कॉपीराइट विवाद बरसों से चल रहा है। राज्य सरकार ने डॉक्टर आंबेडकर के संकलित लेखन कार्यों के प्रकाशन के लिए प्रकाश के साथ करार किया था, जो 1990 के दशक में खत्म हो गया। तब से महाराष्ट्र सरकार प्रकाश आंबेडकर के साथ मतभेद सुलझाने की कोशिश में लगी रही और सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के तहत आंबेडकर फाउंडेशन को 2013 में उनके संकलन की कॉपी के दोबारा प्रकाशन की इजाजत दे दी।

हालांकि केंद्र को महाराष्ट्र सरकार से इजाजत मिलने पर डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर सोर्स मटीरियल पब्लिकेशन कमिटी ने आपत्ति की तो 2014 में प्रकाशन रोक दिया गया, लेकिन उससे पहले फाउंडेशन लगभग एक हजार कॉपी छाप चुका था। उसके बाद से सेंटर को आंबेडकर के लेखन कार्यों का प्रकाशन करने की इजाजत नहीं है। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने जयंती के मौके पर होने वाले आयोजनों के तहत ट्रांसलेशन और प्रिंटिंग की पहल की है। मिनिस्ट्री इस मामले में महाराष्ट्र सरकार को कम से कम 12 लेटर लिख चुकी है।

प्रकाश आंबेडकर ने कहा, 'कॉपीराइट मेरे पास है, इसलिए उसे देने का फैसला मैं ही करूंगा। मैंने फिलहाल कॉपीराइट किसी को नहीं दिया है।' प्रकाश ने BJP और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मंशा पर संदेह जताते हुए कहा कि सरकार आंबेडकर विरोध का काम कर रही है। उन्होंने कहा वह उन पुरानी बातों को नहीं भूल सकते, जब आंबेडकरवादियों को BJP और RSS के खिलाफ खड़ा दिखाया गया था। जब शंकरराव चव्हाण के समय आंबेडकर के संपूर्ण लेखन कार्यों का प्रकाश हो रहा था, तब वे हमारे खिलाफ थे। हम उसे नहीं भूलेंगे। BJP और RSS हमारे खिलाफ थे।'

RTI के जरिए हासिल किए गए दस्तावेजों से पता चलता है कि कैसे केंद्र आंबेडकर के संपूर्ण संकलन के प्रकाशन के लिए सितंबर 2014 से महाराष्ट्र सरकार से बार-बार इजाजत मांग रहा है। गौरतलब है कि बाबासाहेब के संकलित कार्यों का कॉपीराइट जनवरी 2017 में खत्म हो रहा है।   http://m.navbharattimes.indiatimes.com/india/125th-birth-anniversary-celebrations-ambedkar-works-reprint-runs-into-copyright-trouble/articleshow/50843983.cms?utm_source=facebook.com&utm_medium=referral&utm_campaign=Copyright040216   प्रकाश सर निर्णय बहुत सटीक हे वो इन लोगों का बारिकी से समझते हें 🙏🌷 जय भीम

वे कौन हैं जो मुस्लिम महिलाओं को लूट व अंधविश्वास के केंद्र- मजार और दरगाह में प्रवेश की लड़ाई को सशक्तिकरण का नाम दे रहे हैं?



वे कौन हैं जो मुस्लिम महिलाओं को लूट व अंधविश्वास के केंद्र- मजार और दरगाह में प्रवेश की लड़ाई को सशक्तिकरण का नाम दे रहे हैं?

सवाल पैदा होता है कि असल समस्याओं से जूझती मुस्लिम महिलाओं को इस नकली समस्या में क्यों घसीटा जा रहा है? वो कौन लोग हैं जिन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, तीन-तलाक, भगोड़े पति, पति की दूसरी शादी से उत्पन्न अभाव, परिवार नियोजन का अभाव, जात-पात, दहेज, दंगों में सामूहिक बलात्कार जैसी भयानक समस्याओं के निराकरण के बजाए हाजी अली दरगाह के गर्भ-गृह में दाखिले को मुस्लिम महिलाओं का राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की सूझी है?



