Saturday, November 26, 2016

गुरु घासीदास जी का अपमान

*डाँ. अभिराम शर्मा द्वारा बाबा गुरु घासीदास जी का अपमान कर धार्मिक,समाजिक उन्माद को बढ़ा कर पूरे अनुसूचित जाति वर्ग को नीचा दिखाया गया*

डाँ. अभिराम शर्मा द्वारा ढ़ेका स्थित(मस्तूरी-बिलासपुर मुख्य मार्ग)अपने फार्म हाऊस के शौचालय एवं गंदा पानी निकासी के लिए बनाये गये नाली के पास करोड़ों लोगों के आस्था के प्रतीक एवं मार्गदर्शक बाबा गुरूघासीदास जी का तस्वीर(वाल पेंटिंग)बना कर बाबा गुरूघासी दास जी को अपमानित करने का घिनौना मामला उजागर हुआ है।
                            इस अमानवीय घटना को डाँ.अभिराम शर्मा द्वारा सोची समझी रणनीति के तहत बाबा गुरु घासीदास एवं संपूर्ण अनुसूचित जाति वर्ग को अपमानित करने के लिए अंजाम दिया गया है।
                              इनके इस कृत्य से उनके अनुसूचित जाति वर्ग के खिलाफ घृणित एवं समाज विरोधी मानसिकता का पता चलता है।
                      उक्त घटना के प्रकाश में आने के बाद बाबा गुरुघासीदास जी के अनुयायियों द्वारा थाना तोरवा (बिलासपुर) में एफ.आई.आर. दर्ज कराई गई है।
जिसमें मुख्य अभियुक्त डाँ. अभिराम शर्मा कोे धार्मिक एवं समाजिक भातृत्व की भावना मे जहर घोल कर बाबा गुरु घासीदास जी को अपमानित करने के जुर्म मे कड़ी से कड़ी सजा दिलाने की मांग की गई है।
इस प्रकरण में तोरवा थाना प्रभारी परवेश तिवारी की भूमिका भी संदेह के दायरे में है क्योंकि इनके द्वारा घटना की सूचना मिलते ही संबंधित बाबा जी के तस्वीर (वाल पेंटिंग) को तत्काल मिटवा दिया गया है, ताकि अपने स्वजातीय डाँ. अभिराम शर्मा के उक्त असंवैधानिक एवं समाज विरोधी कुकृत्य पर पर्दा डालकर उसे जेल जाने से बचाया जा सके।
इसलिए हम सम्मानीय पुलिस अधीक्षक एवं कलेक्टर बिलासपुर के साथ ही उच्चस्थ प्रशासन से मांग करते हैं कि तोरवा थाना प्रभारी परवेश तिवारी पर भी घटना से संबंधित साक्ष्य मिटवाने के आरोप में इन्हे सह अभियुक्त बनाकर तत्काल निलंबित किया जाये ताकि उनके तोरवा थाना मे रहते जाँच पर कोई विपरीत प्रभाव ना पड़े।
उक्त घटना के तारतम्य में संबंधित डाँ. अभिराम शर्मा एवं तोरवा थाना प्रभारी परवेश तिवारी के खिलाफ कठोर कार्यवाही किया जाना अति आवश्यक है ताकि इस प्रकार धार्मिक एवं सामाजिक भाईचारा को बिगाड़ने वालों को सबक सिखाया जा सके,जो कि उच्च शिक्षित होने का चोला ओढ़कर अपने कपट मन में अनुसूचित जाति वर्ग के खिलाफ असमाजिकता के जहर को भरे फिरते हैं।

इस मामले मे एक और अजीब वाकया जुड़ गया है,जब,आज प्रकरण दर्ज कराने के समय दोपहर 02.35 के एक घंटे के भीतर ही थाना प्रभारी परवेश तिवारी द्वारा पुलिस प्रशासन को अपने हाथ का कठपुतली बनाकर अपने सजातीय अभिराम शर्मा को जेल जाने से बचाने के लिये फौरन विवेचना करवा कोर्ट अविलंब चालान पेश कर दिया गया।
जिस पर त्वरित कार्यवाही करते हुये आज शाम को ही आरोपी ड़ाँ.अभिराम शर्मा को माननीय स्पेशल कोर्ट पंकज चंद्रा द्वारा जमानत दे दिया गया है,इस बीच समाज प्रमुखों द्वारा आरोपी अभिराम शर्मा के जमानत पर समाजिक संघर्ष की संभावना के मद्देनजर आपत्ति किया गया।इसके बावजूद आरोपी डाँ.अभिराम शर्मा को छोड़ा गया जबकि इन्ही धाराओं के तहत विकास खाण्डेकर(मुंगेली)को विगत एक माह से बगैर जमानत दिये जेल मे सड़ाया जा रहा है।
इस प्रकार के परिस्थिति एवं फैसले से पूरा अनुसूचित जाति वर्ग मे रोष व्याप्त है।

                 इसलिए संपूर्ण अनुसूचित जाति वर्ग द्वारा प्रशासन एवं माननीय न्यायालय से यह मांग है कि आरोपी डाँ.अभिराम शर्मा,तोरवा थाना प्रभारी परवेश तिवारी एवं इस के घटना मे शामिल अन्य आरोपियों के खिलाफ कड़ी से कड़ी सजा की कार्यवाही की जाऐ,ताकि पूरे मानव समाज मे सामाजिक एवं धार्मिक बंधुत्व पर कोई आंच ना आये।

धर्मेन्द्र कौशले
अध्यक्ष
मिनीमाता गुरूद्वारा प्रबंधन समिति पचपेड़ी जिला बिलासपुर
संपर्क सूत्र 9424147726

NDTV के खिलाफ कार्रवाई एमरजेंसी के दिनों जैसी

NDTV के खिलाफ कार्रवाई पर एडिटर्स गिल्ड ने कहा, सेंसरशिप एमरजेंसी के दिनों जैसी

अंतिम अपडेट: November 04, 2016 11:

NDTV इंडिया को एक दिन के लिए ब्लैकआउट कर देने के सरकारी पैनल के निर्णय की एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया कड़ी निंदा करता है. यह है एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया का पूरा बयान.

द एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया

केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की अंतर-मंत्रालयी समिति द्वारा NDTV इंडिया को एक दिन के लिए ऑफएयर (बंद कर देने) करने तथा उसके आदेश का तुरंत पालन किए जाने के अभूतपूर्व फैसले की एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया कड़ी निंदा करता है.

इस आदेश के पीछे का प्रत्यक्ष कारण चैनल की 2 जनवरी, 2016 को पठानकोट आतंकवादी हमले की कवरेज को बताया गया है, और सरकार का दावा है कि उस कवरेज से आतंकवादियों के हैंडलरों को संवेदनशील जानकारी मिली. सरकार द्वारा दिए गए कारण बताओ नोटिस के जवाब में NDTV ने कहा कि उसकी कवरेज संतुलित थी, और उसमें ऐसी कोई सूचना नहीं दी गई, जो शेष मीडिया ने कवर नहीं की, या जो सार्वजनिक नहीं थी.

चैनल को एक दिन के लिए ऑफएयर कर देने का निर्णय मीडिया की स्वतंत्रता, और इस तरह से भारतीय नागरिकों की स्वतंत्रता का सीधा उल्लंघन है, जिसके ज़रिये सरकार कड़ी सेंसरशिप थोप रही है, और जो एमरजेंसी के दिनों की याद दिलाता है. ब्लैकआउट के अपनी तरह के इस पहले आदेश से पता चलता है कि केंद्र सरकार समझती है कि उसे मीडिया के कामकाज में दखल देने और जब भी सरकार किसी कवरेज से सहमत न हो, उसे अपनी मर्ज़ी से किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई करने का अधिकार है. किसी भी गैरज़िम्मेदाराना मीडिया कवरेज के खिलाफ कोई कार्रवाई करने के लिए किसी भी नागरिक या सरकार के सामने बहुत-से कानूनी मार्ग उपलब्ध हैं. न्यायिक हस्तक्षेप या निगरानी के बिना प्रतिबंध लागू कर देना न्याय तथा स्वतंत्रता के मौलिक सिद्धांतों का उल्लंघन है. एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया प्रतिबंध के इस आदेश को तुरंत वापस लिए जाने की मांग करता है.