शीबा असलम फ़हमी

February 4, 2016

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Photograph: Andreas Werth/Alamy

भारत की मुस्लिम बेटियां समाज का सबसे अशिक्षित वर्ग हैं, सम्मानित रोजगार में उनकी तादाद सबसे कम है, अपने ही समाज में दहेज के कारण ठुकराई जा रही हैं, गरीबी-बेरोजगारी और असंगठित क्षेत्र की शोषणकारी व्यवस्था की मजदूरी में पिस रही हैं. मुजफ्फरनगर, अहमदाबाद और सूरत दंगों में सामूहिक बलात्कार की शिकार महिलाएं सामाजिक पुनर्वास की बाट जोह रही हैं. तीन तलाक की तलवार उनकी गर्दन पर लटकती रहती है, कश्मीर की एक लाख से ज्यादा बेटियां 'हाफ-विडो' यानी अर्द्ध-विधवा होकर जिंदा लाश बना दी गई हैं. जब पड़ोस में तालिबान अपनी नाफरमान बेटी-बीवी को बीच चौराहे गोली से उड़ा रहा हो, जब आईएसआईएस यौन-गुलामी की पुनर्स्थापना इस्लाम के नाम पर कर रहा हो- ऐसे में वे कौन लोग हैं जो मुस्लिम महिलाओं को पंडावादी लूट, अराजकता, गंदगी और अंधविश्वास के केंद्र- मजार और दरगाह के 'गर्भ-गृह' में प्रवेश की लड़ाई को सशक्तिकरण और नारीवाद का नाम देकर असली लड़ाइयों से ध्यान हटा रहे हैं? 

भारतीय मुस्लिम समाज में अकीदे यानी आस्था के नाम पर चल रहे गोरखधंधे का सबसे विद्रुप, शोषणकारी रूप हैं दरगाहें, जहां परेशानहाल, गरीब, बीमार, कर्ज में दबे हुए, डरे हुए लाचार मन्नत मांगने आते हैं और अपना पेट काटकर धन चढ़ाते हैं ताकि उनकी मुराद पूरी हो सके. तीसरी दुनिया के देशों में जहां भ्रष्ट सरकारें स्वास्थ्य, शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सामाजिक सुरक्षा जैसे अपने बुनियादी फर्ज पूरा करने में आपराधिक तौर पर नाकाम रही हैं वहीं परेशान हाल अवाम भाग्यवादी, अंधविश्वासी होकर जादू-टोना-झाड़-फूंक, मन्नतवादी होकर पंडों, ओझा, जादूगर, बाबा-स्वामी, और मजारों के सज्जादानशीं-गद्दीनशीं-खादिम के चक्करों में पड़कर शोषण का शिकार होती है. ऐसे में मनौती का केंद्र ये मजारें और दरगाह के खादिम और सज्जादानशीं मुंहमांगी रकम ऐंठते हैं. अगर कोई श्रद्धालु प्रतिवाद करे तो घेरकर दबाव बनाते हैं, जबरदस्ती करते हैं, वरना बेइज्जत करके चढ़ावा वापस कर देते हैं. जियारत कराने, चादर चढ़ाने और तबर्रुख (प्रसाद) दिलाने की व्यवस्था करवाने वाले को खादिम कहते हैं, जिसका एक रेट या मानदेय होता है. अजमेर जैसी नामी-गिरामी दरगाह में खादिमों के अलग-अलग दर्जे भी हैं, यानी अगर आप उस खादिम की सेवा लेते हैं जो कैटरीना कैफ, सलमान खान जैसे ग्लैमरस सितारों की जियारत करवाते हैं तो आपको मोटी रकम देनी होगी. 

अजमेर दरगाह के आंगन में दर्जनों गद्दीनशीं अपना-अपना 'तकिया' सजाए बैठे हैं जिन पर नाम और पीर के सिलसिले की छोटी-छोटी तख्ती भी लगी हैं. यहां पीर लोग अपने मुरीद बनाते हैं. पीरी-मुरीदी यूं तो गुरु द्वारा सूफीवाद में दीक्षित करना होता है लेकिन असल में ये एक तरह की अंधभक्ति है जिसमे पीर अपने मुरीद का किसी भी तरह का दोहन-शोषण करता है. मुरीद जिस भी शहर या गांव का है वो वहां अपने प्रभाव-क्षेत्र में अपने पीर को स्थापित करने में लग जाता है. उनके लिए चंदा जमा करता है, उनके पधारने पर आलिशान दावतें करता है, तोहफे देता है, खर्च उठाता है.  