राज चेंगप्पा, अध्यक्ष
प्रकाश दुबे, महासचिव
सीमा मुस्तफा, कोषाध्यक्ष

मैं तो पूरी जिंदगी झाड़ू लगाती रही मगर मैंने अपने तीनों बेटों को साहब बना दिया

#Inspiration

*झारखंड के रामगढ़ जिले के रजरप्पा टाउनशिप में पिछले 30 सालों से झाड़ू लगाने वाली सुमित्रा देवी की आज बड़ी चर्चा है। सोशल मीडिया पर भी उनके चर्चे हैं। इसकी वजह है उनका रिटायरमेंट और उस दिन विदाई समारोह में उनके बेटों का शामिल होना।*
*दरअसल, जैसे ही रिटायरमेंट फंक्शन शुरू हुआ, वहां तीन बड़े अफसर पहुंचे। एक अफसर नीली बत्ती लगी गाड़ी में पहुंचे तो दो अफसर अलग-अलग बड़ी-बड़ी गाड़ियों में पहुंचे। उनमें एक थे बिहार के सिवान जिले के कलक्टर महेन्द्र कुमार,दूसरे रेलवे के चीफ इंजीनियर वीरेन्द्र कुमार और तीसरे थे मेडिकल अफसर धीरेन्द्र कुमार। ये तीनों सुमित्रा देवी के बेटे हैं जिन्हें उन्होंने बड़ी मेहनत से न केवल पाला-पोषा बल्कि उन्हें बड़ा अधिकारी बनाया। जब तीनों बेटे वहां पहुंचे तो सुमित्रा देवी की आंखें भर आईं। उन्होंने अपने तीनों बेटों का वहां मौजूद अपने अधिकारियों से परिचय कराया तो सबके सब दंग रह गए। सुमित्रा देवी के दूसरे सहयोगी सफाईकर्मियों को उन पर गर्व महसूस हो रहा था।बेटों को अपने आला अफसरों से मिलवाते हुए सुमित्रा देवी बोलीं, “साहब, मैं तो पूरी जिंदगी झाड़ू लगाती रही मगर मैंने अपने तीनों बेटों को साहब बना दिया। यह मिलिए मेरे छोटे बेटे महेंद्र से जो सिवान का कलेक्टर है और यह मेरा बेटा वीरेंद्र इंजीनियर है तोधीरेंद्र डॉक्टर।” कलक्टर, डॉक्टर और इंजीनियर बेटों ने भी विदाई समारोह में अपनी सफाईकर्मी मां सुमित्रा देवी की मेहनत और संघर्ष की कहानी से सभी को रू-ब-रू कराया। उन्होंने कहा कि मां ने झाड़ू लगाकर भी उन्हें अच्छी शिक्षा दिलाई। जिसकी वजह से आज वे अधिकारी बनकर जिंदगी में सफल रहे। उन्हें बहुत खुशी है कि जिस नौकरी के दम पर उनकी मां ने उन्हें पढ़ाया-लिखाया, आज सब अपनी मां की विदाई समारोह में साथ-साथ हैं। सीवान के कलेक्टर महेन्द्र कुमार ने बड़े ही भावुक अंदाज में कहा कि कभी भी विपरीत हालात से हार नहीं मानना चाहिए। सोचिए मेरी मां ने झाडू लगा-लगाकर हम तीनों भाइयों को पढ़ाकर आज इस मुकाम तक पहुंचा दिया।*
*सुमित्रा देवी भी तीस साल की नौकरी को याद करते हुए भावुक हो गईं। उन्होंने कहा कि झाड़ू लगाने का पेशा होने के बाद भी उन्होंने अपने बेटों को साहब बनाने का सपना आंखों में संजोया था। आखिरकार भगवान की कृपा और बेटों की मेहनत से वह सपना सच हो गया। भले ही बेटे अधिकारी हो गए मगर उन्होंने अपनी झाड़ू लगाने की नौकरी इसलिए नहीं छोड़ी कि इसी छोटी नौकरी की कमाई से उनके बेटे पढ़-लिखकर आगे बढ़ सके। आज उनके बेटे उन्हें गर्व का अहसास करा रहे हैं।*

NDTV इंडिया पर बैन स्थगित

*सूचना प्रसारण मंत्रालय ने NDTV इंडिया पर एक दिन के बैन के अपने आदेश को स्थगित किया*

NDTV की रिपोर्ट, विवेक रस्तोगी द्वारा अनूदित, अंतिम अपडेट: November 07, 2016 20:33

NDTV इंडिया पर एक दिन के बैन की चौतरफा आलोचना हुई थी
खास बातें
केंद्र ने 9 नवंबर को चैनल को ऑफएयर रखने का आदेश दिया था
सरकार का आरोप, पठानकोट हमले के दौरान संवेदनशील जानकारी प्रसारित हुई
प्रतिबंध के आदेश की संपादकों और पत्रकारों ने की थी कड़ी आलोचना
नई दिल्ली: सूचना प्रसारण मंत्रालय ने NDTV इंडिया पर एक दिन के बैन लगाने के अपने आदेश को स्थगित कर दिया है. अपने हिन्दी चैनल NDTV इंडिया पर केंद्र सरकार द्वारा लगाए गए एक दिन के प्रतिबंध को NDTV ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने कल यानी मंगलवार को इस याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दी थी.

सरकार ने NDTV इंडिया पर इसी साल जनवरी में पठानकोट एयरफोर्स बेस पर हुए आतंकवादी हमले के दौरान संवेदनशील जानकारी का प्रसारण करने का आरोप लगाते हुए बुधवार, 9 नवंबर को उसे एक दिन के लिए ऑफएयर रखे जाने का आदेश दिया था.

NDTV ने इन आरोपों का खंडन किया और कहा था कि अन्य चैनलों तथा समाचारपत्रों ने भी वही जानकारी दिखाई या रिपोर्ट की थी.

इस प्रतिबंध की पत्रकारों और संपादकों ने चौतरफा आलोचना की . सभी प्रेस काउंसिलों ने इसे '70 के दशक में देश में लागू की गई एमरजेंसी के समान बताया, जब प्रेस की आज़ादी सहित सभी मूल संवैधानिक अधिकारों का खुलेआम उल्लंघन किया गया था.

एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने कहा था कि अपनी तरह के इस पहले आदेश से पता चलता है कि केंद्र सरकार समझती है कि "उसे मीडिया के कामकाज में दखल देने और जब भी सरकार किसी कवरेज से सहमत न हो, उसे अपनी मर्ज़ी से किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई करने का अधिकार है..." देश के सभी बड़े समाचारपत्रों तथा पत्रिकाओं के संपादकों के समूह ने कहा था कि अगर सरकार को किसी मीडिया कवरेज में कुछ आपत्तिजनक लगता है, तो वह कोर्ट जा सकती है.

उधर, इस प्रतिबंध का बचाव करते हुए सूचना एवं प्रसारण मंत्री वेंकैया नायडू ने कहा था कि यह प्रतिबंध 'देश की सुरक्षा के हित में है'।
बहरहाल बुद्धिजिवी, प्रगतिशील एवं आम जनता का विरोध काम आया। एेसा माना जा रहा है कि शायद उत्तरप्रदेश के चुनाव से घबराकर सरकार ने ये क्षणिक निर्णय लिया है।

http://khabar.ndtv.com/news/india/one-day-ban-on-ndtv-india-by-information-and-broadcasting-ministry-put-on-hold-1622223

काले धन पर लगाम के नाम पर मुद्रा परिवर्तन- कितना सही

*काले धन पर लगाम के नाम पर मुद्रा परिवर्तन- कितना सही कितना गलत एक विश्लेषण*
✍संजीव खुदशाह
आज सुबह घरों में काम करने वाली एक महिला ने बताया की  500 और 1000 रूपए के नोट बंद हो गये है। वो काफी परेशान लग रही थी, उसने आगे बताया की इस रविवार उसकी बी सी खुली थी जिसके 12000 रूपए(500 और 1000 नोट में) उसे मिले है। लेकिन आज ही मुहल्‍ले के किराना दुकान वाले ने 500 नोट के बदले किराना देने से इनकार कर दिया, वो बच्‍चे के दूध के लिए भटक रही थी। मै इस खबर से हतप्रद हो गया सहसा मुझे यकीन नही हुआ लेकिन न्यूज़पेपर की हेड लाईन से उसके बातों पर यकीन होगया।
मैने कहा की तुम बैंक में पैसे बदल सकती हो बहुत आसान है। तो उसने बताया की उसका बैंक में एकाउंट ही नही है। दर असल यह समस्‍या लगभग हर मध्‍यम, निम्‍न मध्‍यम परिवार की है।
मैं बताना चाहूँगा की 500 एवं 1000 रूपये के नोट आज 9 नवंबर 2016 की बीती रात से अवैध(बंद) कर दिये गये है। उनकी जगह 500 तथा 2000 के  नये नोट जारी किये गये है। इसके पीछे आर बी आई का तर्क है जो आज के अधिकृत विज्ञापन में विस्‍तृत रूप से सामने आया है। वे इस प्रकार है
*1 काले धन पर लगाम, 2 भ्रष्‍टाचार पर लगाम 3 जाली नोट पर रोक 4 आतंकवाद का वित्‍तपोषण पर नकेल आदि*
सरकार के इस फैसले पर चारों ओर से प्रतिक्रिया आ रही है कुछ इसे साहसी कदम बता रहे है तो कूछ लोग केवल सनसनी पैदा करने वाला कदम बता रहे है। *कुछ लोग ड़ॉ अंबेडकर के हवाले से भी इस तर्क का समर्थन कर रहे है।*

❌ *डॉं अंबेडकर ने नही कहा की 10 वर्ष में नोट बदलने से भ्रष्‍टाचार में कमी आयेगी*
हालांकि प्रख्‍यात अ‍र्थशास्‍त्री एवं *आर बी आई के जनक डॉं अंबेडकर के हवाले से ये खबर फैलाई जा रही है की वे प्रति 10 वर्ष में नोट बदले जाने के पक्ष में है।* उनके निम्‍न उद्हरण जो उनकी प्रसिध्‍द किताब  (रूपए की समस्‍या) Problem of Rupee से लिया गया है
‘And as the Government chose to have legal-tender notes, the Legislature in its turn insisted on their being of higher denomination. At first it adhered to notes of Rs. 20 as the lowest denomination/n, though it later on yielded to bring it down to 10, which was the lowest limit it could tolerate in 1861. Not till ten years after that, did the legislature consent to the issue of Rs. 5 notes, and that, too, only when the Government had promised to give extra legal facilities for their encashment. [f1][f20] ‘यह उध्‍दहरण इस किताब में सर रिचर्ड टेम्‍पल के हवाले से लिया गया है इसका हिन्‍दी अनुवाद इस प्रकार है।
*‘’सर्व प्रथम विधान मण्‍डल ने कम से कम मूल्‍य वर्ग के रूपए में 20 रूपए के नोट को जारी करने का बल दिया। परंतु बाद में वह इस मूल्‍य वर्ग को घटाकर दस रूपय के नोटो पर सहमत हो गई और यह बाद तक विघानमण्‍डल ने 5 रूपय के नोटो के जारी किये जाने की अनुमति नही दी और यह अनुमति तभी दी गई जब सरकार ने उनके भुनाने के लिए अतिरिक्‍त सुविधाएँ देने का वचन दिया’’*
@वाल्‍यूम 12 पृष्‍ठ 57 रूपये की समस्‍या उद्धव और समाधान
द्वारा बाबासाहेब डां अंबेडकर सम्‍पूर्ण वाडमय

गौर तलब है कि इस संदर्भ को डॉं अंबेडकर के नाम पर समाचार पत्र पत्रिकाओं सोशल मीडिया में प्रसारित किया जा रहा है। ऐसा करने के पीछे क्‍या मकसद है ये एक षड्यंत्र है या अज्ञानता यह एक जांच का विषय है। जबकि उक्‍त उदाहरण को ध्‍यान से पढेगे तो आप पायेंगे की इसमें कुछ और बात लिखी गई, 10 वर्ष में मुद्रा बदले जाने संबंध में यहां कोई बात नही की गई है।
यहां यह बताना जरूरी है की सरकार ने एक अच्‍छे मकसद से मुद्रा परिवर्तन का कदम उठाया है लेकिन नाम न बताने की शर्त पर एक व्‍यवसायी बताते हे कि विगत 5-6 दिनों से भारी मात्रा में कुछ धनिको द्वारा बैंक में धन जमा कराया जा रहा था। आशंका है की सरकार के इस निर्णय की भनक कुछ धनकुबेरो को लग गई थी।
क्‍या काले धन पर लगाम लगेगा?
जैसा की आर बी आई ने कालाधन, जाली नोट, आतंकवाद पर रोक लगाने की बात कही है। चूकि बड़े नोट बंद नही हुये है इसलिए इन समस्‍याओं पर क्षणिक असर तो पड़ेगा लेकिन बाद में समस्‍या जस की तस रहेगी। क्‍योकि काले धन का कैश ट्रांजेक्‍सन आसान होता है।
आईये जाने की काला धन कहां जमा है किन पर कार्यवाही की जरूरत है
*1) भूमि पति-* कालाधन का सबसे आसान निवेश है ज़मीन खरिदी। भारत में भूमि सीलिगं एक्‍ट लागू है यानि कोई भी व्‍यकित 10 एकड़ से ज्‍यादा सिंचित भूमि नही रख सकता। लेकिन इस नियम को या तो सीथील कर दिया गया या इसकी धज्‍जीयां उड़ा दी गई । आज एक ओर एक व्‍यक्ति के पास सर छिपा ने को न छत है न जमीन, तो दूसरी एक एक व्‍यक्ति के पास 100 से 1000 एकड़ भूमि के मालिकों की संख्‍या लगातार बढती जा रही है। आजादी के बाद काले धन का सबसे ज्‍यादा निवेश भूमि में हुआ है। अत: सीलिंग अधिनियम को और मजबूत बनाने की जरूरत है साथ ही जरूरत है उसे कड़ाई से लागू करवाने की।
*2) स्‍वर्ण खरीदी-* डॉं अंबेडकर अपनी किताब रूपये की समस्‍या में बताते है की सोवियत रूस समेत कुछ विकसित देश में स्‍वर्ण की खरीदी की सीमा बांधी गई है। भारत में काला धन निवेश की दूसरी सबसे पसंदीदा जगह स्‍वर्ण खरिदी है। अत: स्‍वर्ण खरीदी पर अंकुश लगाया जाना चाहिए तथा पूर्व में घरो में जमा सोना का घोषणा पत्र लिया जाना चाहिए।
*3) राजनीतिक पार्टियो को चंदा-* चूकि राजनीति पार्टी को दिया जाने वाला चंदा आर टी आई के अंतर्गत नही आता इसलिए यहां निवेश अत्‍यंत अच्‍छा माना जाता है बडे अद्यौगिक घराने वे इसके सहारे संविधान में संशोधन अपने व्‍यसायीक लाभ को बढाने के लिए करते रहे है।
*4) धार्मिक स्‍थल को दिया जाने वाला धन-* भारत एक धार्मिक देश है लोग अपनी आत्‍म संतुष्टि के लिए चंदा देते है ते वहीं गुप्‍त धन के रूप में काला धन भी खूब दिया जाता है। उसी प्रकार काला धन को सफेद बानने का गोरख धधा भी किया जाता है। पिछले दिनो ऐसा ही मामलो सामने आया एक संत काला धन को सफेद करने का समाचार मीडिया मे सुर्खियों में था।
*5)शेयर एवं महंगी चल संपत्ति-* इसके बाद कालाधन का निवेश शेयर बाजार तथा महँगी चल सम्‍पत्ति में किया जा रहा है।
यदि वास्‍तव में कालेधन/ आतंकवाद/ जाली नोट में अंकुश लगाना है तो इन 5 बिन्‍दुओ पर गौर करना आवश्‍यक है। *क्‍याकि काला धन की खपत की गुन्‍जाईश जिस देश में ज्‍यादा होगी वहां भ्रष्‍टाचार/ आतंकवाद/ जाली नोट का बजार फलेगा फूलेगा।*
अत: सबसे पहले आज़ादी के बाद काला धन जमा कररने वाले लागो पर कड्री कार्यवाही किया जाना चाहिए तभी भविष्‍य में लोग इससे बाज आयेगे। मुद्रा बदलने की प्रक्रिया को काला धन पर प्रहार के रूप में देखा जाना उचित नही है *क्‍योकि 1946 और 1978 में भी इस प्रकार मुद्रा की वापसी या परिवर्तन हुआ था किन्‍तु काला धन पर कितना अं‍कुश लगा ये बात किसी से छि‍पी नही है।*
बहर हाल सरकार के फैसले का स्‍वागत है देखना है कि इन पांच बिन्‍दुओ पर कठोर कदम कब उठाया जायेगा या मुद्रा (वापसी) परिवर्तन ग़रीबों की परेशानी का सबब बनकर रह जायेगा।
 [f1]For such extra facilities, and measures adopted to materialise them, Cf. the interesting speech of the Hon. Sir Richard Temple on the Paper Currency Bill dated January 13, 1871, S.L.C.P., Vol. X, pp. 22-25

मोदी भक्तों के शुरुआत के 50 दिन

[11/14, 12:35 PM] Sanjeev Sehara: #500_1000_नोट

मोदी: भक्तों, शुरुआत के 50 दिन कष्ट में गुजरेंगे।

भक्त: और 50 दिनों बाद।

मोदी: भक्तों, 50 दिन के बाद का समय ठीक गुजरेगा।
भक्त: कैसे?