मुरीदों की संख्या ही पीर की शान और रुतबा तय करती है. पीर पर मुरीदों द्वारा धन-दौलत लुटाने की तमाम कहानियां किवदंती बन चुकी हैं. जिस पीर के जितने धनी मुरीद उसकी साख और लाइफस्टाइल उतनी ही शानदार. दिल्ली की निजामुद्दीन दरगाह के सज्जादानशीं ख़्वाजा हसन सानी निजामी (उनसे पारिवारिक संबंध रहे हैं) ने यूं ही फरमाया था, 'अगर मैं बता दूं कि मेरे मुरीद कितना रुपया भेजते हैं तो आंखें चुधिया जाएंगी.' मुरीद हाथ का बोसा लेते हैं और हर बोसे पर हथेली में नोटों की तह दबा देते हैं. कहते हैं की ख्वाजा हसन सानी निजामी के पिता अपने शुरुआती दिनों में दरगाह के बाहर सड़क पर कपड़ा बिछाकर मामूली किताबें बेचा करते थे. फिर उन्हें दरगाह के अंदर की व्यवस्था में दाखिला मिल गया, और वो सज्जादानशीं बन गए, कहा जाता है कि जब वे मरे तो 30 से ज्यादा जायदादों की रजिस्ट्री छोड़ गए और निजामुद्दीन औलिया के साथ-साथ उनके भी सालाना दो-दो उर्स होने लगे, जिनमें उनके मुरीद चढ़ावा चढ़ाते हैं. ये सिर्फ एक सज्जादानशीन की मिसाल है. हर दरगाह में दर्जनों सज्जादानशीन होते हैं. आपस में चढ़ावा बांटने के लिए उनके दिन तय होते हैं. ये 'कमाई' सीधे उनकी जेब में जाती है. ये इतना लाभकारी धंधा है कि इसके लिए कत्ल भी हो जाते हैं.

21वीं सदी की दूसरी दहाई में जब मर्दों को भी दरगाहों से बचाना था, ताकि वो भी इस अंधविश्वास, शोषण और अराजकता से बच सकें, तब महिलाओं को शोषण में लपेटने का एजेंडा नारीवाद कैसे हुआ? मर्दों से बराबरी के नाम पर समाज में गैरवैज्ञानिकता, अंधविश्वास और शोषण को विस्तार देना नारी-सशक्तिकरण कैसे हुआ?

मुंबई की हाजी अली दरगाह एक फिल्मी दरगाह है जिसकी ख्याति अमिताभ बच्चन की फिल्म कुली से और भी बढ़ गई थी, यहां फिल्मों की शूटिंग आम बात है. पिछले कुछ सालों से वहां के मुतवल्ली (कर्ता-धर्ता) और सज्जादनशीनों ने महिलाओं को कब्र वाले हुजरे में न आने देने का फैसला किया है. उनका तर्क है, 'कब्र में दफ्न बुजुर्ग को मजार पर आने वाली महिलाएं निर्वस्त्र नजर आती हैं, लिहाजा महिलाएं कब्र की जगह तक नहीं जाएंगी, कमरे के बाहर से ही जाली पर मन्नत का धागा बांध सकती हैं.' जबकि भारत के शहरों में कब्रिस्तान बस्तियों के बीच ही हैं और वहां महिलाओं की आवाजाही आम बात है. अकबर, हुमायूं, जहांगीर, सफदरजंग, लोधी, चिश्ती, और गालिब तक की मजारों/मकबरों में महिलाएं बेरोक-टोक जाती हैं. दिल्ली की निजामुद्दीन औलिया की मजार पर भी जाती हैं और उत्तर भारत में स्थित सैकड़ों दरगाहों पर भी जाती हैं. सिर्फ हाजी अली दरगाह पर इस हालिया पाबंदी को वहां के कर्ता-धर्ता अब व्यवस्था बनाए रखने का मामला भी बता रहे हैं. कुल मिलाकर एक भी ढंग का तर्क सामने नहीं आया है. 