मोदी: भक्तों, 50 दिनों के बाद तुम्हे कष्ट सहने की आदत पड़ जाएगी।
आदत नहीं पड़ी तो भी चिंता की कोई बात नहीं है। तब तक कोई नया शिगूफा छोड़ देंगे। कोई नया झुनझुना थमा देंगे, बैठकर बजाते रहना, लॉलीपॉप दे देंगे, पकड़कर चूसते रहना। शिगूफों, झुनझुनों और लॉलीपॉप की कोई कमी थोड़ी है हमारे पास!

**जय मूलनिवासी**
   😜😜😡😃😳
[11/14, 12:51 PM] Sanjeev Sehara: मोदी के नोट बदलने के तुगलकी फरमान के खिलाफ थे रघुराम राजन

जैसे जैसे वक़्त बीत रहा है और नये आर्थिक फ़ैसले आ रहे वैसे वैसे राजनीति के गलियारों में सामने आ रही है रघुराम राजन के छोड़ने की वजह| मोदी सरकार के आने के बाद ही काला धन चर्चा का विषय था, देश को उससे कैसे निजातदिलाई जाए| रघुराम राजन चाहते थे देश के धन्ना सेठो के खिलाफ जाना, लेकिन मोदी चाहते थे ग़रीब, किसानो औरमध्यवर्ग के खिलाफ जाना|सूत्रो के माने तो रघुराम राजन ने प्रधानमंत्री मोदी और उनके सहयोगी को अपने रहते 500/1000 रुपये के नोटो को बैन करने से रोक दिया था|
रघुराम राजन ने अपने मुलाकात के दौरान प्रधानमंत्री से बाते की, उन्होने इसके खिलाफ तीन बाते बातये- 20,000 करोड़ नये नोटो की छापने की कीमत कौन देगा| भारत मे सिर्फ़ 28-32% लोगो वित्य संस्थान से जुड़े है| पूरी बैंकिंग व्यवस्था के 138,626 मे 33% ब्रांच सिर्फ़ 60 बड़े शहरों और छोटे शहरों मे है| उत्तर पूर्व के 38 ज़िलो मे सिर्फ़10 बैंक ब्रांच है| इस से भी बड़ी बात ये है की हर 10 हज़ार व्यक्ति पर सिर्फ़ एक बैंक है भारत में|
दूसरा कारण जो राजन ने प्रधानमंत्री को बताया था वो था की कोई भी काला धन जमा करके नही रखता उसे सोने, चाँदी,ज़मीन, फ्लैट, हीरा, डॉलर या विदेशो के बैंक मे रखता है| इसलिए नोटो के बदलने से सिर्फ़ आम आदमी को दिक्कत का सामना करना पड़ेगा| उन्होने बताया की भारत मे 60 फीसदी लोग किसान है, जिनको इनकम टैक्स नहीं देना होता है| ये लोग रुपयों मे कारोबार करते हैं| 500 और 1000 का नोट बदलने से इनपर बुरा असर पड़ेगा| ये बताना ज़रूरी हैभारत मे 97% कारोबार रुपयो मे होता है|
तीसरा और सबसे बड़ा कारण- राजन कॉर्पोरेट इंडिया के पीछे जाना चाहते थे| जो सरकार को अरबो का चूना लगा रहे थे| सरकार से अरबो का लोन लेकर बैठे थे| इस मुहिम से कॉर्पोरेट इंडिया मे खलबली मच गयी| माल्या जैसे उद्योगपति सरकार को चूना लगाकर देश छोड़कर भाग गये| इसके अलावा राजन के उन 56 धन्नासेठो पर भी नज़र थी जो सरकार का 85000 करोड़ पिछले सालों मे लेकर बैठ गये| कोई भी बजट उठाकर देख लीजिए तकरीबन 8 लाख करोड़ का कॉर्पोरेट इंडिया का टैक्स सरकार माफ़ कर देती| राजन का तर्क था, देश की अर्थ व्यवस्था सुधारने के लिए इनसे टैक्स वसूला जाए

इस खबर के लिए लिंक पर क्लिक करे।
|http://upkhabar.in/2016/11/12/raghuram-rajan-was-against-note-ban/
[11/14, 12:53 PM] Sanjeev Sehara: जब *डॉक्टर* or *नर्सिंग ऑफिसर एव स्टाफ* लगातार 72 घंटे नॉन स्टॉप ड्यूटी कर सकते हैं और सदियों से करते आये हैं , तो क्या *बैंक* वाले एक हफ्ता *कैसुअल्टी* की तरह ड्यूटी नहीं कर सकते *?*

*किसने कहा कि बैंक रात को बंद करना जरूरी है !*

चलने दो *हॉस्पिटल की इमरजेंसी* की तरह ।

भीड़ अपने आप ही खत्म हो जायेगी ।😎
जनहित मे जारी 🙏🏻
जय भारत 🇮🇳
जय हिन्द  🇮🇳
[11/14, 12:54 PM] Sanjeev Sehara: 2 मिनट के लिए खुद के दिमाग से मोदी भक्त/विरोधी, वामपंथी/दक्षिणपंथी, हिन्दू-मुस्लिम का तमगा हटा के सोचिए इन 5 दिनों में क्या क्या हुआ?

• देश भर में फैले जाली नोट जलाए/फेंके जा रहे।
• काला धन रखने वालो के यहां छापे पड़ रहे।
• पैसे बांटकर चुनाव जीतने वाले नेता बौखलाए हुए है।
• बेईमानो के यहां दबे पैसे रद्दी बनते जा रहे।

नहीं सोचना.....चलिये ये सोचिये क्या नहीं हुआ...

• झारखण्ड-छत्तीसगढ़ में एक भी नक्सल हिंसा नहीं हुई।
• कश्मीर अलगाववादियों ने पत्थर नहीं बरसाए।
• UP में समाजवादी व महाराष्ट्र में ठाकरे गुंडों ने हिंसा नहीं की।
• पाकिस्तान ने सीजफायर का उल्लंघन नहीं किया।
• बिना पक्का बिल व बिना टेक्स दिए खरीददारी नहीं हो रही।
[11/14, 1:11 PM] Sanjeev Sehara: अपने किए पर भरोसा क्यों नहीं हो रहा है सर?
2G घोटाले वाला तो 4000 रूपये कि लिए
ATM पहुँच गया पर बीजेपी से एक भी नेता ATM नहीं गया बैंक में नहीं दिखा!!!???
व्यापम वाले नोट पहले ही बदल दिए गए थे क्या सर!!!???
कोई कारण तो होगा न सर क्योंकि जीने के लिए पैसों की ज़रूरत तो आपको भी होगी, आपके तमाम सहयोगियों को भी होगी।
या घोषणा से पहले ही..........😂😂😂😂😂
[11/14, 1:14 PM] Sanjeev Sehara: नोट  बंद  करने  के लिए  तीन  तर्क  दिए  जा  रहे  हैं, पहला  अर्थव्यवस्था रेगुलेटेड हो ,  दूसरा काला  धन  बाहर आएगा  और कला धन  वालों  को  पकड़ा  जायेगा और  तीसरा नकली नोट चलन से बाहर किये जांय ! अगर  यह  तीन  बातें  हो  तो  इसको  पूरा  समर्थन  |
 लेकिन ५०० और १००० के  नोट  बंद करने के फैसले  पर  कुछ  ज़रूरी बात  जिनपर  विचार  होना  चाहिए  ;;;;;
1.१०० से  कम  बड़े  कॉर्पोरेट घरानों (ख़रब  पतियों ) पर  बैंक का १२ लाख  करोड़ क़र्ज़  है, यह  हम  सब  जानते हैं की यह  पैसा किसी  सरकार , मंत्री या बैंक की  अपनी सम्पति  नहीं है  , यह  आम जानता की  गाढ़ी कमाई का  पैसा है  , जिसका  व्याज एक लाख चौदह हज़ार  करोड़  इस  साल  बजट  में  माफ़    कर  दिया  गया  | अगर सच में मोदी  को आम  जनता के  हित  में काले  धन  की  चिंता  है  तो क्यों  यह   व्याज  माफ़  किया जा रहा है क्यों  यह  क़र्ज़  नहीं  वसूला जा  रहा  है ?

2.यह  पूरा  अभियान  विदेशों से  काला धन न  ला  पाने  , सबके खाते  में  १५ लाख  का  वादा  पूरा  न  कर  पाने  की नाकामी को छुपाने  का  प्रयास  है | वे जो  ब्लैकमनी होल्डर हैं (असली / बड़े वाले ) उनपर कार्यवाही तो दूर आप सुप्रीम  कोर्ट तक के पूछने पर  उन लोगों के नाम  उजागर नहीं  करते | येही  है  आपका  साहस  |

3 अब  यहाँ  विचार  कीजिये  की  यह  खेल  आखिर है  क्या ? १२ लाख  करोड़  बैंक   का  corporates  के पास फंसा है, और  उन corporates के हितों की रखवाली  मोदी सरकार  द्वारा  उसका व्याज भी  माफ़ कर दिया  जा  रहा है | अब  पूँजी  के इस बढ़ते  संकट से  निपटने  के लिए बहुत  ज़रूरी  है की किसान ,मजदूर , खोमचे वाले ,  पटरी दुकानदार , तीसरी चौथी श्रेणी का कर्मचारी आम  महिलायों  और मध्यम वर्ग  के  पास रखे  पैसे को  बैंक  में एक झटके  में  जमा  कराया  जाये जिससे बैंक के पास  फिर  से  पूँजी  एकत्र  हो  और  सरकार  फिर  corporates  को  कर्ज  दिलवा सके |

4. सबसे  ख़राब स्थिति  यह  है कि करीब पाँच करोड़  लोग खुद और परिवार की बेहद ज़रूरी ज़रूरतों (दवा सब्ज़ी आटा चाय  दूसरी खुदरा चीज़ों)के लिये बेवजह सताये गय हैं । वे भोर से बैंकों, पोस्ट आफिसों की लाइनों में खड़े  रहे  । अपने ही  कमरतोड़ मेहनत से कमाए अपने पैसे को  अपने ऊपर खर्च करने  के  लिए  भीख  की तरह  लेने के लिए  ! इनमें से शायद ही कोई वो हो जिसको पकड़ने के लिये ये नोटबंदी की स्कीम लाई गई है | कितने  मजदूर , पटरी दुकानदारों  के  यहाँ  चूल्हा  तक  नहीं  जला  उसकी ज़िम्मेदारी  कोन लेगा ?
5. नोट्बंदी के  लिए ज़ारी किये  गए  तुगलकी सरकारी  आदेश में  यह  भी  शर्त लगायी  है  की अगर किसी  के  खाते  में  अगर  आज  से  लेकर  ३० दिसम्बर तक  २.५ लाख  से ज्यादा पैसा  जमा हुआ तो वोह जांच के  घेरे  में  आएगा  और उस पर  दो सौ परसेंट पेनालिटी  लगायी  जाएगी  | अच्छा  मजाक  है  मेहनत  से  इमानदारी  से  सचाई  से  अगर पैसा कमाया  है और उसमे से  अपना पेट काटकर  ( जो  प्राय: आम किसान  और  मजदूर परिवारों और निम्न मध्य वर्ग  में  होता  रहा  है )  पाँच सात , १० लाख जोड़ ले, या पत्नियों  द्वारा  सालों  साल पतियों  से  मिलने  वाले  घर  खर्च में  से  बचा कर  जो  पूँजी आज   एकत्र की  हो वोह काला धन  हो  जाएगी ? सबको  पता  है  काला धन  कोई नकद  में  नहीं  रखता होगा |

ऊपर लिखी  सारी मुसीबत  अगर  आम  जानता झेल  भी लेती  है  तब भी  सवाल  वोही  रहेगा  की  क्यों ? और  किसलिए ? इससे आम जनता  को  क्या  मिलेगा ? महगाईं  कम  होगी  ? आमदनी  बढ़ेगी  ? खाते  में  १५ लाख  आएगा  ? शिक्षा , खेती  , चिकित्षा में  सब्सिडी मिलेगी या  मुफ्त  हो  जायेगा  ?
या  आम  जनता को  भूखा मार  कर , परेशान  करके  बड़े कॉर्पोरेट घरानों  के   हितों  की रक्षा  की जाएगी जिनके  टुकड़े  खाकर  यह  सरकार  बनी  है  तो  अब नमक  का  हक़  तो  अदा करना  ही  है ।
[11/14, 1:15 PM] Sanjeev Sehara: *मंदिर मे काले धन का गोरखधंधा*

*क्या भारत के सभी मंदिर पर काले धन को लेकर छापा लगना चाहिए ???*

जैसे ही 500 ओर 1000 रूपेय की नोट पर बेंड लगा तो कुछ मंदिरों में भगवान की आड में काले धन को वाइट करने का धंधा शुरू कर दिया

*वो भी 20% की कमीशन पर*

भोले भाले भक्तों की कठीन महेनत ओर श्रद्धा विश्वास से दिये गये हुये चडावा का हुआ दुरुपयोग साथ मे विश्वासघात

मथुरा में आये हुये काफी विख्यात गोवर्धन मंदिर के पुजारी पावनबाबा रंगे हाथों  ABP News चेनल के सर्च ओपरेशन मे कालेधन को 20% कमीशन लेकर वाइट मे बदले हुये केमेरे में केद हो गये

पुजारी पावनबाबा के विडयो ने एक बड़ा प्रश्र पुरे भारत को सोचने पर मजबूर कर दिया साथे में सरकार को मुश्किल मे डाल दिया है

पावपबाबा विडयो में बोल रहे है की -
में 1 करोड़ रुपये की 100 की नोट खड़े खड़े 10मीनट में दे सकता हु आपको

अब सरकार के सामने एक बड़ा प्रश्न है की एक सामान्य मंदिर का पुजारी 1करोड़ रुपये का वाइट खड़े खड़े कर सकता है तो पुरे भारत के मंदिर में कितना काला धन बदल सकते है??