ऐसे में सवाल पैदा होता है कि असल समस्याओं से जूझती मुस्लिम महिलाओं को इस नकली समस्या में क्यों घसीटा जा रहा है? वो कौन लोग हैं जिन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, तीन-तलाक, भगोड़े पति, पति की दूसरी शादी से उत्पन्न अभाव, परिवार नियोजन का अभाव, जात-पात, दहेज, दंगों में सामूहिक बलात्कार जैसी भयानक समस्याओं के निराकरण के बजाए हाजी अली दरगाह के गर्भ-गृह में दाखिले को मुस्लिम महिलाओं का राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की सूझी है? इस मुहिम के कानूनी खर्च जो महिला एनजीओ उठा रहे हैं उनकी फंडिंग कहां से होती है? तीसरी दुनिया के देशों में जमीन से जुड़े जन आंदोलनों को एनजीओ द्वारा आर्थिक लाभ देकर भ्रष्ट करने के कई मामले जगजाहिर हैं. क्या अब भारतीय मुसलमान भी इनकी निगाहों में चढ़ चुका है?

कुछ मंदिरों में स्त्री-प्रवेश का संघर्ष हिंदू-महिलाएं कर रही हैं इसलिए नकल करना जरूरी हो गया चाहें ये कितना भी आत्मघाती, पोंगापंथी और वाहियात क्यों न हो? क्या मुस्लिम महिलाएं समाज में मौजूद ऐसी बुराइयों को खत्म करने की लड़ाई लड़ने के बजाय उन्हें बढ़ावा देंगी? बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के जिस संविधान से मुस्लिम महिलाएं बराबरी के हक के नाम पर ये पोंगापंथ को अपनाने का आग्रह कर रही हैं, उन्हीं आंबेडकर ने मंदिर प्रवेश के संघर्ष को बेकार बताते हुए मंदिर-पुजारी व्यवस्था से किनारा करने की बात कही थी और बेहतर शिक्षा और आर्थिक खुशहाली पर बल दिया था 

21वीं सदी की दूसरी दहाई में जब मर्दों को भी दरगाहों से बचाना था, ताकि वो भी इस अंधविश्वास, शोषण और अराजकता से बच सकें, तब महिलाओं को शोषण में लपेटने का एजेंडा नारीवाद कैसे हुआ? मर्दों से बराबरी के नाम पर समाज में गैरवैज्ञानिकता, अंधविश्वास और शोषण को विस्तार देना नारी-सशक्तिकरण कैसे हुआ? दरगाहों पर श्रद्धालु बनकर खुद का शोषण करवाने की होड़ बताती है कि एनजीओ सेक्टर में सक्रिय ये मुस्लिम महिलाएं असली और छद्म मुद्दों में फ‌र्क भी नहीं जानती हैं? क्योंकि कुछ मंदिरों में स्त्री-प्रवेश का संघर्ष हिंदू-महिलाएं कर रही हैं इसलिए नकल करना जरूरी हो गया चाहें ये कितना भी आत्मघाती, पोंगापंथी और वाहियात क्यों न हो? क्या मुस्लिम महिलाएं समाज में मौजूद ऐसी बुराइयों को खत्म करने की लड़ाई लड़ने के बजाय उन्हें बढ़ावा देंगी? बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के जिस संविधान से मुस्लिम महिलाएं बराबरी के हक के नाम पर ये पोंगापंथ को अपनाने का आग्रह कर रही हैं, उन्हीं आंबेडकर ने मंदिर प्रवेश के संघर्ष को बेकार बताते हुए मंदिर-पुजारी व्यवस्था से किनारा करने की बात कही थी और बेहतर शिक्षा और आर्थिक खुशहाली पर बल दिया था जिससे व्यक्ति समाज में सम्मानीय स्थान पाता है..........................by Sheeba Aslam Fehmi