*क्या भारत के सभी मंदिर पर काले धन को लेकर छापा लगना चाहिए????*

**जय मूलनिवासी**

वास्तु शास्त्र भ्रामक शास्त्र

*वास्तु शास्त्र भ्रामक शास्त्र*
🏡 – लगभग पिछले 20-25 सालों से अपने यहाँ के सुशिक्षित लोगों को प्राचिन भारत के वास्तुशास्त्र के प्रति रूचि पैदा हो चुकी है। सैंकडों सालों से इतिहास बना हुआ यह शास्त्र 80 वें दशक में अपना अस्तित्व फिर से जताने लगा है। वास्तुशास्त्र जब पर्दे के पीछे था तब भी बिल्डींगे बनाते समय इस देश में वास्तुशास्त्र का आधार लिया जाता छा। अब तो वास्तुशास्त्र बहुत लोकप्रिय हो चुका है। जो कोई इस शास्त्र के अनुसार वास्तु का निर्माण करता है, और इस शास्त्र के अनुसार बनी हुई वास्तु में रहता है उसे यश, आरोग्य, सुख, समृध्दि सबकुछ निश्चित प्राप्त होता है ऐसा प्रचार किया जा रहा है।
यह शास्त्र पूरी तरह से विज्ञाननिष्ठ है सा इस शास्त्र का दावा है जिने हमें जाँचकर देखना। विज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोन का एक महत्वपूर्ण तत्व  है। सही ज्ञान हमें ज्ञानेंद्रिय के द्वारा प्राप्त हो सकता है। इसी तत्व के अनुसार धीरे-धीरे वैज्ञानिक पध्दति निरीक्षण, अन्वेषण, प्रयोग अनुमान – निष्कर्ष जैसी सीढ़ीयों को पार करके सिध्द हो सकती है। ज्ञानप्राप्ती की यह सर्वाधिक विश्वसनीय पध्दति है।
इस पध्दति से पूरा ज्ञान परखा जाता है। उसकी सत्यता और असत्यता तय की जाती है। इसके पश्चात वह विज्ञान बनता है। वास्तुशास्त्र को भी विज्ञान बनने के लिये इस कसौटी को पार करना पड़ता है। इसके बिना वास्तुशास्त्र को विज्ञान मानना गलत है। वैज्ञानिक प्रगति के कारण सब चीजों का लाभ उठाना मगर विज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को नकारना, हमारा प्राचीन शास्त्र है ऐसा कहकर विज्ञान की कसौटी को न मानते हुए वास्तुशास्त्र को अपनाना यह दोहरापन छोड़ना चाहिए। वास्तुशास्त्र पर भरोसा करना यह व्यक्तिगत बात हो सकती है मगर उसे विज्ञान कहना याने अपने आपको और अन्यों को भी ठगाने जैसी बात है।
आधुनिक जगत मे किसी को भी विज्ञान, उससे प्राप्त सुखसुविधाएँ, उसकी विश्वसनीयता को नकारना असंभव है। वैज्ञानिक होना बहुत सम्मान और प्रतिष्ठा दैनेवाली बात है।  अत: कुछ भी करके वास्तुशास्त्र को वैज्ञानिक धरातल पर सही साबित करने की कोशिश जारी रहती है। यह शास्त्र विज्ञाननिष्ठ नहीं है इतना कह देना पर्याप्त नहीं।  कौनसी परिस्थिति में इसका निर्माण हुआ, उसकी वृध्दि कैसै हुई, उस वक्त का समाज, लोगों के व्यवहार, खान-पान आदि सारी बातों की चर्चा होनी चाहिए। मकान की जरुरत तोउसे शुरु से ही रही है। आदमी को ही नहीं, पंछी, जानवर, कीटक, चींटी सभी सजीवों को रहने के लिए स्थान लगताही है। अपनी-अपनी आवश्यकता के अनुसार हर कोई मकान ढूँढता है या स्वयं उसका निर्माण करता है। यह सबकुछ अन्य प्राणी अपनी आवश्यकता के अनुसार सैंकडों सालों से अपना मकान बनाते आये हैं।  मनुष्यने अपनी बुध्दि का इस्तेमाल करके अपना मकान बनाने की कला में अपनी जरुरतों के अनुसार समय समय पर सुधार किये हैं।
प्रांरभ से ही मकान बनाते वक्त सुधार क्ये जाने लगे मकान बनाने का वास्तुशास्त्र केवलमात्र भारत में ही बनाया गया ऐसी बात नहीं। इस प्रकार का शास्त्र बनाना और स्थल-काल, भौगोलिक परिस्थिति, उस इलाके की हवा, वहाँ की संस्कृति, वहाँ पैदा होनोवाली मुसीबतें आदी के कारण महसूस होनेवाली अलग-अलग आवश्यकताओं के अनुसार मकान बनाने में निरंतर सुधार होते रहे। संसार भर में यह सब चलते ही रहता है।   यहाँपर ध्यान में रखने जैसी बात यह है कि आर्य लोगों की टोलियों ने आक्रमण करके वहाँ की संस्कृति को समाप्त करने के बाद भारतीय वास्तुशास्त्र वास्तुशास्त्र का निर्माण किया। वहाँ की संधोक संस्कृति की भाँति अन्य अनेक प्रगतीशील संस्कृतियों का ऐसी टोलियों ने विध्वंस किया है। ऐसे आक्रमणों से कुछ इनी-गिनी संस्कृतियों ने स्वयं को बचाया है।
*ऐतिहासिक पहलु –*
इस शास्त्र को विज्ञान कहें या नहीं इस बात को तय करने से पहले यह जब निर्माण हुआ उस काल की घटनाएँ और उसके परिणामों की जाँच करनी होगी। वास्तुशास्त्र के प्रवक्ता लोग कहते हैं कि इस शास्त्र का जनम वैदिक काल में हुआ है। ऋगवेद  में इसके  बारे में कुछ सबूत भी मिलते हैं। आर्य लोग भारत में आने से पहले सिंधू नदी के आसपास मूल रहिवासी बढ़िया ढंग से मकान बनाते थे। इन लोगों पर कब्जा करके अपनी सत्ता स्थापित करने हेतु आर्य लोगों को कई पापड बेलने पडे थे। वास्तुशास्त्र उन्हीं कोशिशों में से एक है। इसका मूल है यज्ञवेदी के निर्माण में यज्ञीय परंपरा और यज्ञीय विधि ज्यों ज्यों विस्तृत होते गये त्यों त्यों चातुवर्ण पध्दति मजबूत बनती गयी और  मकान बंधने के कार्य को करते समय गूढ शक्तियों को शांत करना, तृप्त करना और इसके लिए कर्मकान्ड करना शूरु हुआ। ये महाशक्तियाँ गण, गुरु, स्थपति, पुरुष आदि नामों से पहचानी जाती हैं। इसमें वास्तुपुरुष मंडल और वास्तोस्पती इन कल्पनाओं का सृजन हुआ। शुभ-अशुभ, पितर, वास्तुशास्त्र, ब्रम्ह, ईश्वर, स्वर्ग, मोक्ष, आत्मा जैसी कल्पनाओं का निर्माण इसीमें से हुआ। आर्य लोग आने से पहले सिंधू नदी के इर्दगिर्द बहुत बारीकी से नियोजन करके कुछ महानगर बस गये थे। खोदकाम के बाद इन बातों का पता चला है। वास्तुशास्त्र की वजह से चार वर्णोवली समाज रचना को बनाया गया। आजकाल जो वर्ण और जाति की व्यवस्था को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि यह दुष्ट व्यवस्था इतनी टिककर रहने के पीछे वास्तुशास्त्र का बहुत बड़ा हाथ है। निष्कर्ष के तौर पर यही कहा जा सकता है।
*वैदिक ज्ञान –*
वास्तुशास्त्र को मानने वाले कुछ लोग भृगु ऋषि के कुछ श्लोकों का आधार लेकर कहते रहते हैं कि वेदकाल में बहुत प्रगत वास्तुशास्त्र व्यवहार में था। बड़ी बड़ी बिल्डिंगे थी और हवाई जहाज भी थे। किसी अनुसंधान कर्ता ने उनसे एक महत्वपूर्ण सवाल पूछा था। उसका जिक्र यहाँ करनाही होगा। वास्तव में अपने यहाँ प्राचीन काल से ही हवाई जहाज और आज बननेवाले शस्त्रास्त्र थे। जिन बातों को आज खोजा जा रहा है उन सबके भारत के लोगों ने वेदकाल में ही खोज लिया था आजकल जो अनुसंधान हो रहें हैं वह सब पुरातन वैदिक ज्ञान ही तो है। फिर आप मुझे बताइए कि उन्होंनं दो पहियोंवाले वाहनों को भी संशोधन किया था क्या और वे उनका इस्तेमाव करते थे क्या? यहाँपर सवाल यह खड़ा होता है कि मोहेन्जोदारो, हरप्पा आदि स्थानों पर जो उत्खनन हुआ उसमें वेदकाल से पहले भी यहाँपर जो कुछ इस्तेमाल होता था, उनका पता चलता है। वेदकालीन लोग भी विज्ञान और तंत्रज्ञान के क्षेत्र में काफी माहिर थे इस बात का एक भी सबूत क्यों नहीं मिलता? वास्तुशास्त्र में जिन आठ दिशाओं को महत्व पूर्ण समझा जाता है उनसे हवा की दिशा, सौरउर्जा, गुरुत्वाकर्षण  जैसी बातों से मेल खानेवाले कुछ लोगों का गुट बनता है। इनके आधार पर शुभ-अशुभ को जानना, पैसा और सुखशांति मिलेगी या तकलिफें सहनी पड़ेगी, यश पल्ले पडेगा या अपयशयह सबकुछ तय किया जाता है।   मगर इस बारे में कोई भी वैज्ञानिक निष्कर्ष या सबूत प्राप्त करने की कोशिश वास्तुशास्त्र विशारदों को मंजूर नहीं है।