राम राज्य - ओशो

🎯 राम राज्य - ओशो

 राम के समय को तुम
रामराज्य कहते हो।
हालात आज से भी बुरे थे। कभी भूल कर रामराज्य फिर मत ले आना!
एक बार जो भूल हो गई, हो गई।
अब दुबारा मत करना।
राम के राज्य में आदमी बाजारों में गुलाम की तरह बिकते थे। कम से कम आज आदमी बाजार में गुलामों की तरह तो नहीं बिकता!
और जब आदमी गुलामों की तरह बिकते रहे होंगे,
तो दरिद्रता निश्चित रही होगी, नहीं तो कोई बिकेगा कैसे? किसलिए बिकेगा?
दीन और दरिद्र ही बिकते होंगे। कोई अमीर तो बाजारों में बिकने न जाएंगे।
कोई टाटा, बिड़ला, डालमिया तो बाजारों में बिकेंगे नहीं।
स्त्रियां बाजारों में बिकती थीं!
वे स्त्रियां गरीबों की स्त्रियां ही होंगी।
उनकी ही बेटियां होंगी।
कोई सीता तो बाजार में नहीं बिकती थी।
उसका तो स्वयंवर होता था।
तो किनकी बच्चियां बिकती थीं बाजारों में?
और हालात निश्चित ही भयंकर रहे होंगे।
क्योंकि बाजारों में ये बिकती स्त्रियां और लोग--आदमी और औरतें दोनों,
विशेषकर स्त्रियां--राजा तो खरीदते ही खरीदते थे,
धनपति तो खरीदते ही खरीदते थे, जिनको तुम ऋषि-मुनि कहते हो, वे भी खरीदते थे! गजब की दुनिया थी!
ऋषि-मुनि भी बाजारों में बिकती हुई स्त्रियों को खरीदते थे! 
अब तो हम भूल ही गए वधु शब्द का असली अर्थ।
अब तो हम शादी होती है नई-नई, तो वर-वधु को आशीर्वाद देने जाते हैं।
हमको पता ही नहीं कि हम किसको आशीर्वाद दे रहे हैं! राम के समय में--और राम के पहले भी--
वधु का अर्थ होता था,
खरीदी गई स्त्री!
जिसके साथ तुम्हें पत्नी जैसा व्यवहार करने का हक है, लेकिन उसके बच्चों को तुम्हारी संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं होगा!
पत्नी और वधु में यही फर्क था। सभी पत्नियां वधु नहीं थीं, और सभी वधुएं पत्नियां नहीं थीं। वधु नंबर दो की पत्नी थी।
जैसे नंबर दो की
बही होती है न,
जिसमें चोरी-चपाटी का सब लिखते रहते हैं!
ऐसी नंबर दो की पत्नी थी वधु।
ऋषि-मुनि भी वधुएं रखते थे! और तुमको यही भ्रांति है कि ऋषि-मुनि गजब के लोग थे।
इन ऋषि-मुनियों में और तुम्हारे पुराने ऋषि-मुनियों में बहुत फर्क मत पाना तुम। कम से कम इनकी वधुएं तो नहीं हैं! कम से कम ये बाजार से स्त्रियां तो नहीं खरीद ले आते! इतना बुरा आदमी तो आज पाना मुश्किल है जो बाजार से स्त्री खरीद कर लाए। आज यह बात ही अमानवीय मालूम होगी। मगर यह जारी थी!
रामराज्य में शूद्र को हक नहीं था वेद पढ़ने का! यह तो कल्पना के बाहर थी बात कि डाक्टर अंबेडकर जैसे शूद्र और राम के समय में भारत के विधान का रचयिता हो सकता था ! ?????
असंभव।
खुद राम ने एक शूद्र के कानों में सीसा पिघलवा कर भरवा दिया था--गरम सीसा,
उबलता हुआ सीसा!
क्योंकि उसने चोरी से, कहीं वेद के मंत्र पढ़े जा रहे थे, वे छिप कर सुन लिए थे। यह उसका पाप था;
यह उसका अपराध था। और राम तुम्हारे मर्यादा पुरुषोत्तम हैं! राम को तुम अवतार कहते हो! और महात्मा गांधी रामराज्य को फिर से लाना चाहते थे। क्या करना है?
शूद्रों के कानों में फिर से सीसा पिघलवा कर भरवाना है? उसके कान तो फूट ही गए होंगे।
शायद मस्तिष्क भी विकृत हो गया होगा।
उस गरीब पर क्या गुजरी, किसी को क्या लेना-देना! शायद आंखें भी खराब हो गई होंगी। क्योंकि ये सब जुड़े हैं; कान, आंख, नाक, मस्तिष्क, सब जुड़े हैं।