उपरोक्त सभी कल्पनाएँ ईश्वर, स्वर्ग, नरक, मुक्ति के साथ जोड़ने के कारण लोग उसपर भरोसा करते हैं। उन्हें वैज्ञानिक कसौटियों पर कसने की आवश्यकता नहीं होते। अपनी प्राचीन संस्कृति का गुणगान करते वक्त हमें दुसरी बातों का ध्यान ही नहीं रहता। विज्ञान की कई श्रेणियाँ हैं – आयुर्वेद, गणित, चरकसंहिता, सुश्रुतसेहिंता और वास्तुशास्त्र  ये सभी शाखाएँ प्राचीन काल में ही प्रगतिपथपर थी वे निरर्थक साबित होती गयी। आयुर्वेद की जैसी शाखाएँ केवल जिंदा ही नहीं रही तो अब तक वो तरक्की कर रही है। उसमें अब भी संशोधन जारी है। वास्तुशास्त्र तो 20 साल तक लोगों को मालूम ही नहीं था। इसका कारण स्पष्ट है। कालनाम में लोगों को इस बात का पता चल गया कि शास्त्र का आधार वैज्ञानिक नहीं है। इसलिए यह पुराना सायन्स कालबाह्य हो गया। उसके बाद पिछले कुछ दशकों में इस पुराने सायन्स के लोगों को दुबारा खोजबीन करनी पड़ी और आधुनिक विज्ञान की चौखट में उसे फिट करना पड़ा।
*दिशाओं का प्रभाव –*
वास्तुशास्त्र में दिशाओं का प्रभाव काबहुत महत्व होता है। अत:  हवामान के परिणामों का अदांजा ले सकते है। फिर उसका ठीक से इस्तेमाल कर सकते है। मगर आज हम जिस वास्तुशास्त्र के बारे में बेहस करते हैं, उसमें व्यावहारिक उपयोग का विचार न करते हुए लोगों के मन पर जबाव महसूस हो ऐसी गूढ कल्पना और उसका यदि अनादर करें तो जो कुछ भोगना पड़ता है उसके भयानक परिणामों का भी विचार किया जाता है। वास्तुशास्त्र का मुल ग्रंथ यदि पढ़े तो इस बात की सत्यता महसूस होगी। धरती के चुबंक क्षेत्र का और आदमी के भविष्य पर होनेवाले उसके परिणाम का जिक्र चक उसमें नहीं करते। वैसे आम तौर पर वास्तुशास्त्र के नियमों का उल्लंघन करने से कौनसे बुरे परिणाम होंगे यह बात सीधे सादे शब्दों में बतलाई जाती है। आये दिन वास्तुशास्त्र में बच्चों की मौत, दरीद्रता, पूर्ण विनाश जैसी भयानक बातें दर्शायी जाती है। विज्ञान में आदमी की वर्ण या जाति को बिलकुल भी महत्व नहीं होता। वास्तुशास्त्र में तो तत्वों को न मामनेवाले को उसकी जाति या वर्ण के अनुसार भिन्न-भिन्न परिणाम बतलाये गये हैं। ऐसे सायंस को  विज्ञान कैसे कह सकते है ?
वास्तुशास्त्र की भाँति अन्य कई शास्त्र अपनी सच्चाई को साबित करने हेतु वैज्ञानिक शब्दों का इस्तेमाल करते हैं और लोगों के मन में कई गलतफ़हमियाँ पैदा करते हैं। पढ़ेलिखे बुध्दिमान लोग भी ऐसी वैज्ञानिक संज्ञाओं के शिकार हो जाते हैं। मूल में जिनकी नीवं हो दोषयुक्त और वैज्ञानिक हो उस वास्तुशास्त्र की खामियों की और वे ध्यान नहीं देते। इस भ्रामक शास्त्रों का आधार है आठ दिशाएँ। ये आठ दिशाएँ नॅचरल नहीं होती। उन्हें अपनी सुविधानुसार लोग ही तय करते हैं। हमारा पूर्व दिशा का प्रदेश ब्रम्हदेश के पश्चिम में होता है। ऐसी अनिश्चित दिशाएँ शुभ या अशुभ, अच्छा या बुरा परिणाम कैसे दिखला सकती है ? पृथ्वी तो हमेशा अपने ही इर्दगिर्द पश्चिम से पूर्व की ओर घूमते रहती है। किसी प्रचंड पहिए पर बैठकर हम लोग घूमते हैं वैसे। वह पहिया घूमते रहने पर हमें अपने आसपास की सभी वस्तुएँ घूमती हुई नजर आती है। प्रत्यक्ष में हम ही घूम रहे होते हैं और आसपास की सभी चीजें स्थिर होती है। ऐसे ही सूर्य  भी हमें पूर्व दिशा की ओर उगा हुआ दिखता है और दिनभर का सफर करके शाम को पश्चिम में अस्त होता हुआ दिखता है। ऐसी स्थिति में दिशाओं को शुभाशुभ, लाभदायक या धोकादायक जैसे विश्लेषण लगाने में कहाँ की समझदारी है? इससे भी मजेदार स्थिति आर्क्टिक एवं अटांर्टिक प्रदेशों में पायी जाती है। इन प्रदेशों में 6 महिने का दिन और 6 महिने की रात होती है। 21 मार्च से 23 सितंबर की कालावधि में आधी रात में आसमान में सूरज दिखाई देता है। फिर यहाँपर आप वास्तुशास्त्र के महान तत्व कैसे लगा पायेंगे?
*वास्तु का रहस्य –*
वास्तु याने क्या ? इसका सही अर्थ क्या है? संस्कृत भाषा में इस शब्द का अर्थ है – हम रहते हैं वह स्थान याने वास्तू! वास्तुशास्त्र का जब जन्म हुआ था तब नगर-पालिकाएँ नही थी। शहर विकास अधिकारी भी नहीं थे और मकान बनाने का कानून भी नहीं थे। वास्तुशास्त्र के अनुसार रसोईघर वातविमुख दिशामें होना चाहिए और यह बात ठिक भी है क्योंकि रसोईघर में पैदा होनेवाला धुंआ घर में फैलने के स्थानपर हवा के साथ बाहर फेंका जाय। पहले घर में हवा को बाहर फेंकने वाले पंखे नहीं थे। मगर आये दिन ये सुविधाएँ होने के कारण वास्तुपंडित प्राचीन बातों का मजाक उडाते हैं। कारखानों में बॉयलर रुम कहाँ होनी चाहिए इसके बारे में वे सलाह देते हैं क्योंकि रसोईघर में जैसे अग्नि होता है वैसे ही  बॉयलर रुम भी होता है। भारत फोर्ज कंपनी ने बहुत सी पूंजी खर्च करके अपने फ्लॅट की रचना वास्तुशास्त्र के कथनानुसार बदली। ऐसे कई उदाहरण दिये जा सकते हैं। मगर वास्तुशास्त्र में एकाध श्लोक में भी बॉयलर और फॅक्टरी का विवेचन नहीं मिलता। तब उनका अस्तित्व था ही नहीं। अब स्थिति बदल चुकी हैं। धुआं नहीं होगा ऐसी चीजों का इस्तेमाल किया जाता है। फिर हम वास्तुशास्त्र के इन तत्वोंपर कब सक काम करेंगे?
वास्तुशास्त्र के अनुसार किसी भी बिल्डिंग का प्रवेशद्वार दक्षिण की ओर होना अशुभ माना जाता है और ऐसा होगा तो विनाश अटला है। किसी बाजारपेठ में रास्ते को दोनों ओर जहाँ दुकान लगे होते हैं वहाँपर आधी दुकानों का प्रवेश दक्षिण दिशा से ही होगा। वे सबके सब दुकानदार असफल होते हैं क्या? वॉशिंग्टन, डी.सी. के व्हाईट हाऊस का प्रवेशद्वार दक्षिण दिशा की ओर है।  वास्तुनियमों से बिलकुल विरोध में। पर वहाँ रहते है अमेरिका के राष्ट्राध्यक्ष संसार की प्रबल महासत्ता के प्रमुख।