और दोनों कानों में अगर सीसा उबलता हुआ...! 
तुम्हारा खून क्या खाक उबल रहा है !
उबलते हुए शीशे की जरा
कल्पना करो!!!
सोचो!
उबलता हुआ सीसा जब कानों में भर दिया गया होगा,
तो चला गया होगा पर्दों को तोड़ कर,
भीतर मांस-मज्जा तक को प्रवेश कर गया होगा;
मस्तिष्क के स्नायुओं तक को जला गया होगा।
फिर इस गरीब पर क्या गुजरी, किसी को क्या लेना-देना है! धर्म का कार्य पूर्ण हो गया। ब्राह्मणों ने आशीर्वाद दिया कि राम ने धर्म की रक्षा की।
यह धर्म की रक्षा थी!
और तुम कहते हो,
"मौजूदा हालात खराब हैं!'
युधिष्ठिर जुआ खेलते हैं, फिर भी धर्मराज थे!
और तुम कहते हो, मौजूदा हालात खराब हैं!
आज किसी जुआरी को धर्मराज कहने की हिम्मत कर सकोगे?
और जुआरी भी कुछ छोटे-मोटे नहीं,
सब जुए पर लगा दिया।
पत्नी तक को दांव पर लगा दिया!
एक तो यह बात ही अशोभन है, क्योंकि पत्नी कोई संपत्ति नहीं है।
मगर उन दिनों यही धारणा थी, स्त्री-संपत्ति!
उसी धारणा के अनुसार आज भी जब बाप अपनी बेटी का विवाह करता है,
तो उसको कहते हैं कन्यादान! क्या गजब कर रहे हो! गाय-भैंस दान करो तो भी समझ में आता है।
कन्यादान कर रहे हो! यह दान है? स्त्री कोई वस्तु है?
ये असभ्य शब्द, ये असंस्कृत हमारे प्रयोग शब्दों के बंद होने चाहिए। अमानवीय हैं,
अशिष्ट हैं, असंस्कृत हैं। 
मगर युधिष्ठिर धर्मराज थे। और दांव पर लगा दिया अपनी पत्नी को भी! हद्द का दीवानापन रहा होगा।
पहुंचे हुए जुआरी रहे होंगे। इतना भी होश न रहा। और फिर भी धर्मराज धर्मराज ही बने रहे; इससे कुछ अंतर न आया। इससे उनकी प्रतिष्ठा में कोई भेद न पड़ा। इससे उनका समादर जारी रहा।
भीष्म पितामह को ब्रह्मज्ञानी समझा जाता था। मगर ब्रह्मज्ञानी कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ रहे थे! गुरु द्रोण को ब्रह्मज्ञानी समझा जाता था। मगर गुरु द्रोण भी कौरवों की तरफ से युद्ध लड़ रहे थे! अगर कौरव अधार्मिक थे,
दुष्ट थे, तो कम से कम भीष्म में इतनी हिम्मत तो होनी चाहिए थी!
और बाल-ब्रह्मचारी थे और इतनी भी हिम्मत नहीं?
तो खाक ब्रह्मचर्य था यह!
किस लोलुपता के कारण गलत लोगों का साथ दे रहे थे?
और द्रोण तो गुरु थे अर्जुन के भी, और अर्जुन को बहुत चाहा भी था।
लेकिन धन तो कौरवों के पास था;
पद कौरवों के पास था; प्रतिष्ठा कौरवों के पास थी।
संभावना भी यही थी कि वही जीतेंगे।
राज्य उनका था। पांडव तो भिखारी हो गए थे। इंच भर जमीन भी कौरव देने को राजी नहीं थे।
और कसूर कुछ कौरवों का हो, ऐसा समझ में आता नहीं। जब तुम्हीं दांव पर लगा कर सब हार गए, तो मांगते किस मुंह से थे? मांगने की बात ही गलत थी। जब हार गए तो हार गए। खुद ही हार गए, अब मांगना क्या है? 
लेकिन गुरु द्रोण भी अर्जुन के साथ खड़े न हुए; खड़े हुए उनके साथ जो गलत थे।
यही गुरु द्रोण एकलव्य का अंगूठा कटवा कर आ गए थे अर्जुन के हित में, क्योंकि तब संभावना थी कि अर्जुन सम्राट बनेगा। तब इन्होंने एकलव्य को इनकार कर दिया था शिक्षा देने से। क्यों? क्योंकि शूद्र था।
और तुम कहते हो, "मौजूदा हालात बिलकुल पसंद नहीं!' 
एकलव्य को मौजूदा हालात उस समय के पसंद पड़े होंगे? उस गरीब का कसूर क्या था अगर उसने मांग की थी, प्रार्थना की थी कि मुझे भी स्वीकार कर लो शिष्य की भांति, मुझे भी सीखने का अवसर दे दो? लेकिन नहीं,
शूद्र को कैसे सीखने का अवसर दिया जा सकता है!
मगर एकलव्य अनूठा युवक रहा होगा।
अनूठा इसलिए कहता हूं कि उसका खून नहीं खौला।
खून खौलता तो साधारण युवक, दो कौड़ी का। सभी युवकों का खौलता है,
इसमें कुछ खास बात नहीं। उसका खून नहीं खौला।
शांत मन से उसने इसको स्वीकार कर लिया। एकांत जंगल में जाकर गुरु द्रोण की प्रतिमा बना ली। और उसी प्रतिमा के सामने शर-संधान करता रहा। उसी के सामने धनुर्विद्या का अभ्यास करता रहा। अदभुत युवक था। उस गुरु के सामने धनुर्विद्या का अभ्यास करता रहा जिसने उसे शूद्र के कारण इनकार कर दिया था; अपमान न लिया। अहंकार पर चोट तो लगी होगी, लेकिन शांति से, समता से पी गया।
धीरे-धीरे खबर फैलनी शुरू हो गई कि वह बड़ा निष्णात हो गया है। तो गुरु द्रोण को बेचैनी हुई, क्योंकि बेचैनी यह थी कि खबरें आने लगीं कि अर्जुन उसके मुकाबले कुछ भी नहीं। और अर्जुन पर ही सारा दांव था।
अगर अर्जुन सम्राट बने, और सारे जगत में सबसे बड़ा धनुर्धर बने, तो उसी के साथ गुरु द्रोण की भी प्रतिष्ठा होगी। उनका शिष्य, उनका शागिर्द ऊंचाई पर पहुंच जाए, तो गुरु भी ऊंचाई पर पहुंच जाएगा। उनका सारा का सारा न्यस्त स्वार्थ अर्जुन में था। और एकलव्य अगर आगे निकल जाए, तो बड़ी बेचैनी की बात थी। 
तो यह बेशर्म आदमी, जिसको कि ब्रह्मज्ञानी कहा जाता है, यह गुरु द्रोण, जिसने इनकार कर दिया था एकलव्य को शिक्षा देने से, यह उससे दक्षिणा लेने पहुंच गया! शिक्षा देने से इनकार करने वाला गुरु, जिसने दीक्षा ही न दी, वह दक्षिणा लेने पहुंच गया! हालात बड़े अजीब रहे होंगे! शर्म भी कोई चीज होती है! इज्जत भी कोई बात होती है! आदमी की नाक भी होती है! ये गुरु द्रोण तो बिलकुल नाक-कटे आदमी रहे होंगे! किस मुंह से--जिसको दुत्कार दिया था--उससे जाकर दक्षिणा लेने पहुंच गए! 
और फिर भी मैं कहता हूं, एकलव्य अदभुत युवक था; दक्षिणा देने को राजी हो गया। उस गुरु को, जिसने दीक्षा ही नहीं दी कभी! यह जरा सोचो तो! उस गुरु को, जिसने दुत्कार दिया था और कहा कि तू शूद्र है! हम शूद्र को शिष्य की तरह स्वीकार नहीं कर सकते!
बड़ा मजा है! जिस शूद्र को शिष्य की तरह स्वीकार नहीं कर सकते, उस शूद्र की भी दक्षिणा स्वीकार कर सकते हो! मगर उसमें षडयंत्र था, चालबाजी थी। 
उसने चरणों पर गिर कर कहा, आप जो कहें। मैं तो गरीब हूं, मेरे पास कुछ है नहीं देने को। मगर जो आप कहें, जो मेरे पास हो, तो मैं देने को राजी हूं। यूं प्राण भी देने को राजी हूं।
तो क्या मांगा? मांगा कि अपने दाएं हाथ का अंगूठा काट कर मुझे दे दे!
जालसाजी की भी कोई सीमा होती है! अमानवीयता की भी कोई सीमा होती है! कपट की, कूटनीति की भी कोई सीमा होती है! और यह ब्रह्मज्ञानी! उस गरीब एकलव्य से अंगूठा मांग लिया। और अदभुत युवक रहा होगा,
दे दिया उसने अपना अंगूठा! तत्क्षण काट कर अपना अंगूठा दे दिया! जानते हुए कि दाएं हाथ का अंगूठा कट जाने का अर्थ है कि मेरी धनुर्विद्या समाप्त हो गई। अब मेरा कोई भविष्य नहीं। इस आदमी ने सारा भविष्य ले लिया। शिक्षा दी नहीं, और दक्षिणा में, जो मैंने अपने आप सीखा था, उस सब को विनिष्ट कर दिया।||