वास्तुशास्त्र के काल में घर के दरवाजे और खिडकियाँ हवा खेलने के लिए सीधी लकीर में होना जरुरी समझा जाता था एक किताब में कहा गया था कि पश्चिम दिशा की तरफ छाया दनेवाले बड़ेबड़े पेड़ होने चाहिए। उस विभाग की कड़ी धूप को रोकने के लिए इनकी आवश्यकता है। पर उत्तर भारत में इसकी जरुरत नहीं होती। द। भारत में सूरज की रोशनी उत्तर की तरफ से आती है। इसलिएँ यहाँ पर यह नियम लागू होता है। वास्तुशास्त्र के सभी ग्रंथ उस इलाके की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर लिखे गए है। मगर आये दिन उन को दिल्ली से कन्याकुमारी तक भी स्थानों पर लागू किया जाता है। एक वास्तुशास्त्र में तो ऐसा कहा गया है कि ब्राम्हणों को घर होने ही नहीं चाहिए। उस काल के हिसाब मे यह बात ठीक होगी भी। पर अब भी हम अंधे बनकर उसे अपनाए क्या ?
आजकल वास्तुशास्त्र के द्वारा जो बात स्पष्ट नहीं की जाती क्योंकि सेंकड़ों साल पहले वास्तुशास्त्र के कई वास्तुशास्त्र रुप थे। उनके लेखक भी कई थे – वराहमिहीर, भृमु,मनुसार, मयमत वगैरा। हर एक का अलग ग्रंथ, स्वतंत्र स्पष्टिकरण और खुद के प्रांत की आबोहवा, सामाजिक नियम, उपलब्ध साहित्य इन सबका विचार करके बनाये गए मकान एक जैसे होना असंभव है। हर एक ने अपने सुविधा के अनुसार नियम बनाये थे।
पानी पश्चिम दिशा की ओर रखा हो तो  वास्तुशास्त्र के अनुसार दुर्भाग्य का कारण होता है। मुबंई में तो अरबी समुद्र पश्चिम दिशा की ओर है और मुबंई तो हमारे देश का प्रमुख व्यापारी शहर है। वहाँ कितनी बड़ी आर्थिक बातें दिनरात चलते रहती है। फिर कैसा आया दुर्भाग्य ? आजकल के वास्तुपंडित कहते हैं कि  मुबंई में शहर को समुद्र में मिट्टी भरकर बनायी गयी जमीन पर बसाया गया है इसलिए वास्तुशास्त्र के नियम वहाँ पर लागू नहीं होते। मगर पूरा मुबंई शहर ऐसी जमीन पर नहीं बसा है। फिर इस सवाल का क्या जवाब होगा ?
अपने यहाँ का इतिहास देखना होगा। हमारे मराठी शासक पेशवेजी ने सुखसमृध्दि प्राप्त हो इसके लिए उत्तर दिशा की ओर मुख हो ऐसे दरवाजे बनवाए। पुना का शनिवारवाडा लिजिए। उसका बड़ा सा प्रवेशद्वार उत्तर दिशा की ओर है। फिर भी वे मुसीबतों से हैरान हो गए थे। कर्ज के बोझ से लद गए थे।
वास्तुशास्त्र की एक किताब में लिखा है कि पूर्व दिशा की ओर से बहनेवाली नदियाँ ही उस प्रदेश को सुजलां सुफलां बना सकती है। उस जमानें में कुछ खास इलाकों में ऐसा हो गया होगा मगर यह संसारभर का नियम नहीं हो सकता। भारत में गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, केरल इन राज्यों में पूर्व दिशा की ओर बहनेवाली नदियाँ है ही नहीं। परंतु इन राज्यो में समुध्दि नहीं है ऐसा नहीं कह सकते। तिरूपति का मंदिर वहाँ की वास्तू के कारण बहुत धनवान है। अन्य मंदिर उनकी वास्तु की वजह से गरीब हैं। भगवान भी इस वास्तू के लफड़े से छूट नहीं पाते।
और एक सवाल पैदा होता है। वास्तु के प्रति इतना प्यार अभी क्यो उमड़कर आया है। यह सवाल सांस्कृतिक और सामाजिक स्वरुप का है। उसके चार कारण हो सकते हैं।  वे हैं – अपनी असफलताओं का कारण वास्तू को बताना। कई लोग रातभर में अमीर हो जाते हैं। फिर वे किसी वास्तुपंडित को पापविमोचन करने हेतु, प्राप्त धन से भगवान को भी हिस्सा लेने के लिए बुला लेते हैं। भगवान भी बहुत जल्द उनकी पुकार सुन लेते हैं। ऐसी अंधश्रध्दाएँ कभी  कभी बीमारियों की तरह फैल जाती हैं।एखाद मंत्री ऐसी ही कुछ बातों के लिए वास्तुशास्त्रज्ञ से मिलता है और फिर उसके पीछे अन्य लोग भी उसी राह से लगते हैं।
इन सारी बातों का दुष्परिणाम मकान बनाने वाले बेपारियों को भुगतने पड़ते हैं।  आधुनिक वास्तुतज्ञ अलग-अलग 50 विषयों का पांच साल तक भरसक अध्ययन करते हैं इतना परिश्रम करने के बाद प्राप्त ज्ञान को कुछ लोग क्षणभर में फालतू करार देते हैं। उसमें से कई लोगों को कॉलम, लिटेंल, बीम इनके बीच का फर्क भी मालूम नहीं होता। फिर भी पूरा निर्माण कार्य और पूरे शहर की रचना के बारे में वे सलाह देते रहते हैं। लोग भी उनकी बातें मानते हैं। मेरे यहाँ कई आर्किटेक्ट विद्यार्थी निराश होकर आते हैं और अपने वास्तुशास्त्री के बारें में शिकायत करते हैं। मकान का निर्माण का परफेक्ट नक्शा बनाने के बाद हमारे ग्राहक किसी वास्तुविद को ले आते हैं। यह ज्ञानी हमें कई सुधार सुझाता है जो मकान को विद्रूप बना दैते है और ऐसे सुधार करना उस ग्राहक के हित में नहीं होते।
किसी वास्तुविद ने देवेगौडाजी से कहा “आपके घर में प्रवेश करने हेतु दो सीढियाँ है इसलिए आप पूरे पाँच साल तक शासन नहीं कर पायेंगे।  आर्किटेक्ट ने एक आयडिया की।  प्रवेशद्वार के पास एक गढ्ढा खोदा और वहाँ एक फर्श बिठाकर नाममात्र की क सिढी बनायी। तीन सिढ़ीयाँ हो जाने से अब सभी खुश हो गए। मगर इस तिसरी सीढ़ी को भी देवेगौड़ाजी को पाँच साल तक टिका पाना संभव नहीं रहा।
एन. टी. रामारावजी को सलाह दी गई थी कि उनके सेक्रेटरिएट की उत्तर दिशा में कुछ मीटर का एक खुला पॅसेज होना चाहिए। वहाँ पर बहुत सा धन खर्च करके वहाँ की  झोपडियाँ हटाई गई और रामारावजी के लिए उत्तर दिशा में बड़ासा प्रवेशद्वार बना। गया। मगर दुर्भाग्य से जल्द ही उन्हें मुख्यमंत्री के पद से हटाया गया और साक महीनों के बाद ही वे स्वर्गवासी हो गए। वास्तुशास्त्र के अनुसार परिर्वतन करने के लिए जनता के करोड़ो रुपये मंत्री गण अपनी इच्छाके अनुसार खर्च करते रहते है। उनके विरोध में न्यायलय में जनहितयाचिका पेश करनी चाहिए।दुःख की बात यह है कि इन वास्तुशास्त्र विदों पर किसी तरह की बंदी नहीं और कोई भी कानून उनपर लागू नहीं होता। उनके ये सभी कार्य ग्राहक सुरक्षा कानू  के अंतर्गत लाने चाहिए। समाचारपत्र, टिव्ही और अन्य मिडियावालों को सजग रहकर उनकी प्रशंसा करना बंद करना चाहिए। वास्तुशास्त्र के मूल ग्रंथ में कहा गया है कि भोंदू लोगों के द्वारा ऐसा व्यवसाय किया जाय तो उन्हें कड़ी सजा देनी चाहिए। इस मामलें में व्स्तुपंडितों का क्या कहना है ?
ख्रिस्टोफर रेन ने एक चर्च बनवाया। उसके भीतर एक भी खंबा नहीं था। वह चर्च ढह जाएगा ऐसा भय सबको हो रहा था मगर ख्रिस्टोफर ने दावे के साथ कहा कि वह एकदम पक्का बना है और सौ साल तक जरुर टिकेगा। लोगों का भय खत्म करने हेतु अंत में उसने एक खंबा भीतार खड़ा किया। मगर यह खंबा छत तक पहुँच ही नहीं सका छह इंच जानबूझकर छत के नीचे रखा था। इस खंबे से छत को नहीं मगर लोगों की मानसिकता को सहार मिल रहा था।
“और एक दुर्भाग्य की बात यह है कि आये दिन ख्रिश्चन और मुस्लीम लोग भी वास्तुशास्त्र के भंवरे में फंस चुके है।  इस लहर के विरोध में लड़ रहा हूँ।  मुझे अब स्वयं-सेवकों की मदद चाहिए।  इस संदर्भ में मेडिकल रेमेडीज एक्ट 1910  वास्तुशास्त्र के व्यवसाय लिए बन जाना चाहिए। वास्तुशास्त्र के जानकार लोगों ने अपना मत लिखित रूप में सूचित करना चाहिए।  इस विषय की अंधश्रध्दाओं पर रोकथाम लगाने के लिए महाराष्ट्र अंधश्रध्दा निर्मूलन समिति के जैसी समितियाँ बननी चाहिए ”
*आर. व्ही. कोल्हटकर*
डेक्कन हेरॉल्ड से साभार